यूरिया उपचारित चारे को पशु आहार में सम्मलित कर पशुपालक प्राप्त करें अधिक लाभ : डॉ विवेक

पशुओ के पौष्टिक आहार में कमी को दूर करने के लिए महायोगी गोरखनाथ कृषि विज्ञानं केंद्र, पीपीगंज, गोरखपुर द्वारा किसानो को जागरूक किया जा रहा है। डॉ विवेक प्रताप सिंह, विशेषज्ञ पशुपालन ने पशुपालको को बताया पशुपालन व्यवसाय में होने वाले कुल व्यय का लगभग 60-70 प्रतिशत पोषण पर खर्च होता है तथा पोषण पर आने वाले खर्च में सर्वाधिक पशुओ को प्रोटीन की आवश्यकता को पूर्ण करने में लगता है। पशुओ के लिए प्रोटीन के मुख्य श्रोत हरे चारे, चुनी, चोकर, तथा खालियाँ है। ऐसे समय में जब हरे चारे की उपलब्धता कम रहती है और पशुओ को भूसे, पुवाल आदि पर जीवन निर्वाह करना पड़ता है तब पशुपालक को सूखे चारे के साथ अधिक मात्रा में दाना/खालियाँ देनी पड़ती है, जिससे पशु को उनकी प्रोटीन सम्बन्धी आवश्यकता पूर्ण हो सके। सूखे चारे में प्रोटीन की मात्रा 4% से भी कम होती है। इस कमी को दूर करने और प्रोटीन की मात्र बढ़ाने के लिए सूखे चारे जैसे धान और गेंहूँ का भूसा का यूरिया उपचार की विधि सबसे सस्ती तथा उत्तम है। भूसे का यूरिया से उपचार करने से उसकी पौष्टिकता बढती है और प्रोटीन की मात्रा उपचारित भूसे में लगभग 9 प्रतिशत हो जाती है। पशु को यूरिया उपचारित चारा खिलाने पर उसको नियमित दिये जाने वाल पशुआहार में 30 प्रतिशत तक की कमी की जा सकती है।

यूरिया को कभी भी जानवर को सीधे खिलाने का प्रयास नहीं करना चाहिए : डॉ सिंह ने बताया कि यह पशु के लिए जहर हो सकता है। भूसे के उपचार के समय यूरिया के तैयार घोल को पशुओं से बचाकर रखना चाहिए। पांच या 6 किलों उपचारित पुआल खिलने से दुधारू पशुओं में लगभग 1 किलो दूध की वृद्धि हो सकती है। यूरिया उपचारित चारे को पशु आहार में सम्मिलित करने से दाने में कमी की जा सकती है जिससे दूध के उत्पादन की लागत कम हो सकती है।

ऐसे तैयार करे यूरिया द्वारा उपचारित भूसा

एक क्विंटल भूसे के लिए चार किलो यूरिया का 40 लीटर साफ पानी में घोल बनाते है। भूसे को समतल स्थान पर 3-4  इंच मोटी तह में फैला कर उस पर तैयार किये गये 40 लीटर घोल का छिड़काव करते हैं। भूसे को पैरों से अच्छी तरह दबा कर उस पर पुन: भूसे की एक और पर्त बिछा दी जाती है और उस पर यूरिया के घोल का समान रूप से छिड़काव किया जाता है। इस दबाए गए भूसे के उपर पुनः एक क्विंटल भूसा फैलाएं पुनः चार किलो यूरिया को 40 लीटर पानी में घोलकर फवारे से भूसे के ऊपर छिडकाव करें और पहले की तरह इस परत को भी पैरो से अच्छी तरह दबाएँ।

इस तरह एक एक ऊपर एक सौ-सौ किलो की 10 परतें डालते जाएँ, घोल का छिड़काव् करते जाएं और दबाते जाएँ। उपचारित भूसे को प्लास्टिक शीट से ढक दें और उसमें जमीन में छुएँ वाले किनारों पर मिट्टी डाल दें। जिससे बाद में बनने वाली गैस बाहर न निकल सके। प्लास्टिक शीट न मिलने की स्थिति में ढेर के उपर थोड़ा सुखा भूसा डालें। उस पर थोड़ी सुखी मिट्टी/पुआल डालकर चिकनी गीली मिट्टी/गोबर से लीप भी सकते हैं। एक बार में कम से कम एक टन भूसे का उपचार करना चाहिए। एक टन भूसे के लिये 40 किलो यूरिया और 400 लीटर पानी की आवश्यकता होती है।  उपचार किये गये भूसे के ढेर को गर्मी में 21 दिन व सर्दी में 26 दिन बाद ही खोलें। खिलाने से पहले भूसे को लगभग 10 मिनट तक खुली हवा में फैला दे। जिससे उसकी गैस उड़ जाए। शुरुआत में पशु को उपचारित भूसा थोड़ा-थोड़ा दें। धीरे-चीरे आदत पड़ने पर पशु इसे चाव से खाने लगता है।

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