“गांधी के राम” गांधी दृष्टि के अन्यान्य पक्ष अवभासित करती पुस्तक-डॉ. लाला शंकर गयावाल

मोहन दास करम चन्द गांधी विधाता की एक विलक्षण प्रकृति के मानव थे। लोक में गांधी पर चर्चा दो तरह के जन करते हैं एक वे जो गांधी को जानते हैं, मानते हैं। दूसरे वे जो गांधी को बिल्कुल नहीं जानते, नाहीं मानते हैं नाही गांधी को पढ़े हुये होते हैं। गांधी को बिना जाने, माने और बिना पढ़े उनके बारे में बातें करना मूर्खता ही है। गांधी अद्भुत प्रकृति के मनुष्य थे, वे राष्ट्रपिता हैं, अनेकों के आदर्श हैं, लोक में गांधी एक जीवन पद्धति भी है। गांधी के अनेक पक्ष हो सकते हैं, लेकिन यहां बात सिर्फ गांधी के राम की, सविशेष अरुण प्रकाश की पुस्तक के आलोक में।

गांधी जी राम, रामत्व, रामनाम, रामधुन, रामबाण और रामराज्य की चर्चा अपनी आत्मकथाओं में, अपने पत्रों, प्रेसवार्ताओं, प्रार्थना सभाओं, वक्तव्यों, संवादों और यंगइंडिया, हिन्दी-गुजराती नवजीवन, हरिजनसेवक आदि समाचारों के माध्यम से करते थे।

प्रस्तुत पुस्तक के लेखक अरुण प्रकाश रामनाम अवलम्बन एकू, गांधी के राम, रामनाम व रामधुन, रामनाम का हृदयांकन, राम ही ईश्वर राम ही अल्लाह, राम साधन राम साध्य, रामत्व की प्राप्ति, राम नाम से कुदरती इलाज व विश्वास चिकित्सा तथा रामराज्य के नौ अध्यायों के माध्यम से गांधी के राम को सुंदर तरीके से व्याख्यायित करते हैं। संभवतः गांधी के रामत्व बोध पर यह पहली कृति है।

राम वस्तुतः ‘‘रमन्ते योगिनो यस्मिन् इति रामः’’ अर्थात् योगी जन जिसमें रमण करते हैं, वे राम हैं। दशरथ नन्दन, मैथिलिपति और अयोध्याधिपति तो साधन मात्र हैं साध्य तो राम हैं। गांधी राम की चर्चा आस्तिक दर्शनवत् करते हैं गांधी के राम कभी वेदान्त दर्शन के ब्रह्म बन जाते हैं तो कभी योगदर्शन के विभिन्न उपादान उनके माध्यम बनते हैं, तो कभी सांख्यदर्शन के पुरुष और प्रकृति के अनुगामी दिखते हैं। जिस प्रकार योगदर्शन में योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः तथा अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः की बात की गई है वैसे ही गांधी रामधुन के जप, अनुनाद और निरंतर अभ्यास द्वारा झंकृत आत्मचेतस् से परम सिद्धि की प्राप्ति कहते हैं। परमसिद्धि की प्राप्ति के बाद पुनः जप, अनुनाद और अभ्यास आदि की आवश्यकता नहीं होती है। यही रामनाम सर्वशक्तिमान परमात्मा के पास पहुंचने का माध्यम है। यह हृदय से ली जाने वाली सर्वोपरि वस्तु है।

वस्तुतः गांधी के राम अविनाशी, सर्वव्यापी, अजन्मा, सनातन और अद्वितीय ब्रह्म हैं। राम सगुण भी हैं, राम निर्गुण भी। सगुण से निर्गुण तत्व को प्राप्त करने के लिये अनेक साधन और उपाय गांधी बताते हैं वे सब रामनाम, रामधुन, रामबाण आदि हैं।

