हरेला पर गोदली  में वृक्षारोपण, जानिए क्यों मनाया जाता है हरेला

संतोषसिंह नेगी/ चमोली के पोखरी ब्लाक रा ई का गोदली में मंगलवार को हरेला पर छात्र – छात्राओं व शिक्षकों ने वृक्षारोपण किया प्रधानाचार्य   विक्रम प्रजापति ने  हरेला पर्व के अवसर पर स्कूल  परिसर में वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया  उन्होंने छात्र -छात्राओं  से  कहा हरेला पर्व के माध्यम से समाज को पर्यावरण से जोड़ने का प्रयास करना जरूरी है यह संस्कृति का भी प्रतिक है।

हरेला क्यों मनाया जाता है।

उत्तराखण्ड में श्रावण मास में पड़ने वाले हरेला को ही अधिक महत्व दिया जाता है! क्योंकि श्रावण मास शंकरभगवान जी को विशेष प्रिय है। यह तो सर्वविदित ही है कि उत्तराखण्ड एक पहाड़ी प्रदेश है और पहाड़ों पर ही भगवान शंकर का वास माना जाता है। इसलिए भी उत्तराखण्ड में श्रावण मास में पड़ने वाले हरेला का अधिक महत्व है सावन लगने से नौ दिन पहले आषाढ़ में हरेला बोने के लिए किसी थालीनुमा पात्र या टोकरी का चयन किया जाता है। इसमें मिट्टी डालकर गेहूँ, जौ, धान, गहत, भट्ट, उड़द, सरसों आदि 5 या 7 प्रकार के बीजों को बो दिया जाता है। नौ दिनों तक इस पात्र में रोज सुबह को पानी छिड़कते रहते हैं। दसवें दिन इसे काटा जाता है। 4 से 6 इंच लम्बे इन पौधों को ही हरेला कहा जाता है।

घर के सदस्य इन्हें बहुत आदर के साथ अपने शीश पर रखते हैं। घर में सुख-समृद्धि के प्रतीक के रूप में हरेला बोया व काटा जाता है! इसके मूल में यह मान्यता निहित है कि हरेला जितना बड़ा होगा उतनी ही फसल बढ़िया होगी! साथ ही प्रभू से फसल अच्छी होने की कामना भी की जाती है तथा जीवन सार्थक उदेश्य की ओर बढ़ता है।इस अवसर पर समस्त छात्र-छात्रायें शिक्षक मौजूद थे।

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