2007 दोहराने की रणनीति में जुटी बसपा

जितेन्द्र चतुर्वेदी। 6 विडंसर प्लेस पर  आजकल खूब हलचल है।  आए दिन यहां  लोगों का जुटान होता है। उसमें हर तरह के लोग होते हैं।  कोई दलित है तो कोई पिछड़ा।  मुस्लिम समाज भी वहां दिख जाता है। पंडित लोग तो उसे अपना घर ही समझते हैं।  मगर वहां जो लोग है, वे सभी को अपना ही समझते हैं।  कही कोई विभेद नहीं है। न जातिगत, न क्षेत्रगत।  तभी तो वहां पूर्वांचल का भी आदमी अधिकार से आता है और बुंदेलखंड का भी। उनमें टिकटार्थी भी है और विचारधारा को लेकर समर्पित लोग भी।  उन सबकी  आंखों में 2022 की एक अलग तस्वीर है।  उसमें वे बसपा सुप्रीमो को देखते हैं।  काम भी उनको ही सत्ता में लाने के लिए कर रहे हैं।   तभी उनके जैसे बसपाई वहां जुट रहे हैं।  अगर  एक वाक्य में कहा जाए तो 6 विंडसर प्लेस बसपा की चुनावी रणनीति का केन्द्र है।  यही सुनकर वहां जाना हुआ। मगर वहा पहुंचना सहज नहीं था।   इसका कारण विडंसर प्लेस का भूल-भूलैया है।

 कहने को तो यह  लखनऊ का लुटियन है। लेकिन लुटियन की तरह यहां कोठी खोजना सहज नहीं है।  कम से कम विडंसर प्लेस का तो यही हाल है।  पता ही नहीं चलता कि पते में कौन सा गली नबंर है और कौन सा कोठी नबंर।  हालांकि अगर कोठी सतीश चंद्र मिश्र की हो तो ज्यादा  तकलीफ नहीं उठानी पड़ती।  कोठी के सामने हो रही हलचल बता देती है कि यहां कोई सियासी व्यक्ति रहता है। 

उस रोज भी वहां बहुत गहमागहमी थी।  सतीश चंद्र मिश्र मीटिंग में व्यस्त थे।  बाहर सैकड़ों लोगों का हुजूम था।   कोई घंटे भर बाद मीटिंग का पटाक्षेप हुआ और अपनी मुलाकत बसपा के चाणक्य से हुई।  अपने चिर-परिचत अंदाज में उन्होंने  दीपावली की बधाई दी।  उसके बाद बातों का सिलसिला शुरू हुआ। एक सधे हुए राजनेता की तरह उन्होंने खुलकर कुछ बताया नहीं।  मगर उस बातचीत और वहां पर मौजूद लोगों से हुई चर्चा के आधार पर कुछ बातें साफ हो गई। 

 एक तो यही कि  2007 को दोहराने की जिम्मेदारी सतीश चंद्र मिश्र के पास है।  लेकिन उसमें एक बदलाव आया है। वह यह कि इस बार उनकी भूमिका ब्राह्मणों को जोड़ने तक सीमित नहीं है।  उनको ब्राह्मणों के साथ सर्व समाज को भी जोड़ना होगा।  यह बात उनके कोठी पर होने वाले सदस्यता अभियान से जाहिर होती है। 16 नवबंर को उनकी कोठी पर मुस्लिम समाज को जोड़ने का एक बड़ा आयोजन हुआ।   उसमें तकरीबन 5000 लोग बसपा से जुड़े। 

इसी से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि अबकी बार सतीश चंद्र मिश्र की भूमिका अधिक बड़ी होने वाली है।  उसकी वजह भी है।  मायावती उन पर भरोसा भी खूब करती है। शायद इसीलिए वे बसपा में नबंर दो पर माने जाते हैं।  कहा तो यह भी जाता है कि मायावती ने उन्हें  मंच साझा करने और  अपनी बात रखने की छूट दे रखी है।

 जो भी हो लेकिन इतना तो तय है कि सतीश चंद्र मिश्र के कंधों पर जिम्मेदारी बड़ी है।  उन्हें बसपा का खोया हुआ जनाधार वापस लाना है।  वे इस काम में जुटे भी है।   उपचुनाव लड़ने का निर्णय उसी लिहाज से लिया गया था।  बसपा सुप्रीमो तो इसके लिए तैयार नहीं थी।