गांधी स्पष्ट कहते हैं कि राम हिन्दुओं का ईश्वर है, इस्लाम का अल्लाह है तथा ईसाईयों का गॉड है। सर्वशक्तिमान परमात्मा एक है इनके नाम भले ही अलग अलग हो पर वह है एक ही। रामधुन के गायन में वे कहते हैं कि ‘‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’’ और ‘‘राम रहीम एक है, नाम धराया दोय’’। मेरा राम खुदा और गॉड का ही दूसरा नाम है। राम यानि ईश्वर, अल्लाह, खुदा गॉड। यहां गांधी अद्वैतवादी एकेश्वरवादी प्रतीत होते हैं। राम नाम के हृदयांकन से मानसिक, नैतिक और भौतिक दुःखों का नाश होता है। वे राम को विकार मोचन, भय मोचन और आत्मशुद्धि के साधन के रूप में देखते हैं। यही आत्मशुद्धि ही मुक्ति है मोक्ष है।

गांधी ने रामनाम जप को अनेक व्याधियों से मुक्ति की औषधि माना है। यह कुदरती इलाज का जरिया है सर्वरोगहारी है। यह रामनाम समस्याओं के मोचन का साधन है। गांधी कहते हैं कि जो लोग रामनाम जपता है और नेक चलनी से रहता है उसको बीमारी हो ही क्यों? रामनाम को मैंने अपनी कल्पना के कुदरती इलाज की बुनियाद माना है। नियम और अनुशासन के साथ रामनाम सर्वरोगहारा है। रामनाम पुकारने से समाधान के रूप में रामबाण का संधान सभी व्याधियों का नाश करता है। यह शर्तिया इलाज है।

गांधी का रामराज्य स्वराज्य, लोकराज्य और धर्मराज्य का पर्याय रहा है। धर्मराज्य से मतलब धर्मविशेष का राज्य नहीं है नाही हिन्दुओं का राज्य से है। उन्होने रामराज्य के तीन आधार माने – एक लोकसत्ता की सर्वोच्चता, दो स्त्रियों की प्रभावी भागीदारी तथा तीन जाति व्यवस्था से मुक्ति। रामराज्य प्रजा केन्द्रित है। यह राजा के सद्गुणी होने से अधिक महत्वपूर्ण जनता के धर्मनिष्ठ व वीर्यवान् होने पर निर्भर है।

अरुण प्रकाश की यह पुस्तक गांधी के वक्ताओं के लिये गांधी के राम विषयक विषयों का न केवल एक कोश ग्रन्थ बन गया है अपितु गांधी की दृष्टि के अनेक अन्यान्य पक्ष भी अवभासित हो गये हैं। अरुण प्रकाश लिखते हैं कि इतिहास में राम एक नीतिमान राजा हैं, शास्त्रों में राम साक्षात् विष्णु के अवतार हैं, आध्यात्मिक दृष्टि से राम परब्रह्म परमात्मा हैं तथा लोक मे राम घट-घट से मरघट तक व्याप्त हैं, राम साक्षात् अकथ की कथनीयता हैं। पुस्तक में यकीनी इमदाद, अटकल पच्चू, कीमिया जैसे शब्द कौतुहल उत्पन्न करता है। पुस्तक की भाषा सरल, सरस एवं बोधगम्य है।

पुस्तक में लेखक ने जगह-जगह कथानकों के माध्यम से कथ्य को तथ्यपरक बनाया है जो रोचकता लिये हुए है। निःसन्देह यह पुस्तक ‘‘गांधी के राम’’ के साथ -साथ सहृदय पाठकों को रामत्व बोध का रसास्वादन करायेगी ही, उनके कथनों को आत्मसात् करते हुए रामनाम, रामधुन और रामगुण के अनुगुंजन और संकीर्तन से अपने मनस्तोष् द्वारा तदाकाराकारितावस्था को प्राप्त कर अपने श्रेय और प्रेय को प्राप्त करे तो लेखक का यह प्रयास सफल माना जायेगा।

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