समाज की कुरीतियों को दूर करने में युवा फिल्मकारों की भूमिका अहम-डॉ. नीरज कर्ण सिंह
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मेरठ। अगर जुनून कुछ करने का हो तो हर मुश्किल आसान हो जाती है। किसी भी काम को पूरा करने के लिए जरूरी है कि उसकी अच्छी शुरुआत हो। सच्ची लगन से शुरू किये गये काम का अंत भी बेहतरीन होता है। यह बात स्वामी विवेकानन्द सुभारती विश्वविद्यालय के गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता एवं जनसंचार महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने साबित की है। मेरठ चलचित्र सोसायटी और चौधरी चरण सिंह के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग द्वारा आयोजित फिल्म फेस्टिवल मे विभिन्न महाविद्लायों, विभागों तथा विश्वविद्यालयों से करीब 32 फिल्में भेजी गई। जिसमें 4 फिल्में गणेश शंकर विद्यार्थी सुभारती पत्रकारिता एवं जनसंचार महाविद्यालय से भेजी गई। उन फिल्मों में से चुनिंदा फिल्मों की स्क्रीनिंग हुई जिसमें अहमद शाह की फिल्म ‘कच्चा घड़ा’ को सर्वश्रेष्ठ शॉर्ट फिल्म के तौर पर चुना गया। जिसके बाद उस फिल्म की स्क्रीनिंग विभाग में भी की गई। फिल्म की बहुत तारीफ की गई और कहां गया ‘कच्चा घड़ा’ जैसी फिल्म समाज की सही में तस्वीर एवं आंखें खोलने का काम करती है।

इसी मौके पर गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता एवं जनसंचार महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. नीरज कर्ण सिंह ने कहा कि भारत में सिनेमा व्यवसाय बन कर रह गया है, जबकि सिनेमा समाज को जगाने का काम करता है। यही उसका उद्देश्य और भूमिका है। दरअसल आज के सिनेमा को देख कर लगता है कि भारतीय सिनेमा में भारत लुप्त हो गया है। अधिकांशतः सिनेमा नकारात्मक हो गया है। सिनेमा तमाम कलाओं का एक संयुक्त माध्यम है। यह संस्कृति का एक तत्व है, जो संस्कृति और सभ्यता का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में रोपित करने का काम करता है। संस्कृति के संरक्षण का कार्य भी सिनेमा करता है। आज सिनेमा घटना परक है जबकि इसे समस्या परक होना चाहिए। आज सिनेमा मिलावटी हो चुका है। इस मिलावट को रोकने का काम युवा फिल्मकार करेंगे।

फिल्म ‘कच्चा घड़ा’ को प्रथम पुरस्कार मिलने पर पूरे महाविद्यालय ने उसको जश्न के तौर पर मनाया ताकि अन्य भी युवा फिल्मकार इससे प्रेरित हो और सिनेमा को संस्कृति के उपक्रम के तौर पर प्रतिस्थापित करे। ऐसे ही समाज के रूढ़िवादी सोच को खत्म करें। बता दें कि कच्चा घड़ा बाल विवाह के ऊपर बनाया गयी फिल्म है। जिसमें दर्शाया गया है कि एक नाबालिक लड़की कच्चे घड़े की तरह होती है। जिस तरह कच्चे घड़े में पानी डाल दे, तो बिखर जाता है। ठीक उसी प्रकार 18 साल की उम्र से पहले अगर लड़की की शादी कर दी जाए तो वो भी बिखर जाती है। इस पूरे फिल्म को बनाने मे कई लोगों ने अपना सहयोग दिया। फिल्म के लेखक डॉक्टर नीरज कर्ण सिंह ने अपनी भावनाओं को बतौर स्क्रिप्ट में लिखा, वहीं डायरेक्टर सय्यद अहमद शाह ने खूब तालियां बटोरी। उन्होंने फिल्म का क्रेडिट अपने टीम मेंबर को भी दिया, जिसमें आर्ट डायरेक्टर हनु साहिल, मेकअप आर्टिस्ट सलोनी और लकी, महाविद्यालय के पूर्व छात्र और सिनेमैटोग्राफर उदय कुमार, असिस्टेंट डायरेक्टर मोहित वर्मा, लोकेशन फाइनलाइजर नदीम माल्या और पुष्पेंद्र भी इस कार्य में शामिल रहे।

फिल्म की स्क्रिनिंग के समय महाविद्यालय विभिन्न सत्रों के छात्र-छात्राओं सहित मुदस्सीर सुल्तान, गुंजन शर्मा, यासिर अरफात, बीनम यादव एवं प्रिति सिंह सहित प्रिंस चौहान एवं कई गणमान्य लोग मौजूद रहें।

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