नागरिकता संशोधन विधेयक : राष्ट्रहित में जरूरी

विश्व के एक बड़े लोकतंत्र के रूप में चर्चित भारतवर्ष विशेष आर्थिक पहचान के साथ आज वैश्विक शक्ति बन चुका है I अपने पड़ोसी देशों-पाकिस्तान व चीन से भारत की तकरार सर्वविदित है I पकिस्तान आमने-सामने के युद्ध में हमेशा से पिटता रहा है इसलिए उसने भारत में आतंक का छद्मयुद्ध छेड़ रखा है I दशकों से पाकिस्तान,बांग्लादेश और अफगानिस्तान की आंतरिक स्थिति बहुत ही विकट है, हिंसा, उन्माद ,आतंकवाद और अशांति से घिरे इन तीनों मुस्लिम मुल्कों में गैर हिन्दू नागरिकों पर वर्षों से असंख्य अत्याचार और घोर उत्पीडन के प्रमाण मौजूद हैं I लगातार प्रताड़ना झेलते हुए अपने प्राणों के भय से ज्यादा महिलाओं और बच्चियों की अस्मिता की रक्षा के लिए इन सैकड़ों – हजारों शरणार्थियों के साथ बौद्ध, जैन, ईसाई और पारसी आदि अल्पसंख्यक समुदाय के लोग सुरक्षा और शान्ति की आस में भारत में आते रहे I
मजहबी उन्माद के शिकार
विभाजन के समय से ही पाकिस्तान में हिन्दू और सिख समुदाय का धार्मिक उत्पीड़न और अत्याचारों का क्रम बदस्तूर जारी है , मुस्लिम बहुल देश में इन अल्पसंख्यकों का जीना दुश्वार हो गया I पाकिस्तान और बांग्लादेश में लम्बे समय से नाबालिग हिन्दू, सिख और ईसाई लड़कियों के अपहरण व जबरन कन्वर्जन की दिनोंदिन बढ़ती खबरें सारी विश्व बिरादरी जानती हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ से लेकर एमनेस्टी इंटरनेशनल तक के संज्ञान में अल्पसंख्यकों के जान-माल को नष्ट करने के थर्रा देने वाले आंकड़े मौजूद है कि किस तरह धार्मिक भेदभाव के तहत इन अल्पसंख्यक नागरिकों का उत्पीड़न किया गया I सब कुछ छोड़कर ये भारत में आते रहे,वापस नहीं गए और शरणार्थी बन गए I
पाकिस्तान में धार्मिक प्रताड़ना का सर्वाधिक शिकार हिन्दू हुए हैं I 1951 में जहाँ पड़ोसी देश में हिन्दू जनसँख्या 22 प्रतिशत से अधिक थी , अब घटकर मात्र 7 से 8 प्रतिशत रह गयी है,यही स्थिति अन्य गैर मुस्लिमों- सिखों, ईसाइयों की भी है , जो अब नाममात्र शेष हैं । हाल के वर्षों में स्थिति और भयावह हुई है I मजहबी उत्पीडन के शिकार हुए औसतन 50,000 हिन्दू प्रत्येक वर्ष शरणार्थी के रूप में आकर दिल्ली, राजस्थान और गुजरात सहित कई क्षेत्रों में संघर्षमय जीवन काट रहे हैं I यही स्थिति बांग्लादेश से सताए हुए हिन्दुओं की है I 1971 के युद्ध के समय निशाना बनाकर हिंदुओं पर भीषण अत्याचार किये गए, उनकी जमीनों, घरों, मंदिरों पर बहुसंख्यक मुसलमानों ने कब्जा कर लिया,यह सिलसिला आज भी जारी है , इन असहाय हिन्दुओं को भी भारत में असम, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा जैसे राज्यों में शरण मिली हुई है ।
उदासीनता का कारण : तुष्टीकरण
त्रिशंकु की तरह अधर में फंसे इन शरणार्थियों के विषय में अब तक की सरकारों और राजनीतिक दलों की नीति ढुलमुल ही रही, जबकि प्रताड़ना के शिकार हुए इन नागरिकों का आंकड़ा सदन में 1987 में जहाँ तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुख़र्जी और विदेश राज्यमंत्री एडुआर्डो फलेरियो ने रखा था वहीं 2003 में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने राज्यसभा के नेता के नाते तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के समक्ष पीड़ित शरणार्थियों के लिए नागरिकता क़ानून में संशोधन का आग्रह किया था I 2014 में मनमोहन सरकार ने ही सदन में यह आंकड़ा रखा था कि 2013 में 1,11,754 पाकिस्तानी नागरिक वीजा लेकर भारत आये और यहीं रहने लगे,ये शरणार्थीबने नागरिक हिन्दू और सिख ही थे I
दृढ इच्छाशक्ति व दूरदर्शिता