 वैसे बसपा उप चुनाव में हिस्सा नहीं लेती है।  लेकिन इस बार उसने हिस्सा लिया। उसके पीछे  एक ही रणनीति काम कर रही थी, वह यह कि  कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया जाए।  उनकी सक्रियता ही पार्टी को जिंदा कर सकती है।   यह हुआ भी। उपचुनाव ने पार्टी की पूरी मशीनरी को  चुनावी मोड में ला दिया।   भले ही उनका प्रदर्शन उप चुनाव में आशा के अनुरूप न रहा हो, लेकिन  वोट प्रतिशत  ने संगठन की उम्मीद को जिंदा रखा है।  साथ ही यह संकेत दिया कि यदि बसपा अन्य समुदाय को भी जोड़ ले तो वह, अपना वोट प्रतिशत बढ़ा सकती है।

निर्णय भी उसी तरह के हो रहे हैं ।  मसलन भीम राजभर को सूबे की कमान सौंपना।   विशेष रूप तब जबकि राजभर  की नाराजगी भाजपा से जगजाहिर है।  फिर यह वर्ग शुरू से बसपा का मतदाता रहा है।  बीच में भटकाव हुआ था। पर  अब वे खुद को ठगा महसूम कर रहे हैं।  ऐसे हालात में मायावती ने जो फैसला लिया उसको  2022 की रणनीति से जोड़ कर देखा जा रहा है।   है भी यही। पार्टो  चुनावी माहौल में जुलाई से ही है।  सतीश चंद्र मिश्र की अगुवाई में नकुल दुबे  प्रदेश भर का भ्रमण कर रहे हैं।  वे जगह-जगह सभाएं  कर रहे हैं।  ये नुक्कड़ सभाओं की तरह है।  वहां सिर्फ नकुल दुबे का भाषण नहीं होता, सवाल जवाब भी होता है।  लोग उनसे पूछते हैं कि हम क्यों जुड़े?  न जुड़ने के सैकड़ों कारण नकुल दुबे को बताते हैं।  

पर वे विचलित नहीं होते। सबको ध्यान से सुनते हैं और  जोड़ने की कोशिश करते हैं।  उस कोशिश के केन्द्र में बसपा शासन काल का कामकाज होता है। उसमें कानून-व्यवस्था  का बसपा दौर याद दिलाया जाता है।  विकास कार्य के कसीदे पढ़े जाते हैं। दलित समाज के लिए हुए कामकाज  का लेखाजोखा पेश किया जाता है।  अंत में उस सवाल पर बात होती है जिसे लेकर सूबे की सरकार हलकान है।  वह है ब्राह्मण उत्पीड़न।  यह धारण है या वास्तविकता, शोध का विषय है।  मगर जिस तरह के संकेत  सत्ता पक्ष से मिले हैं, उससे तो स्पष्ट है कि उत्पीड़न  एक मसला है।  

नहीं तो सूबे से दो दुबे राज्यसभा में भेजने का कोई मतलब नहीं था।  लेकिन भेजा गया। इससे जाहिर है कि ब्राह्मण समाज में सरकार को लेकर नाराजगी है।  तमाम राजनीतिक दल उसे भुनाने में लगे हैं।  बसपा भी उनमें शामिल है।  उसने तो 2007 में ब्राह्मण समाज को लेकर प्रयोग भी किया था। जो बेहद सफल रहा था। इस वजह से बसपा उन पर अपना अधिकार भी समझती है।  इसीलिए बसपा पिछले छह महीने से सघन अभियान चला रही है।  सतीश चंद्र मिश्र की अगुवाई में यह अभियान चल रहा है।  इसके संमवय की जिम्मेदारी नकुल दुबे को मिली है। वे युवा टीम के साथ मिशन में जुटे हैं।    लेकिन बस यही एक मिशन नहीं है जिसमें वे लगे हैं।  बसपा महसचिव  ने उन्हें एक और जिम्मेदारी  दे रखी है।  वह है अल्पसंख्यक सणाज को जोड़ना। उसके लिए मैराथन बैठक भी हो रही है। 

कोशिश यह है कि  मुस्लिम समुदाय बसपा के साथ आए।  अच्छा दोनों का नाता भी पुराना है।   पार्टी  बामसेफ के दौर से मुस्मिल समुदाय की  वकील रही है। बामसेफ का ‘म’  मुस्लिम समुदाय का प्रतीक है। यदि मुस्लिम और दलित साथ आते हैं तो इनका वोट प्रतिशत 40 फीसदी के आसपास हो जाता है।  इसमें यदि 12 फीसदी ब्रह्मण समाज को जोड़ दे तो यह आंकड़ा 52 फीसदी तक पहुंच जाता।  यहां तो 30 फीसदी मे सरकार बन जाती है। उस हिसाब से देखा  जाए तो बसपा सरकार बनाने की स्थिति में है।  उस पर पिछड़े समाज को जोड़ने की मुहिम भी चल रही है।  यह वही समाज है जिसे कांशीराम ने जोड़कर बहुजन समाज का गुलदस्ता तैयार किया था।  उस गलदस्ते से कई समुदाय पिछले कुछ सालों में बाहर जा चुके थे।  बसपा  उन्हें  एक बार फिर  पार्टी से जोड़ने में लगी है।  उस दिशा पहला कदम बढ़ाया जा चुका है।  अति पिछड़े वर्ग को नेतृत्व दिया जा रहा है।

