आज ही के दिन हंसते हंसते फांसी के फंदें पर झूल गए थे खुदीराम बोस
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ज़ेबा ख़ान/आज की इस हाई़टेक लाइफ जीने वाले युवाओं ने शायद ही खुदीराम बोस का नाम सुना हो। क्योकि आप की जनरेशन के पास सोशल मीडिया और उस कर चल रहे चैलेंज से वक्त ही नही मिलता है जो वो इतिहास के पन्ने पलटकर देख सकें। खुदीराम बोस एक ऐसा नाम जिसको सुनकर किसी के दिल में भी देशभक्ति का मशाल जल उठे।और ऐसा हो भी क्यों न जिस उम्र में बच्चे खेल, पढ़ाई और दोस्ती के बारे में सोचते थे उसी उम्र में खुदीराम बोस ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये थे। महज 16 साल की उम्र में ही उनके नाम का अंग्रेजों के बीच ऐसा खौफ था कि नाम सुनते ही उनका नामोनिशान मिटा देना चाहते थे, लेकिन इसके लिए अंग्रेजों को काफी इंतजार करना पड़ा।     

बंगाल में एक समय ऐसा भी था जब खुदीराम बोस के नाम से प्रिंटेड धोती चलन में हुआ करती थी। लोग उनके नाम की धोती पहनने में गर्व महसूस करते थे।आपको बता दें खुदीराम बोस का जन्म बंगाल में मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में हुआ था। 3 दिसंबर 1889 को जन्मे बोस जब बहुत छोटे थे तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया। उनकी बड़ी बहन ने उनको पाला पोसा। बंगाल विभाजन (1905) के बाद खुदीराम बोस मात्र 16 वर्ष की आयु में स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में जान न्यौछावर करने वाले प्रथम सेनानी खुदीराम बोस माने जाते हैं। वो आज ही के दिन यानी 11 अगस्त को केवल 18 साल की उम्र में देश के लिए फांसी के फंदे पर झूल गए थे। उनकी शहादत ने हिंदुस्तानियों में आजादी की जो ललक पैदा की उससे स्वाधीनता आंदोलन को नया बल मिला।

वो अपने स्कूली दिनों से ही जलसे-जुलूसों में शामिल होकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ नारे लगाते थे। उन्होंने नौवीं कक्षा में पढ़ाई छोड़कर सिर पर कफन बांध लिया। बाद में वह रेवोल्यूशन पार्टी के सदस्य बने। 28 फरवरी 1906 को पुलिस ने उन्हें इश्तेहार बांटते पहली बार पकड़ा, लेकिन वह भागने में सफल रहे। तीन महीने बाद 16 मई 1906 को वह एक बार फिर गिरफ्तार किए गए, लेकिन उनकी आयु कम होने के कारण उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया।देखते-देखते खुदीराम क्रांति के रास्ते पर आगे निकल गए। 6 दिसंबर, 1907 को बंगाल के नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बम विस्फोट की घटना में वह शामिल थे। इस दौरान क्रांतिकारियों के खिलाफ कलकत्ता (अब कोलकाता) में किंग्सफर्ड चीफ प्रेजिडेंसी मजिस्ट्रेट के सख्त और क्रूर रवैये को देखते हुए क्रांतिकारियों ने उसकी हत्या का फैसला किया और इस काम के लिए खुदीराम बोस तथा प्रफुल्ल चंद को चुना गया।

दोनों क्रांतिकारियों ने आठ दिन किंग्सफर्ड की दिनचर्या पर नजर रखी। वह शाम को एक क्लब में जाया करते थे। दोनों ने उसके क्लब से निकलने के समय उसपर हमला करने की योजना के अनुरूप 30 अप्रैल, 1908 को एक बग्घी पर बम फेंका, जिसमें किंग्सफर्ड के होने का अनुमान था, लेकिन उस दिन वह कुछ देर बाद क्लब से निकला और उसके धोखे में बग्घी में सवार दो महिलाओं की मौत हो गई।हालांकि खुदीराम और प्रफुल्ल चंद को यही लगा कि कि किंग्सफर्ड मारा गया है। दोनों करीब 25 मील भागने के बाद एक रेलवे स्टेशन पर पहुंचे। बोस पर पुलिस को शक हो गया और पूसा रोड रेलवे स्टेशन (अब यह स्टेशन खुदीराम बोस के नाम पर है) पर उन्हें घेर लिया गया। खुद को घिरा देख प्रफुल्ल चंद ने स्वयं को गोली मार ली पर खुदीराम पकड़े गए।खुदीराम बोस पर हत्या का मुकदमा चला और सिर्फ पांच दिन में मुकदमे का फैसला हो गया। 8 जून, 1908 को उन्हें अदालत में पेश किया गया और 13 जून को उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। 11 अगस्त, 1908 को उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया। इतिहासकारों के अनुसार खुदीराम सबसे कम उम्र में फांसी पर चढ़ने वाले क्रांतकारी थे।

क्रांतिकारी बोस की शहादत दिवस पर बिहार में मुजफ्फरपुर जिले के शहीद खुदीराम बोस केन्द्रीय कारागार में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया,जिसमे हिंदुस्तानियों में आजादी की ललक पैदा करने वाले और स्वाधीनता आंदोलन को धार देने वाले महान क्रांतिकारी को याद किया गया।इस कार्यक्रम में  कमिश्‍नर, डीएम, डीआईजी, एसएसपी समेत सभी अधिकारियों नें शहीद की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की. इस दौरान अधिकारी उस कोठरी में भी पहुंचे, जहां शहीद को कैद किया गया था. यहां उन्‍होंने उनकी प्रतिमा को नमन किया

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