कैराना उपचुनाव दे गया 2019 के कई सारे संकेत
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रवि उपाध्याय/हाल ही में संपन्न हुए कैराना लोकसभा उपचुनाव में पूरे राष्ट्र की नजरें टिकी हुईं थी क्योंकि 2019 लोकसभा उपचुनाव से पहले यह आखिरी सेमीफाइनल उपचुनाव था। इस चुनाव को इतना महत्वपूर्ण बनाने के पीछे कितने ही कारण सामने आ जाते है।करीब 2 साल पहले महाभारतकालीन कर्ण की नगरी  कैराना में हुए हिन्दुओं के पलायन का मुद्दा कैराना सांसद बाबू हुकुम सिंह ने उठाय़ा था जिसके बाद से कैराना पूरे हिन्दुस्तान की गलियों में जाना जाने लगा।

देशभर की निगाहों में आए कैराना पलायन के बाद भाजपा पार्टी की यूपी में ऐसी चुनावी लहर चली की साल 2017 के विधानसभा  चुनाव में भाजपा पार्टी ने प्रचण्ड बहुमत हासिल किया था।अब इस पलायन के मुद्दे को उठाने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में से एक बाबू हुकुम सिंह भी अब अपनी जीवन यात्रा पूरी कर गये थे।अपने पीछे छोड़ गये क्षेत्र में राजनीतिक और सामाजिक रूप से स्थापित किए हुए विकास के उच्च मापदंड।

इससे पहले साल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले हुए शामली मु.नगर दंगों में प्रभावित हुए कैराना ने कई राजनीतिक पार्टियों के दलित, जाट, मुस्लिम मतों के चुनावी समीकरण को धारासाई कर दिया था।इसका सीधा असर लोकसभा के चुनाव में देखने को मिला।नतीजन यह हुआ कि यूपी की कई राजनीतिक पार्टी लोकसभा चुनाव में एक भी सीट अपने नाम नहीं कर सकी।

हाल ही में कैराना की नवनिर्वाचित सांसद ने भी जीतने के बाद कहा था कि नरेन्द्र मोदी जी ने भाजपा पार्टी का जीत सफर कैराना से शुरू किया था और हमने कैराना में ही खत्म कर दिया।यह बयान देखने में तो बहुत साधारण सा लगता है लेकिन अपने आप में बहुत कुछ कह रहा था।यानि भाजपा पार्टी का जीत का सफर कैराना के पलायन,दंगा और सभी हिन्दू मतदाताओं के एक साथ भाजपा पार्टी के पक्ष में मतदान करने को लेकर शुरू हुआ था।इसीलिए महागठबंधन की विजयी प्रत्याशी तबस्सुम हसन ने यह बयान दिया था।

यह बयान इस मायने में भी बहुत महत्यपूर्ण नजर आ रहा था क्योंकि इस महागठबंधन ने भाजपा पार्टी के हिन्दुत्व के एजेंडे पर चुनाव जीतने की मंशा पर पानी फेर दिया था।अब अगला लोकसभा चुनाव आंहे भरता हुआ नजदीक ही आ रहा है।ऐसे में भाजपा पार्टी के विजयी रथ को रोकने के लिए विपक्षी पार्टी भी कई संकेत दे रही है।कैराना चुनाव का महत्व इसी से लग जाता है क्योंकि यह चुनाव अगली लोकसभा के लिए भाजपा पार्टी के लिए कई संकेत दे गया है।

भाजपा से कैराना छिनने के बाद विजयी रथ पर सवार होकर बेगम तबस्सुम जब सपाध्यक्ष अखिलेश यादव से मिलने लखनऊ पहुँची तो साथ में रालोद के युवराज जयंत चौधरी सपा के वरिष्ट नेतागण लखनऊ में तबस्सुम के साथ मौजूद थे।यह मुलाकात देखनेभर से ही अगले चुनाव के लिए कई संकेत दे रही थी।अब देखना यह होगा कि यूपी के मायावती अखिलेश के इस मायावी गठबंधन से रालोद पार्टी पिछड़ती है या नहीं या फिर अपनी परम्परागत जाट बाहुल क्षेत्र की 3 लोकसभा सीटों पर ही अपनी उम्मीदवारी ठोकती है।अगले लोकसभा चुनाव में बुआ बबुआ की जोड़ी लगभग तय मानी जा रही है।दोनों के बीच सीटों पर भी सहमति बनती नजर आ रही है।

News Reporter

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