‘अटल जी और बलरामपुर’, भारतीय राजनीति के अप्रतिम  अटल जी पर विशेष

भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेई का आज जन्मदिन है। उत्तर प्रदेश का बलरामपुर जिला अटल बिहारी वाजपेई के कर्मक्षेत्र रहा है बलरामपुर की धरती से अटल जी का विशेष लगाव रहा है। भारत रत्न स्व.अटल बिहारी वाजपेयी जी के निधन पर बलरामपुर के एमएलके कालेज के डॉ. प्रकाश चन्द्र गिरि अटल जी को याद करते हुए कहते हैं, की अटल जी ने भारतीय राजनीति में जो शानदार पारी खेली उसका प्रशिक्षण उन्होंने बलरामपुर में ही प्राप्त किया था। इस क्षेत्र के सुदूर गांवों तक अनेक लोगों से उनके व्यक्तिगत संबंध थे।सन 1957 में पहली बार वे बलरामपुर से ही संसद में गये।यद्यपि हमारा परिवार कट्टर कांग्रेसी था फिर भी ये शायद उस दौर के लोगों का बड़प्पन रहा हो या अटल जी की उदारता कि हमारे स्वर्गीय पिता से उनके मित्रवत संबंध थे।हमारे क्षेत्र में जाने पर सन 57 से 67 के बीच कई बार उन्होंने हमारे घर पर रात्रि निवास किया।


कुछ वर्ष पूर्व प्रकाशित पत्रकार शाहिद मिर्ज़ा लिखित पुस्तक ‘अटल जी और बलरामपुर’ में इन तथ्यों का उल्लेख है। उसमें एक क़िस्सा है कि एक बार अटल जी गांवों का दौरा कर शाम 4-5 बजे हमारी कोठी पर पहुंचे तो वे धूल में सने थे। उन दिनों खुली जीप ही प्रचलन में थी। उन्हें देखकर पिता जी ने अपने अंदाज़ में अवधी में कहा – ‘ का हो अटल जी ,आज तौ बिल्कुल भूत बना हौ ‘ अटल जी ने तुरंत अपनी हाज़िर जवाबी का परिचय दिया और बोले कि – ‘ इसीलिए तो महंत के दरबार में आया हूँ,भूत झड़वाने ‘ और लोगों के ठहाके गूंजने लगे। मेरे स्वर्गीय पिता पंद्रहवीं शताब्दी में स्थापित शैव परम्परा के जूना अखाड़े की गद्दी हर्रैया मठ के प्रतापी महंत थे। फिर मेरे पिता ने सेवकों को आदेश दिया। अटल जी को कुएं पर ढेंकुल से पानी निकाल कर सेवकों ने जमकर नहलाया।


स्वर्गीय पिताजी हम सब को बचपन में अटल जी के कई क़िस्से सुनाया करते थे जिनमें उनकी विनोद प्रियता, हाज़िरजवाबी,विजया-प्रेम और भाषण-कला की तारीफें शामिल होती थीं। पिताजी कहते थे कि अटल जी अच्छे आदमी हैं लेकिन गलत पार्टी में पड़े हैं। दोनों लोगों में अपने अपने राजनीतिक दल को लेकर नोंकझोंक भी होती थी लेकिन परस्पर प्रेम और अपनापे के साथ।बाद में अटल जी अपने गुणों की बदौलत भारतीय राजनीति के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचे लेकिन उन्हें हमारे क्षेत्र और हमारे परिवार की याद बनी रही।जब वे प्रधानमंत्री बने तो हमारे क्षेत्र से कुछ लोग उनसे मिलने गए तो लगभग 40 वर्षों के अंतराल के बाद भी उन्होंने हमारे पिता का हालचाल पूछा और हमारे घर पर खाये सुस्वादु व्यंजनों का स्मरण किया।


अटल जी के साथ ही संभवतः उस राजनीति का भी अवसान हुआ जो विरोधी विचारधारा के साथ भी मानवीय आधार पर सहज संबंध बनाए रख सकती थी। उनके व्यक्तिगत गुणों के बारे में कुछ भी लिखना बेमानी है क्योंकि अब पूरा देश उससे परिचित है। भारतीय जीवनादर्शों और मूल्यों के प्रति उनका प्रेम ,साहित्य और कलाओं से लगाव और एक आम इंसान की तरह अपनी कमजोरियों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने का साहस मेरी निगाह में उन्हें बहुत बड़ा बनाता है।
भारतीय राजनीति के अप्रतिम और अविस्मरणीय पुरोधा स्व.अटल बिहारी वाजपेयी जी को हमारी हार्दिक श्रद्धांजलि।

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