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2004 तक वेदांता समूह में बतौर निदेशक पी चिदंबरम और उनके पुत्र का महाघोटालों का खेल

मैं पालनिअप्पन चिदंबरम शपथ लेता हूं कि मैं संविधान को ठेंगे पर रखूंगा। मंत्री पद का उपयोग स्वहित में करूंगा। सरकार की संपत्ति को अपनी संपत्ति समझूंगा और उसका उपभोग अपने परिवार के भरण-पोषण में करूंगा। जो कोई भी इसमें बाधा उत्पन्न करेगा, वह भारतीय दंड संहिता के अनुसार दंड का अधिकारी होगा।  संप्रग सरकार में जब वे वित्तमंत्री बने थे तब उन्होंने यही शपथ ली होगी। इसीलिए वे भारत के राजकोष का उपयोग विदेशों में निजी संपत्ति बनाने में कर रहे थे। कानून की भाषा में इसे काला धन कहते हैं जिसे गैरकानूनी माना जाता है।पर चिदंबरम के लिए यह सब मायने नहीं रखता था। मगर कालाधन अधिनियम ने सब बदल दिया। इसी कानून के तहत रसूखदार चिदंबरम कुनबे के खिलाफ आयकर विभाग ने मद्रास की विशेष अदालत में चार्जशीट फाइल की है। यह पहले भी हो सकता था। कई अधिकारियों ने कोशिश भी की थी। मसलन नोएडा के आयकर कमिश्नर संजय श्रीवास्तव और प्रवर्तन निदेशालय के उप निदेशक राजेश्वर सिंह।

लेकिन जब बात नहीं बनी तो उपेन्द्र राय ने भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई गई। पर उनकी यह बाजीगरी चली नहीं।सीबीआई ने उन्हें दबोच लिया। इनके खिलाफ दो एफआईआर हुई है। उपेन्द्र राय पर आपराधिक षड़यंत्र रचने और धोखाधड़ी करने का आरोप है।बेबसाइट की मानें तो चिदंबरम के राजदार उपेन्द्र, राजेश्वर सिंह को कई बार धमका चुके है। पहला प्रयास तब हुआ था जब राजेश्वर सिंह ने नीरा राडिया को तलब किया था।“पी.चिदंबरम फंस गए हैं। उनके कारनामों की परतें खुलने लगी हैं। आयकर विभाग ने पूरे परिवार के खिलाफ कालाधन अधिनियम के तहत चाजर्शीट फाइल की है। वित्त मंत्रालय में मौजूद उनके राजदार अधिकारी भी उन्हें नहीं बचा पाए।”

उस दौर में इनके खिलाफ कई शिकायतें हुए थीं। उसे 2011 में हाई कोर्ट ने खारिज किया था। लेकिन जब चिदंबरम वित्त मंत्रालय में लौटे तो उन्होंने प्रवर्तन निदेशालय से राजेश्वर को हटाने की जी तोड़ कोशिश की। 2012 में वित्तमंत्री चिदंबरम ने राजेश्वर को बाहर का रास्ता दिखा दिया। प्रवर्तन निदेशालय में उनकी नियुक्ति को रद्द कर दिया गया। राजेश्वर सिंह केंद्रीय प्रशासनिक प्राधिकरण(कैट) चले गए। उसने राजेश्वर सिंह को निदेशालय में पुन: बहाल कर दिया। लेकिन इससे राजेश्वर सिंह की राह असान नहीं हो गई। पीगुरुज के मुताबिक संप्रग जाने के बाद भी चिदंबरम ‘गिरोह’ के लोग पीछे पड़े रहे।तत्कालीन राजस्व सचिव शशिकांत दास उन्हीं में से एक हैं।इन लोगों ने न्यायालय को बताया कि एयसेल मैक्सिस की जांच पूरी हो चुकी है। इसलिए राजेश्वर को प्रवर्तन निदेशालय से हटा दिया जाए। पर तत्कालीन राजस्व सचिव शशिकांत दास अपने ‘आका’ की ही तरह विफल रहे। राजेश्वर का वे कुछ कर नहीं पाए। अब सवाल यह है कि चिदंबरम और उनका ‘गिरोह’ राजेश्वर सिंह को बर्बाद करने पर क्यों तुला है?  इसकी कहानी राजेश्वर सिंह  के उस ख़त में दर्ज है जो उन्होंने राजस्व सचिव हसमुख अधिया को लिखा था। वे लिखते है कि ‘मुझे चिदंबरम के गुर्गे इसलिए परेशान कर रहे हैं क्योंकि मैं अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहा हूं।

