“प्यार” ? पर पहरा कितना सही कितना गलत, सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट पर
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सुप्रीम कोर्ट में आज फिर से एक बार बहस छिड़ गई है कि समलैंगिक रिश्तों को अपराध की श्रेणी बताने वाली धारा-377 कितना जायज़ है। इससे पहले ये जान लेना बहुत जरूरी है कि धारा 377 है क्या, और क्यों इसे हटाने की मांग उठ रही है। धारा-377 अप्राकृतिक यौन संबंध को गैरकानूनी करार देता है। धारा-377 को अंग्रेजों ने 1862 में लागू किया था । धारा-377 को तहत अप्राकृतिक यौन संबंध को गैरकानूनी करार दिया गया था। ब्रिटिश शासन की ओर से भारत में लागू इस एक्ट को 1967 में ब्रिटेन में अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया था। धारा 377 एक गैरजमानती अपराध है। धारा-377 की सबसे खास बात ये है कि इसमें गिरफ्तारी के लिए वारंट की जरूरत नहीं पड़ती। शक के आधार पर पुलिस गिरफ्तार कर सकती है। 2009 में नाज फाउंडेशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला दिया था कि अगर दो परिपक्व आपसी सहमति से रिलेशन बनाते है तो आईपीसी की धारा-377 के तहत उसे अपराध नहीं माना जायेगा। बाद में 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया और बोला कि जबतक धारा-377 है तबतक समलैंगिक संबंध वैध नहीं हो सकता।

सुप्रीम कोर्ट

पॉलिटिकल पार्टियां, धार्मिक संस्था और हमारे देश एक बड़ा तबका ऐसा है जो ये कहता है कि समलैंगिक संबंध अवैध है । जिदंगी जीने के लिए कुछ रीतियां बनायी गयी हैं और हमें उन रीति रिवाज को नहीं भूलना चाहिये।ये सवाल मेरे मन भी बार-बार उठ रहा था कि क्या वाकई में खुद को किसी के प्यार में पाते हैं। उनको मनोवैज्ञानिक की जरूरत है। बीजेपी नेता सुब्रामन्यम स्वामी ने कहा है कि ‘’ धारा-377 का उलघंन हिंदुत्व के खिलाफ है। हमें ज्यादा पैसा मेडिकल शोध पर खर्च करना चाहिए, ताकि धारा-377 तोड़ने वालों का इलाज हो सके।‘’वहीं एलजीबीटीक्यू समुदाय का कहना है कि “ समलैंगिक रिश्ते किसी भी प्रकार से अप्राकृतिक नहीं है, जानवरों के जैसे इंसानों में भी आम स्वभाव है।“

बहस इस बात पर छिड़ी है कि अप्राकृतिक जिस्मानी रिश्ता नहीं होना चाहिए। जबकि बहस में ज़ज़्बात को भी शामिल किया जाना चाहिए। प्यार सिर्फ जिस्मानी नहीं हो सकता। प्यार भावनात्मक होता है। भावनात्मक रिश्ता तो किसी के साथ भी जुड़ सकता है। जिस्मानी रिश्ता तो बस एक जरिया है प्यार दर्शाने का। और जब बात भावनाओं की होगी तो लिंगभेद का चोला पहनकर कोई तर्क देना बेईमानी सी लगती है।

सुप्रीम कोर्ट

खैर क्या सही, क्या गलत फैसला सुप्रीम कोर्ट को करना है। इस बीच मैंने कुछ दो तबके से बात की और उनका नजरिया जानना चाहा। पहला तबका जिनकी उम्र 24-26 साल के बीच की है और वो जो अभी-अभी कॉलेज खत्म करके पेशेवर दुनिया में कदम रखते है। आत्मनिर्भर है । आत्म विश्वास की भी कमी नहीं । उनका कहना है कि समलैंगिक रिश्तों में कोई बुराई नहीं। हम इसके पक्ष में है, समाज से हम अलग नहीं, हमें रीति रिवाज भी पता है लेकिन खुद को खुश रखना क्यों गलत है,क्यों इसे अपराध की श्रेणी में रखा गया है।‘

दूसरा तबका जिनकी उम्र 30-40 के बीच की है ये भी आत्मनर्भर है। इनमें कुछ लोग ऐसे हैं जो समलैंगिक रिश्तों को लेकर अपनी कोई राय कायम नहीं कर पाये हैं । ज्यादा लोग ऐसे हैं जिनका कहना है कि इसमें कोई बुराई नहीं। क्यों पूछा तो जवाब था ’यहां डेमोक्रेसी है।’ इन लोगों से मैंने ये भी जानने की कोशिश की क्या आप अपने बच्चों को इस बात की छूट देंगे तो भी जवाब हैरान करने वाला था “हाँ”।ये वो आम आदमी की राय है जो समलैंगिक नहीं है। पर उनको समान अधिकार देने की बात करते हैं। फैसला सुप्रीम कोर्ट को करना है जरूरत है सभी पहलुओं पर गंभीरता से सोचने की।

सुप्रिया शर्मा (लेखिका पत्रकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं )

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