इन सब से अलग जो दूसरी नई बात देखने को मिल रही है, वह है पार्टी को युवाओं से जोड़ना।  बसपा का यह पक्ष बेहद कमजोर रहा है।  पार्टी से युवा दूर रहे हैं या फिर  पार्टी, युवाओं से दूर  रही है जो हो नुकसान संगठन को हुआ है।  वह इस लिहाज से कि अनुभव होने के बाद भी पार्टी में ऊर्जा का अभाव रहा। इसे पार्टी ने समझा है। इस तरह के संकेत मिल रहे हैं। मसलन 27-28 के लड़कों को पार्टी जिम्मेदार सौंप रही है। 

इसका मतलब यह है कि बसपा भी पीढ़ी परिवर्तन की दिशा में बढ़ रही है। भविष्य के लिए यही रणनीति ठीक भी है।  चुनाव के नजरिए से भी उचित कदम है क्योंकि युवाओं को आकर्षित करने के लिए युवा चेहरा तो होना ही चाहिए।  बिहार के चुनाव ने एक बात तो स्पष्ट कर दी है कि युवाओं का मोहभंग हो रहा है।  तभी तो साढ़े पंद्रह लाख नए मतदाताओं ने  तेजस्वी में अपना विश्वास जताया।  उनके साथ खड़े रहे।  इसी वजह महागठबंधन लड़ाई में आया।  अन्यथा यही माना जा रहा था कि बिहार में लड़ाई एकतरफा है।  

हालांकि उत्तर प्रदेश में मामला कभी एकतरफा नहीं माना गया।  उसकी वजह यहां का नेतृत्व रहा।  फिर वर्ग विशेष की उपेक्षा तो यहां मसला है ही।  युवाओं का गुस्सा बिहार से अलग सूबे में नहीं है।  इसलिए हर दल उसे अपना बनाने में लगे हैं।  बसपा भी उनमें शामिल है।  वह युवा जोश को राजनीतिक हथियार के रूप इस्तेमाल करना चाहती है। इसी कारण युवाओं को नीति निर्माण में शामिल कर रही है।  इसमें भी सतीश चंद्र मिश्र की अहम भूमिका रही है।

वैसे भी बसपा का मुख्य रणनीतिकार, उन्हें ही माना जाता है।   उनकी ही वजह से उत्तर प्रदेश में  गठबंधन सरकार का दौर खत्म हुआ था।  सोशल इंजीनियरिंग वाले उन के फार्मूले ने सूबे का जातीय फार्मूला बदल दिया।  बसपा को बहुजन से सर्वजन तक लाने में भी वही है।  नहीं तो पहले ‘तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारों जूता चार’  का नारा दिया जाता था।  उसे सतीश चंद्र मिश्र ने बदलवाया और ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है’  का नारा दिया।  इसके पीछे का रहस्य  था और है ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’।  इस मंत्र को मायावती ने स्वीकार किया। 2007 में एक प्रेस के दौरान  मायावती ने कहा था ‘ मिश्रा जी ने मुझे  ‘सर्वजन’  वाली विचारधारा पर चलने के लिए प्रेरित किया’।  सरकार भी उसकी वजह से बनी थी।  उस दौर में तकरीबन चार महीने सतीश चंद्र मिश्र सूबे में टहलने थे। इस दरमियान उन्होंने लगभग 24000 किमी की यात्रा की थी।  ब्राह्मण समाज को जोड़ने के लिए सम्मेलन किया।  बनिया को समाज को भी जोड़ने की मुहिम चली थी।   उसका परिणाम भी चौकाने वाला था। सर्वजन ने मिलकर सूबे को पूर्ण बहुमत की सरकार दी थी।

कुछ उसी तरह का चमत्कार बसपा इस बार भी करना चाहती है।  उसके राजनीतिक अस्तित्व के लिए यह जरूरी भी है।  उसे बचाने की मुहिम में पार्टी जुटी है।

Leave a Reply