उनकी मंशा है कि मुझे एयसेल-मैक्सिस मामले से हटा दिया जाए।  यह कोशिश चिदंबरम के ठिकानों पर छापेमारी करने के बाद तेज हो गई है।’ राजेश्वर सिंह ने जो कुछ पत्र में लिखा है उससे न्यायालय भी इत्तेफाक रखता है। यही वजह है कि उनके खिलाफ हुई तमाम शिकायतों को कोर्ट ने खारिज कर दिया। आदेश दिया कि जांच राजेश्वर सिंह ही करेंगे।

चिदंबरम और कुनबे की काली कहानी

राजेश्वर सिंह जिस एयरसेल-मैक्सिस घोटाले की जांच कर रहे हैं वह 2 जी से जुड़ा है। इसकी जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो रही है। आरोपी चिदंबरम हैं।उन पर आरोप है कि इस सौदे में तत्कालीन वित्तमंत्री ने नियम कानून के इतर जाकर काम किया था।  मंत्री के पास उस दौर में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के तहत महज 600 करोड़ रुपये तक की मंजूरी देने का अधिकार था।इससे अधिक का विदेशी निवेश होने पर, उसे आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति से पास करना होता था। लेकिन संविधान को ठेंगे पर रखने वाले चिदंबरम के लिए आर्थिक समिति कोई मायने नहीं रखती थी।  इसीलिए उन्होंने बिना आर्थिक समिति से पूछे 3500 करोड़ रुपये का विदेशी निवेश होने दिया। चिदंबरम पर आरोप है कि इसके एवज में मैक्सिस कंपनी से रिश्वत ली थी। वह पैसा चिदंबरम के दुनिया भर में फैले खातों में डाला गया था।  इसी तरह आईएनएक्स मीडिया से भी घूस लिया गया था। उसे विदेशी प्रत्यक्ष निवेश बोर्ड ने 4.62 करोड़ रुपये निवेश करने की मंजूरी दी थी। यह बात आईएनएक्स को नागवार गुजरी।

“बाप- बेटे ने आईएनएक्स मीडिया यानी इन्द्राणी मुखर्जी से मोटी रकम वसूली। यह वही इन्द्राणी मुखर्जी है जो बाप-बेटे के कारनामों की गवाह है। इसीलिए चिदंबरम डरे हुए हैं।”

इससे उनके रसूख को चोट पहुंची। उन्होंने बोर्ड की बात को अनसुना कर दिया और विदेश से 300 करोड़ रुपये का निवेश करा दिया।  यह मामला ज्यादा दिन छुपा नहीं। कहीं से 2008 में आयकर विभाग को इस हेराफेरी की खबर मिल गई।विभाग ने इस संबंध में एफआईपीबी से जवाब मांगा। उसने छानबीन करना शुरू कर दिया। आईएनएक्स मीडिया से विदेशी निवेश के संबंध में पूछताछ की गई।इससे वह घबरा गए। उन्हें लगा कि कानूनी पचड़े में फंसने से अच्छा है, कुछ खर्च करके मामले को निपटा दिया जाए। इसके लिए किसी लायक व्यक्ति की दरकार थी। इसी दौरान उनकी मुलाकात कार्ति चिदंबरम से हुई। उन्होंने पूरी कहानी कार्ति को सुनाई। कार्ति ने उनका मामला अपने रसूख के बल पर रफा-दफा करा दिया। पर यह सब ‘जनसेवा’ में नहीं हुआ। इसके लिए बाप- बेटे ने आईएनएक्स मीडिया यानी इन्द्राणी मुखर्जी से मोटी रकम वसूली। यह वही इन्द्राणी मुखर्जी है जो बाप-बेटे के कारनामों की गवाह है। इसीलिए चिदंबरम डरे हुए हैं।

