18 साल बाद पहाड़ आज भी पलायन से बदहाल
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सन्तोषसिंह नेगी/चमोली..18 साल बाद आज भी देवभूमि उत्तराखण्ड से पहाड़ के पलायन की समस्या जस तस बनी हुई है जहां एक ओर सरकार ने पलायन के कारणों को जानने का प्रयास किया वह सराहनीय था लेकिन कारण जानने के बाद क्या सुधार आया यह भविष्य के गर्भ में अभी भी छिपा हुआ है। उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी, पिथौरागढ़ व अल्मोड़ा में पलायन की चिंताजनक तस्वीर उभरकर सामने आई है। यहां के गांवों में पलायन राज्य औसत से कहीं अधिक है।

पलायन आयोग ने दावा किया था कि मात्र 59 दिनों में 7950 गांवों का घर-घर जाकर सर्वे किया गया है.यानि औसतन एक ही दिन में 135 गांवों में पलायन के कारणों की जमीनी हकीकत का पता लगाया गया है और ज्यादातर लोगों को आयोग का यह दावा अविश्वसनीय लगता है कि कठिन भौगोलिक परिस्थतियों वाले गांवों से कैसे वास्तविक जानकारियां जुटाई गई होगीं जबकि सच्चाई यह है कि पहाड़ के कई गांव आज भी सड़क विहीन है।

पहाड़ की सच्चाई किसी से छिपी नहीं है कि राज्य बनने के बाद यहां की सरकारों ने पहाड़ों के बुनियादी सवालों शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, खेती बाड़ी की ओर ध्यान देने के बजाय कुर्सी और पद, पैसा और संपत्तियां जुटाने की होड़ को और बढ़ावा दिया.राज्य बनने के बाद यहां की राजनीति में जिस तरह का ओछापन इन तमाम वर्षों में उत्तराखंड की राजनीति में देखने को मिला है उससे आम लोगों को काफी  पीड़ा होती है। सरकार स्वरोजगार के लिए लोगों को प्रोत्साहन दे रही है और इसके विपरीत सड़क, बिजली, पानी,शिक्षा ,स्वास्थ्य और चिकित्सा जिनके अभाव के कारण लोगों को गांवों से पलायन करने पर बाध्य होना पड़ता है। यह पहाड़ की सबसे बड़ी पीड़ा है।

 

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