कभी हाथ जोड़कर मांगना पड़ता था रोल, आज पार्किंग में इंतजार करते हैं निर्देशक

निकिता सिंह: समय का पहिया जनाब जब घूमता है तो अच्छों-अच्छों को बदल देता है बशर्ते हमें हार नहीं माननी चाहिए और कोशिश जारी रखनी चाहिए. अब थोड़ा समय के पहिए को पीछे लेकर चलते हैं बात करते हैं पंकज त्रिपाठी की जब उन्हें कोई नहीं जानता था. किस तरह एक किसान का एक बेटा जो पिता के साथ खेतों में काम करता था आज हिंदी सिनेमा का पॉपुलर चेहरा बन गया. कुछ लोग किस्मत का इंतजार ना करके मेहनत पर ध्यान देते हैं, पंकज त्रिपाठी ने भी अपने हाथों की उन लकीरों को ही बदल दिया जिसे देखने के बाद पंडित जी ने कहा थी, लड़के के भाग्य में विदेश जाने का योग ही नहीं है. उसी पंकज ने अपनी किस्मत खुद लिखी और आज सभी उनके सहज अभिनय या यूं कहें मेथड एक्टिंग के दिवाने हैं. जिन निर्देशकों के पीछ वह छोटे-छोटे रोल के लिए भटकते फिरते थे, आज वही डायरेक्टर्स पार्किंग में उन्हें सर-सर बोलकर रोल ऑफर करते हैं.

पंकज की जिंदगी भी किसी नाटक से कम नहीं, जहां उतार-चढ़ाव आशा-निराशा हैं. वैसे पकंज की जिंदगी भी किसी फिल्मी कहानी जैसी ही लगती है. पकंज बिहार के गोपालगंज के रहने वाले हैं. पिता का नाम पंडित बनारस त्रिपाठी और मां का नाम हिमवंती देवी है. चार भाई-बहनों में वे सबसे छोटे हैं. बचपन के दिनों से ही पंकज गांव के रंगमंच और छोटे-मोटे नुक्कड़-नाटकों में भाग लिया करते थे. 

उन्हें ज्यादातर महिलाओंं का रोल दिया जाता था. लोग तारीफ करते और कहते तुमको तो मुंबई जाकर एक्टिंग करनी चाहिए. उनकी जिंदगी में नया मोड़ तब आए जब वे 12वीं की पढ़ाई के बाद आगे की शिक्षा लेने के लिए पटना गए. वहां जाकर वे होटल मैंनेजमेंट की पढ़ाई करने के साथ-साथ राजनीति और कॉलेज के प्ले में भी हिस्सा लेने लगे. वे ABVP के साथ जुड़े और एक रैली के कारण उन्हें एक हफ्ते तक जेल की हवा भी खानी पड़ी थी. जब एक्टिंग का पहिया आगे बढ़ नहीं रहा था, ऐसे में उन्होंने पटना के एक होटल के किचन में काम करना शुरू कर दिया.

एक बार इंटरव्यू देते समय पंकज ने कहा था, “मैं रात के समय होटल के किचन में काम करता और सुबह थिएटर में ऐसा दो सालों तक चलता रहा. मैं शिफ्ट से वापस आकर सिर्फ पांच घंटे सोता और दोपहर 2 बजे से 7 बजे तक थिएटर करता. इसके बाद फिर होटल में 11 से सुबह 7 की शिफ्ट.”

गैंग्स ऑफ वसेपुर, सेक्रेड गेम्स , फुकरे, मसान, बरेली की बर्फी, एक्सट्रेक्शन, स्त्री, लुका छिपी, कागज और मिमी जैसी फिल्मों और सीरिज के जरिए पंकज त्रिपाठी ने खुद को अभिनय की दुनियां में स्थापित किया है. इनकी जिंदगी में एक दिन वो भी था जब ये बेरोजगार मुंबई की सड़कों पर भटकते थे. सात साल तक पटना और दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से ग्रेजुएट होने के बाद पंकज 16 अक्टूबर 2004 को मुंबई चले गए.

उनकी जेब में 46,000 रुपये थे लेकिन दिसंबर तक इन पैसों में सिर्फ 10 रुपये ही बचे थे. एक समय ऐसा था कि पत्नी मृदुला का जन्मदिन था लेकिन केक तक के पैसे नहीं थे गिफ्ट तो दूर की बात है. जब वे बेरोजगार थे तो उनकी पत्नी ने कई सालों तक घर के सभी खर्चे संभाले ये बस काम की तलाश में भटकते रहते थे.

पकंज ने एक साक्षात्कार में कहा था कि “ईमानदारी से कहूं तो, मैंने 2004 और 2010 के बीच कुछ भी नहीं कमाया. मेरी पत्नी मृदुला हमारे घर के रखरखाव में शामिल सभी खर्चों का बोझ उठाती थी. मैं अंधेरी में घूमता था और लोगों से विनती करता था कि कोई एक्टिंग करवा लो, कोई एक्टिंग करवा लो लेकिन उस समय किसी ने मेरी बात नहीं सुनी. उन संघर्ष के दिनों में, मृदुला घर के किराए से लेकर अन्य बेसिक जरूरतों का सारा खर्च उठाती थीं.”

पंकज त्रिपाठी की प्रेम कहानी भी अनोखी ही है

हुआं यूं कि जब वे 10वीं में पढ़ते थे तो एक शादी समारोह में मृदुला को देखा था और पहली नजर में ही उन्हें प्यार हो गया. इसके बाद पंकज ने साल 2004 में मृदुला से शादी कर ली थी. वहीं पंकज को साल 2004 में टाटा टी के एड में नेता बनने का रोल मिला था. इसी साल वे अभिषेक बच्चन और भूमिका चावला के साथ फिल्म रन में नजर आए. उस समय पकंज पर किसी का ध्यान नहीं गया.

एक समय में पंकज किसी तरह बस छोटे-मोटे रोल चाहते थे ताकि घर का किराया दे सकें, लेकिन जब उन्हें अनुराग कश्यप की मल्टीस्टारर फिल्म वासेपुर मिली तो अपनी एक्टिंग का लोहा मनवा दिया. इस फिल्म में मनोज बाजपेयी और नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसे बड़े कलाकार थे.

एक इंटरव्यू में पंकज ने कहा, पहले काम ढूंढना पड़ता था, अब डेट की वजह से फिल्म करने से इनकार करना पड़ता है. पकंज त्रिपाठी को देखकर यकीन होता है कि कोई एक्टर इतनी सादगी के साथ भी दिल जीत सकता है. वे अब भी गांव जाते हैं तो दोस्तों के लिए खुद आग पर लिट्ठी-चोखा बनाते हैं.

पंकज आज भी अपने गांव, अपने घर और खेतों में समय बीताते हैं. अभी भी पंकज जमीन से जुडे हुए हैं और अपने संघर्ष के दिनों को नहीं भूले…मिर्जापुर सीरिज में बाहुबली अखंडानंद त्रिपाठी उर्फ कालीन भईया का रोल तो आपको याद ही होगा…यह जिंदगी किसी सपने से कम नहीं है जहां इतने संघर्षों के बाद सफलता मिली हो…एक खेत में काम करने वाला आज लोगों के दिलों पर राज करता है. जिस के अभिनय का डंका आज बॉलीवुड में बजता है…वो भी हीरो से इतर लेकिन लाजवाब.

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