2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में राजग सरकार ने सत्ता संभाली तो इसके बाद 15 जून 2015 को एक वर्ष का कार्यकाल पूर्ण होने पर सदन को बताया गया कि पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान से लगभग 4300 हिन्दू और सिख शरणार्थी 01 वर्ष के अंदर शरणार्थी बनकर भारत में आये हैं I इस जेन्युइन समस्या के उचित निदान की कड़ी में मोदी सरकार ने सितम्बर 2015 में 1920 के पासपोर्ट नियम में संशोधन के लिए अधिसूचना जारी की कि 31 दिसम्बर 2014 से पूर्व भारत में आ चुके प्रताड़ित शरणार्थियों को अवध प्रवासी नहीं माना जाएगा I इसके बाद 19 जुलाई 2016 को नागरिकता संशोधन विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया गया I 12 अगस्त 2016 को यह विधेयक संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया , संयुक्त संसदीय समिति ने नागरिकता संशोधन मसौदे का लगभग ढाई वर्ष तक गहन अध्ययन किया और जनवरी-2019 में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी । तत्पश्चात इस विधेयक को जनवरी-2019 में लोकसभा में पारित कर दिया गया था, लेकिन राज्यसभा में यह विधेयक पारित नहीं हो सका था I पिछली लोकसभा के भंग होने के साथ ही नागरिकता संशोधन विधेयक स्वत: रद्द हो गया था इसलिए अब इस विधेयक को पुन: संसद में प्रस्तुत किया जा रहा है I
धार्मिक प्रताड़ना के शिकार हुए तीन देशों से भारत में शरण लेने वाले गैर मुस्लिम नागरिकों के प्रति देश के अधिकाँश लोगों का मानवीय दृष्टिकोण रहा है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने चाहे चुनावी सभा हों या संसद के बाहर अथवा भीतर अपने इस इरादे को पुरजोर तरीके से लगातार दोहराया कि – किसी भी हिंदू, सिख, जैन, ईसाई, पारसी और बौद्ध शरणार्थी को देश से जाने नहीं दिया जाएगा और इसके लिए पहले नागरिकता (संशोधन) विधेयक को पारित करवाकर हम सभी हिंदू, जैन, सिख, ईसाई और बौद्ध शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देंगे ।
विपक्ष का दोगला चरित्र
आज विडंबना यह है कि कांग्रेस समेत समूचे विपक्षी दल जितने जोर से आतंक,लूट-खसोट और आपराधिक गतिविधियों में फंसे रोहिंग्याओं को भारत से खदेड़ने का विरोध करते रहे उतने जोर से इन्होंने कभी भारत की जड़ों से जुड़े इन बेबस व लाचार पीड़ितों को देश की नागरिकता दिलाने की बात तो दूर उनको अपनाने तक का साहस नहीं जुटाया I संविधान के अनुच्छेद 14 का हवाला देकर इसे समानता के अधिकार का उल्लंघन बताकर भारत के नागरिकता अधिनियम, 1955 की दुहाई देकर अवैध प्रवासी बनाये रखकर इनकी नागरिकता का सवाल टलता रहा । ऐसा दुष्प्रचार किया जा रहा है कि इन तीनों देशों के सभी हिन्दू अथवा अन्य अल्पसंख्यक नागरिकता प्राप्त करने के अधिकारी होंगे जो कि तथ्यहीन व गलत है I
प्रताड़ना और असुरक्षा से मुक्ति
नागरिकता संशोधन विधेयक पर विपक्ष पूर्वोत्तर राज्यों और अन्य मनगढ़ंत तर्कों से जो भी सवाल उठाये किन्तु यह विधेयक केवल और केवल देशहित से जुड़ा इसकी पहली शर्त यह है कि जो भारत में 6 वर्ष से शरणार्थी रूप में रह रहे हैं,इससे पूर्व यह अवधि अन्य विदेशी नागरिकों के लिए 12 वर्ष थी I इसी प्रकार 31 दिसम्बर 2014 तक भारत में आ चुके ऐसे प्रताड़ित नागरिकों को भी अवैध प्रवासी नहीं माना जाएगा I नागरिकता संशोधन विधेयक के पारित हो जाने से भारत में शरणार्थी के तौर पर दीर्घकाल से रह रहे पाकिस्तान, अफगानिस्तान व बांग्लादेश से धार्मिक प्रताड़ना के शिकार हुए इन अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता का रास्ता खुलेगा और उन्हें भय ,प्रताड़ना और असुरक्षा की यन्त्रणा से मुक्ति मिलेगी I वसुधैव कुटुम्बकं के व्यापक दर्शन वाले देश में इससे बड़ा मानवीय कार्य दूसरा नहीं हो सकता I लोकसभा में आसानी से पारित होने के बाद राज्यसभा के अंकगणित का उचित समाधान कर मोदी सरकार इस महत्त्व के विधेयक को पारित करवाने में कोई कोर कसर शेष नहीं रखेगी I

सूर्य प्रकाश सेमवाल

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