रक्षाबंधन की तरह भाईदूज भी भाई बहन के बीच प्रेम का त्यौहार जानें महत्व
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दीपावली के 2 दिन बाद मनाया जाने वाला त्यौहार भाई दूज भारत देश का सबसे प्रमुख और महान त्यौहार है रक्षाबंधन की ही तरह यह त्यौहार भी बहन भाई के बीच प्यार के प्रकटीकरण का एक दिव्य अनुभव है। आज के भागते दौडते समय में परिवार के हर व्यक्ति का कामकाज के सिलसिले में अलग अलग रहना आम बात है ऐसे में भाई दूज जैसे त्यौहार की सार्थकता और बढ़ जाती है क्योंकि इन त्यौहारों के बहाने रिश्तों में ताजगी भर जाती है। इस दिन बहनें अपने प्रिय भाइयों के लिए भगवान से प्रार्थना करती हैं ताकि वे लंबी आयु और समृद्ध जीवन प्राप्त कर सकें। बहनें भाईयों की टीका कर आरती करती हैं और भाइयों से उपहार प्राप्त करती हैं। हमारे देश में त्यौहार की श्रृंखला ऐसी है कि पूर्व से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण तक एक सूत्र में बंध जाते हैं इन त्यौहारों का मकसद ही है प्रेम और सौहार्द। भाई दूज को पूरे भारत में अलग अलग नाम से जाना जाता है जैसे गोवा, महाराष्ट्र और कर्नाटक में भाई बीज,मणिपुर में निकोल चाकुबा,गुजरात में भाई बिज,ओडिशा में भथरु द्वितीया ,तथा नेपाल में भाई टीका के नाम से मनाया जाता है।

भाई दूज का इतिहास
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार एक दिन मृत्यु के देवता यमराज अपनी बहन यमी (यमुना) के घर बहुत दिनों के बाद पहुँचे यम को अपने घर देखकर यमुना को खुशी का ठिकाना ना रहा बहन ने भावविभोर होकर भाई की आरती उतारी और तिलक कर उनका स्वागत किया उसके बाद खाने के लिए मिठाई सहित एक माला और विशेष व्यंजन पेश किए। उस दिन यमराज ने खुश होकर घोषणा की थी कि जो भाई अपनी बहन द्वारा तिलक और आरती प्राप्त कर यमुना में स्नान करेंगे उनका जीवन वैभवशाली होगा। यही कारण है कि इस दिन को यम द्वितिया भी कहा जाता है।

भाई दूज की एक कथा भगवान श्रीकृष्ण और उनकी बहन सुभद्रा से भी जुड़ी है जिसके अनुसार, भगवान कृष्ण इस दिन राक्षस राजा नारकासुर का वध करने के बाद अपनी बहन सुभद्रा के घर पहुँचे थे, जहां उनकी बहन ने तिलक, आरती, मिठाई और फूलों के साथ स्वागत किया था। नरकासुर वही दैत्य था जिसने 16000 महिलाओं को बंदी बना रखा था और भगवान कृष्ण ने उन सभी को नरकासुर के चंगुल से आजाद कराया था।
भाई दूज मनाने का तरीका
कार्तिक में शुक्ल पक्ष के दूसरे दिन सभी बहनें सुबह जल्दी उठकर बेहतर भविष्य और उनके भाइयों के स्वास्थ्य के लिए भगवान और देवी-देवताओं से पूजा और प्रार्थना करती हैं और भाई को किसी आसन पर बैठाकर एक थाल में चावल के घोल से पांच शंक्वाकार आकृति बनाकर उसके बीच में सिंदूर लगा दिया जाता है। फिर 6 कुम्हरे का फूल, सिंदूर, 6 पान के पत्ते, 6 सुपारी, बड़ी इलायची, छोटी इलाइची, हर्रे, जायफल और एक लोटा जल के साथ भाई के दोनों हाथों में चावल का घोल एवं सिंदूर लगा देती है। फिर हाथ में शहद,गाय का घी और चंदन लगा देती है। फिर भाई के दाहिने हाथ में पान का पत्ता, सुपारी, कुम्हरे का फूल, जायफल रखकर भगवान यम से प्रार्थना करती हैं की जितनी बड़ी यमुना जी की धारा उतनी बड़ी मेरे भाई की आयु। यह कहकर बहन अपने भाई के लिए भगवान से वरदान मांगती हैं।
फिर बहन भाई को अपने हाथों से बनाए गए व्यंजन खिलाती है। यह भाी मान्यता है कि इस दिन भाई को बहन के घर जाकर ही भोजन करना चाहिए अपने घर पर नही।
कुल मिलाकर यह त्यौहार भाई बहन के रिश्तों में नया रस भरते का काम करता है आज के समय के युवा जो अपने बहनों से दूर होते हैं या जिन महिलाओं के सगे भाई नही होते वो अपने रिश्ते के चाचा या मामा के लडकों के साथ यह त्यौहार मनाती हैं या फिर चांद को अपना भाई मानकर उसकी आरती और पूजा करती हैं इसी वजह से चंद्रदेव को चंदा मामा भी कहा जाता है।

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