सोमनाथ चटर्जी:दक्षिणपंथी पिता के वामपंथी पुत्र
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अपनी विशेष शैली से अपने विरोधियों को भी प्रभावित करने वाले सोमनाथ चटर्जी नहीं रहे। सोमनाथ चटर्जी, दक्षिणपंथी पिता के वामपंथी पुत्र थे। यह सहिष्णुता के बीच तर्कशीलता के ही रुपांतरण का परिणाम था। उनके पिता निर्मलचंद्र चटर्जी भारत के सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वक़ील थे और बाद में कोलकाता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने। उनके नाम अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय उपलब्धियां थीं। देश की आज़ादी के साल यानी 1947 में ग्वालियर में आयोजित होने वाले अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के सत्र की उन्होंने अध्यक्षता की थी। लेकिन अगले ही साल जब महात्मा गांधी की हत्या हो गयी,तो निर्मलचंद्र चटर्जी को उग्रपंथ से जुड़ी किसी भी तरह की विचारधारा से मोहभंग होने लगा,उन्हें गांधी की हत्या से गहरा धक्का लगा। ड्रॉप्सी जैसी बीमारी और सदमें से अपनी बिगड़ती सेहत के कारण कुछ दिनों तक वो अपने काम काज से भी दूर हो गये । ।हालांकि उन्होंने आज़ादी के बाद होने वाले भारतीय संसदीय प्रणाली का पहला चुनाव हुगली संसदीय क्षेत्र से अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के प्रत्याशी के तौर पर ही लड़ा और संसद में दाखिल भी हुए।तीसरा लोकसभा का उपचुनाव बतौर स्वतंत्र उम्मीदवार वर्धमान से लड़े और वो लोकसभा में दाखिल हुए।चौथा लोकसभा चुनाव भी उन्होंने एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में ही जीता। 1971 में सोमनाथ चटर्जी के पिता निर्मलचंद्र चटर्जी की मौत हो गयी और इसी सीट से सोमनाथ चटर्जी ने अपने पिता के उत्तराधिकारी के तौर पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) के उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीत लिया।

सोमनाथ चटर्जी के लोकसभा चुनाव जीतने का सिलसिला जारी रहा । वो दस बार लोकसभा के सांसद रहे।चटर्जी,1984 में जादवपुर सीट पर हुए लोकसभा का एक मात्र चुनाव पश्चिम बंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से हार गए थे।कोलाकाता और कैंबिज विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई करने वाले सोमनाथ चटर्जी ने आख़िरी पंक्ति के भारतीय नागरिकों के बीच रहकर ही अपनी राजनीतिक और सामाजिक समझ विकसित की। अपने पिता की विरासत का फ़ायदा उन्हें ज़रूर मिला,मगर उन्होंने अपनी राह आप चली। अपनी समझ को लेकर उनका आत्मविश्वास उनके व्यक्तित्व का एक अहम हिस्सा रहा।यही कारण है कि एक हिन्दूवादी पिता का पुत्र होने के बावजूद विचारधारा के स्तर पर उन्होंने एक अलग लाइन अख़्तियार की। उनकी समझ को लेकर उनके इस आत्मविश्वास की परख उस समय भी हुई,जब 2008 में यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान जब वो लोकसभा अध्यक्ष थे,उनकी अपनी विचारधारा वाली पार्टियों ने परमाणु समझौते के मुद्दे पर उस सरकार से अपनी समर्थन वापसी का ऐलान कर दिया था।उनकी पार्टी की अपेक्षा भी थी कि सोमनाथ चटर्जी अपने लोकसभा अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दें,लेकिन उन्होंने यह कहते हुए स्पष्ट रूप से मना कर दिया कि लोकसभा अध्यक्ष किसी पार्टी का नहीं होता,इस पद पर बने किसी भी शख़्स की प्रतिबद्धता किसी पार्टी के प्रति नहीं,संविधान के प्रति होती है। पार्टी ने सोमनाथ चटर्जी की इस संवैधानिक प्रतिबद्धता को पार्टी को नुकसान पहुंचाने वाली एक राजनीतिक नाफ़रमानी की तरह देखा और सोमनाथ चटर्जी को सीपीएम पोलित ब्यूरो ने पार्टी से बेदखल कर दिया।अगले ही साल यानी 2009 में सोमनाथ चटर्जी ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया।बाद में उन्हें सक्रिय राजनीति में लाने की कोशिशें भी हुईं,लेकिन उनकी राजनीतिक समझ ने शायद यह तय कर लिया था कि मौजूदा राजनीति का रंग-ढंग उनके क़ाबिल नहीं,लिहाज़ा वो सियासी वापसी कभी नहीं कर पाये।मगर लोकसभा की अध्यक्षता वाली उनकी विशेष शैली,गंभीर विषयों पर भी उनकी सहजता और हंसी मज़ाक के रास्ते भी गंभीर विषयों पर सांसदों से दो-चार करा लेने की कला ने उन्हें विशेष बना दिया था।शालीनता और प्रखरता के संतुलन के साधक और अपने ही रौ में बहने वाले जनप्रतिनिधि सोमनाथ चटर्जी को हमारी श्रद्धांजलि।

-उपेन्द्र चौधरी

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