पीगुरुज का दावा है कि गवाह को जेल में मारने की साजिश रची जा रही है। यह षड़यंत्र कोई और नहीं चिदंबरम रच रहे हैं। दो बार इन्द्राणी को मारने की कोशिश हो चुकी है।लेकिन दोनों बार वह बच गई। बेबसाइट के मुताबिक पूछताछ में इन्द्राणी ने कबूल किया कि उसने कार्ति चिदंबरम को रिश्वत दी थी। उसका एक हिस्सा पी.चिदंबरम को भी गया।

वेदांता की बने ढाल

पी.चिदंबरम के हिस्सेदारी की लंबी कहानी है। उन पर हितों के टकराव के कई आरोप हैं। वेदांता ग्रुप और एनरॉन इसकी मिसाल है। दोनों ही कंपनी से चिदंबरम जुड़ रहे हैं। चिदंबरम पर आरोप है कि वित्तमंत्री बनने के बाद दोनों को लाभ पहुंचाने के लिए संविधान और पद की मर्यादा को ताख पर रखकर काम किया। इससे भारत के राजकोष और प्राकृतिक संसाधनों का बहुत नुकसान हुआ। वरिष्ठ पत्रकार परांजय गुहा ठकुरता लिखते हैं कि 2004 में वित्तमंत्री बनने से पहले यानी 22 मई 2004 तक वेदांता समूह में बतौर निदेशक कार्यरत थे। इस दौरान 70,000 डालर उन्हें मेहनताना मिला। ठकुरता के मुताबिक जब चिदंबरम वित्तमंत्री बने तो वेदांता समूह पर हवाला और कर चोरी का आरोप था। उनके अनुसार,  प्रवर्तन निदेशालय ने जांच में पाया था कि वेदांता समूह ने विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम का उल्लंघन किया था। कंपनी निदेशक 208 करोड़ रुपये देश से बाहर ले कर गई थी। लिहाजा निदेशालय ने समूह के निदेशक अनिल अग्रवाल, नवीन अग्रवाल और डीपी अग्रवाल के खिलाफ मामला दर्ज किया। कंपनी पर 25 करोड़ रुपये का जुर्माना ठोका। कंपनी के निदेशक अनिल अग्रवाल को यह बात नगावार गुजरी। जो मुमकिन भी था क्योंकि कभी उनका मुलाजिम रहा व्यक्ति वित्तमंत्री बन गया था। उसके रहते हुए निदेशालय उन पर जुर्माना कैसा लगा सकता था? लिहाजा वे निदेशालय के आदेश को चुनौती देने के लिए विदेश विनियमन अपील प्राधिकरण चले गए।        उसने निदेशालय के आदेश पर रोक लगा दी। निदेशालय ने प्राधिकरण के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। न्यायालय ने वेदांता को जुर्माना जमा करने का आदेश दिया। वह कंपनी की इस दलील को मनाने के लिए तैयार नहीं था कि उसके पास धन नहीं है। यह मामला 2009 में दोबारा कोर्ट पहुंचा। इस बार वेदांता के पक्ष में निर्णय कराने के लिए बेंच ही बदल दी गई।

न्यायाधीश मनमोहन की जगह न्यायधीश डॉ. एस मुलीधर को लाया गया। निदेशालय का पक्ष वकील सुरेश काटयाल को रखा था, उनकी जगह पी. चिदंबरम के कनिष्ठ वकील सचिन दत्ता को भेजा गया। जाहिर है चिदंबरम की वफादारी वेदांता समूह को लेकर बनी हुई थी। वह इस कदर थी कि वेदांता समूह के कई सौ करोड़ रुपये के कर को भी चिदंबरम ने अनदेखा कर दिया था।

