लिव इन में रहने वाले शादी से करेंगे इंकार तो देना पड़ सकता है मुआवजा
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तृप्ति रावत/ लिव इन रिलेशन में रह रही महिलाओं के साथ संबंध बनाने के बाद धोखा-धड़ी मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। लंबे समय से लिव इन रिलेशन में रह रहे संबंधो को शादी के बराबर माना जा सकता है? यदि हां तो ऐसे रिस्तों के लिए तय समय सीमा क्या होगी? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से राय मांगी है कि क्या ऐसे रिस्तों को शादी की तरह माना जा सकता है। और क्या ऐसे रिस्तों में पुरुष पार्टनर का उत्तरदायित्व तय किया जा सकता है।

जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और अब्दुल नजीर की बेंच ने ये बात कही है। सुप्रीम कोर्ट लिव इन रिलेशन में रहने वाली महिलाओं को घरेलू हिंसा कानून के तहत आने, गुजारा भत्ता पाने और संपत्ति में हिस्सा पाने के योग्य करार चुका है। अब कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या लंबे समय तक चले करीबी रिश्तों को ‘शादी जैसा’ माना जा सकता है? रिश्ते को ‘शादी जैसा’ मानने का पैमाना क्या होना चाहिए? कितने वक्त तक चले रिश्ते को ऐसा दर्जा दिया जाए?

मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट बेंच ने सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी को इस मामले में मदद के लिए एमिकस क्यूरी के तौर पर नियुक्त किया है। कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल को भी निवेदन करते हुए नोटिस जारी किया है कि इस मामले में मदद के लिए अडिशनल सॉलिसिटर जनरल को नियुक्त किया जाए।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने एक व्यक्ति पर लगे रेप के आरोप के खिलाफ याचिका पर सुनवाई के दौरान यह फैसला सुनाया है। इस व्यक्ति पर आरोप लगाने वाली महिला एक बच्ची की मां है, जो उसके साथ 6 साल से रह रही है। आरोपी ने पहले महिला से शादी का वादा किया था, बाद में मुकर गया।

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि,“भले ही कोई क्राइम न किया गया हो लेकिन यह ध्यान में रखना होगा कि महिला पार्टनर के साथ शोषण न हो और न ही उसे बिना किसी उपाय के छोड़ दिया जाए।”

इस नोटिस में कहा गया है कि पहले भी कई फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में घरेलू हिंसा एक्ट, उत्तराधिकार एक्ट के तहत लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं की सहायता की है। लेकिन ये भी पाया गया है कि ऐसे रिश्तों को कानूनी रूप से मान्यता नहीं है।

कोर्ट ने 2012 में छपे एक आर्टिकल का भी रिफरेंस दिया। इसमें सूप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस एके गांगुली ने लिव-इन रिलेशनशिप और ‘शादी जैसे रिश्तों’ को लेकर संशय को दूर करने पर जोर दिया था।

इस आर्टिकल में रिटायर्ड जज ने कहा था कि लिव इन रिलेशनशिप और ऐसे रिश्तों को शादी की कसौटी पर भी परखा जाना चाहिए। इसके साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या देश के पर्सनल लॉ में उन्हें जगह दी जा सकती है।

   

  

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