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वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ कौंच पर्वत कार्तिकेय मंदिर में महायज्ञ शुरू

संतोष सिंह नेगी/देवभूमि उत्तराखण्ड के जनपद रुद्रप्रयाग का कार्तिक स्वामी पवित्र पर्यटन स्थल है। कौंच पर्वत पर स्थित कार्तिक स्वामी में महायज्ञ की शुरुआत वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ शुरू हो गयी है। कार्तिक स्वामी में कई वर्षों से चली आ रही परंपरा आज भी कायम है प्रत्येक वर्ष 6 जून से महायज्ञ की शुरुआत वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ शुरु होती है।

13 जून को कलश यात्रा एंव 14 जून को पूर्णाहुति के साथ महायज्ञ का समापन किया जाता है इस महायज्ञ में 365 गाँवों के लोग मौजूद रहते है। भगवान कार्तिक स्वामी के दर्शनों के लिए देश के कोने-कोने से श्रद्धालु आते है।कलकत्ता से यात्रा पर आयी  गोपा पाल , कृष्णा घोष और सुभोधनी का कहना है कि जहां भगवान कार्तिक स्वामी विराजमान है वह सबसे पवित्र है लेकिन रास्ता सही न होने के कारण परेशानी होती है और देवभूमि उत्तराखंड की हरियाली ने हमारा मन मोह लिया है।

मंदिर समिति के अध्यक्ष शत्रुघ्न नेगी का कहना है कि पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सरकार कदम-कदम पर साथ दे रही है और सरकार ने रास्ते के लिए 4 करोड़ की राशि स्वीकृत की गयी है। रास्ते के निर्माण का काम प्रगति पर चल रहा है पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने भी मंदिर समिति को आश्वासन दिया है की कार्तिक स्वामी को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा।

एक नजर में कार्तिक स्वामी पौराणिक कथानुसार

एक बार भगवान शिव ने अपने दोनों पुत्रों से कहा जो ब्रह्माण्ड का पहले परिक्रमा लगाकर यहां आएगा वह माता-पिता की पूजा का प्रथम अवसर प्राप्त होगा। गणेश शिव भगवान के दूसरे पुत्र थे।गणेश ने माता पिता की परिक्रमा करके कहा की माता पिता ही मेरे लिए ब्रह्माण्ड है      जब कार्तिकेय ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करके आये तो क्रोधित हो गए तब उन्होंने अपनी शरीर की हड्डियों को पिता शिव और मांस माता पार्वती को दे दिया।

ये हड्डियाॅ आज भी कार्तिकेय मंदिर में मौजूद है जिन्हें हजारों भक्तों के द्वारा पूजा-अर्चना की  जाती है भारतवर्ष में कार्तिकेय का केवल यही मंदिर है। देवभूमि उत्तराखण्ड में हरिद्वार से 164 किमी दूर मोटर मार्ग रुद्रप्रयाग से पोखरी मोटर मार्ग पर 38 कि0मी0 दूर स्थित कनकचौंरी से आगे 3 किलोमीटर पैदल चलकर है। सहसा प्राकृतिक सौन्दर्य का दृश्यावलोकन करते करते भाव-विभोर हो जाता है। कनकचौंरी से क्रौंच पवर्त के दर्शन करने से ही आभास हो जाता है कि प्रकृति ने क्रौंच पवर्त का निर्माण दैवीय शक्ति के दिग्दर्शन हेतु किया है। इस शान्त वातावरण में भटके मन को असीम अध्यात्मिक शान्ति मिलती है।

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