जनरल इलेक्ट्रिक कनेक्शन

अमेरिका के रिप्रजेन्टेटिव हाऊस ने 22 फरवरी 2002 को एक रिपोर्ट जारी की थी। उसका नाम ‘बैकग्राउंड ऑन एनरॉन डाभोल पॉवर प्रोजेक्ट’ है। रिपोर्ट के अनुसार डाभोल परियोजना के लिए पी.चिदंबरम समेत भारत के कई बड़े नेताओं को घूस भी दिया गया।इसीलिए बतौर वाणज्यि मंत्री पी. चिदंबरम ने डाभोल पॉवर प्रोजक्ट के पक्ष में आम राय बनाने के लिए अभियान चला रहे थे। रिपोर्ट में लिखा है कि मंत्री बनने से पहले चिदंबरम एनरॉन के कानूनी मामलों को देखते थे और इसकी एवज में एनरॉन चिदंबरम को ‘उचित मेहनताना’ भी देता था।

कमोवेश यही बात दुनिया के एक प्रतष्ठित कानूनी जर्नल ने भी चिदंबरम के बारे में ही कहा है। उस जर्नल का नाम  ‘वंडेरबिलट जर्नल ऑफ ट्रांसनेशनल लॉ’ है। इस जर्नल का अंक 41:907 डाभोल परियोजना पर है।इसमें उजागर किया गया है कि परियोजना क्यों विफल रही? इसके कई कारण बताए गये हैं। मगर उसमें सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात रिश्वतखोरी की है।जर्नल के मुताबिक  डाभोल परियोजना के लिए चिदंबरम समेत  कई मंत्रियों को उपहार के रूप में रिश्वत दी थी। इन आरोपों की पृष्ठभूमि में यदि वी.श्रीधर के लेख को देखा जाए तो पी.चिदंबरम सवालों के बवंडर में फंसते नजर आते हैं। उनका लेख फ्रंटलाइन (30 जुलाई-12 अगस्त, 2005) में छपा था। उसके मुताबिक 2004 में यूपीए सरकार का गठन होता है। सरकार डाभोल बिजली परियोजना को जिंदा करने की कवायद शुरू कर देती है।इसके लिए विशेष कोष का गठन किया जाता है। वित्त मंत्रालय इस कोष को काउंटर गारंटी प्रदान करता है। मतलब यदि विशेष कोष डाभोल बिजली परियोजना के मालिक और विदेशी ऋणदाताओं की देनदारी चुकाने में विफल हो जाता है तो वित्त मंत्रालय उसका भुगतान करेगा।

वी.श्रीधर के मुताबिक वित्त मंत्रालय ने आईडीबीआई, केनरा बैंक, भारतीय स्टेट बैंक, भारतीय औद्योगिक वित्त निगम और आईसीआईसीआई पर दबाव बनाया कि वे डाभोल के ऋण को चुकाएं।श्रीधर लिखते हैं कि जीई का डाभोल परियोजना पर 20 मिलियन डॉलर लगा था। उसकी एवज में सरकार ने उन्हें 305 मिलियन डॉलर दिया। नोएडा के आयकर कमीशन संजय श्रीवास्तव कहते हैं कि जो रकम जीई को हर्जाने के रूप में दी गई है, उसमें से 140 मिलियन डॉलर चिदंबरम को बतौर रिश्वत जीई ने दी थी।

वे कहते हैं कि वह पैसा एनडीटीवी के जरिए आया था। एनडीटीवी और चिदंबरम की साठगांठ के बारे में एस.गुरुमूर्ति और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी भी बहुत कुछ लिख चुके हैं।

लेखक: जितेन्द्र चतुर्वेदी ( य़थावत से साभार)
News Reporter
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