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updated 8:02 AM UTC, Feb 28, 2017
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293 विधानसभा क्षेत्र उतरौला-जानिए क्या है समीकरण

उतरौला, 293 विधानसभा क्षेत्र उतरौला मुस्लिम और कुर्मी बाहुल इस विधानसभा क्षेत्र में अधिकांश लोग रोजी रोटी के लिए खाड़ी  देशों में रहते हैं सबसे अधिक विदेशी मुद्रा इसी विधानसभा में आती है फिर भी शिक्षा स्वास्थ्य के क्षेत्र के बहुत पीछे हैं रेलखंड इस विधानसभा में अब तक नहीं पहुंची है रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा रेलखंड से जोड़ने का आश्वासन दिया है इस विधानसभा में कुल चार लाख 10 हजार 684 मतदाता है जिसमें दो लाख 27 हजार दो सौ 24 पुरुष 1 लाख 82 हजार 84 महिला मतदाता तथा 12 थर्ड जेंडर के मतदाता है।

 

  • 2012 के चुनाव में 40447 मत पाकर विजय रहे समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आरिफ अनवर हाशमी इस बार फिर सपा के विकास के भरोसे सत्ता में वापसी के प्रयास में हैं।

  • 32 हजार पांच सौ 68 मत पाकर तीसरे स्थान पर रहे भाजपा उम्मीदवार श्यामलाल वर्मा के स्थान पर उनके पुत्र रामप्रताप वर्मा भाजपा उम्मीदवार राजनीति में अपना पैर जमाने की कोशिश में लगे हुए हैं।

  • 39442 मत पाने वाली बहुजन समाज पार्टी इस प्रवेश अहमद को अपना उम्मीदवार घोषित किया है।

  • 30000 वोट पाने वाली पीस पार्टी अपने प्रदेश अध्यक्ष की परंपरागत सीट पर इस बार धर्मेंद्र गौड़ को मैदान में उतारा है ।

  • कांग्रेस पार्टी गठबंधन धर्म निभाते हुए इस बार समाजवादी पार्टी का समर्थन कर रही है।

  • मोहम्मद निजाम उल उल्लाह खान एआईएमआईएम से ताल ठोंक रहे हैं।

  • ज्ञानचंद वर्मा युवा विकास पार्टी

  • नंदलाल भारतीय सुभाष सेना से अपना भाग आजमा रहे हैं।

  • वही अफरोज ऋषि कुमार पारसी गार्डन दास रामखेलावन श्री राम निर्दल उम्मीदवार के तौर पर मैदान में डटे हुए हैं।

 

सत्ता संघर्ष के दौर में अब तक उतरौला विधानसभा में 1951 मे एस एम शाहिद फकीर ने सूरज लाल गुप्ता को 1957 में अली जर्रार जाफरी मैं सूरज लाल गुप्ता को 1962 में सूरज लाल गुप्ता ने अली सरदार जाफरी को 19 67 में आर यम खान ने सूरज लाल गुप्ता को 19 69 मैं सूरज लाल गुप्ता ने रफी मोहम्मद खान 1974 और 1977 में राजेंद्र प्रसाद चौधरी ने  इब्ने हसन को लगातार दो बार पराजित कर विधान सभा में प्रतिनिधित्व किया 1980 में मसरूर जाफरी और 1985 में फजरूल वारी बारी निर्दल उम्मीदवार मैं सलीम महबूब कांग्रेस को 1989 और 91 में समीउल्लाह ने बीजेपी उम्मीदवार विश्वनाथ को को पराजित किया 1993 में भाजपा उम्मीदवार विश्वनाथ गुप्ता ने फसी उर रहमान उर्फ़ मुन्नन खा को 1996 में उबैद उर रहमान सपा प्रत्याशी श्यामलाल वर्मा को 2002 में अनवर महमूद सपा प्रत्याशी ने श्यामलाल वर्मा  भारतीय जनता पार्टी प्रत्याशी को पराजित किया 2007 में भाजपा उम्मीदवार श्यामलाल वर्मा ने अनवर महमूद खा को पराजित कर दिया और 2012 में समाजवादी उम्मीदवार आरिफ अनवर हाशमी ने 1005 मतों के अंतर पर अपने निकटतम प्रतिद्वंदी बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार धीरेंद्र प्रताप सिंह धीरू को पराजित कर विधानसभा में उतरौला का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

 

उतरौला विधानसभा की जातीय समीकरण पर एक नजर

राजपूत 25,000 ब्राह्मण 35000 वैश्य 25,000 कायस्थ 10,000 कुर्मी 50,000 निषाद 10,000 यादव 25,000 मौर्य 10,000 दलित 55,000 मुस्लिम 1 लाख अन्य 10,000

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उत्तर प्रदेश मे सपा व बसपा का सूपड़ा साफ गया है -केशव प्रसाद मौर्या

कन्हैयालाल यादव/बलरामपुर प्रदेश अध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी केशव प्रसाद मौर्या बुधवार को जनपद के तीन विधानसभा क्षेत्रों के प्रत्याशियों के समर्थन में जनसभा को संबोधित किया। अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार गैसड़ी विधानसभा प्रत्याशी शैलू सिंह,उतरौला विधानसभा प्रत्याशी रामप्रताप वर्मा तथा तुलसीपुर प्रत्याशी कैलाश नाथ शुक्ला के समर्थन में जनसभा को संबोधित कर भारी बहुमत से विजयी बनाने का आवाहन किया।  

 

अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या ने राजेश्वर मिश्रा प्रत्याशी विधान सभा तुलसीपुर ,डा. अनुराग यादव प्रत्याशी विधान सभा गैसड़ी ,नीरज मौर्या प्रत्याशी विधान सभा तुलसीपुर,रविन्द्र ओझा प्रत्याशी विधान सभा बलरामपुर को पार्टी विरोधी गत विधियों के कारण बाहर का रास्ता दिखाया। सभा को संबोधित करते हुए श्री मौर्या ने कहा की प्रदेश में कांग्रेस, सपा व बसपा का  सुपड़ा साफ गया है प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो किसानों का कर्ज माफ होगा। युवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे जिससे उनका भविष्य उज्जवल होगा। पूरे प्रदेश में गो वध व गो वंश तस्करी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाएगा।

 

अखिलेश सरकार ने अपने शासन काल में केवल गुण्डा, माफिया एवं भ्रष्टाचारियों को प्रोत्साहन दिया। डायल 100 नंबर पुलिस सेवा सिर्फ गुण्डों की मदद कर रही है। अपराध पर किसी तरह का नियंत्रण नही है। सपा सरकार पूरी तरह किसान विरोधी है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने कांग्रेस व बसपा की ‌नीतियों को आम जनता के लिए हानिकारक बताते हुए कहा कि प्रदेश की जनता सपा, बसपा व कांग्रेस को पूरी तरह नकार चुकी है और आने वाले विधान सभा चुनाव में इनका सूपड़ा साफ हो जाएगा।

 

केन्द्र की मोदी सरकार को गरीबो, किसानो एवं युवाओं के लिए समर्पित बताते हुए उन्होंने लोगो से गैसड़ी के भाजपा प्रत्याशी शैलेश कुमार ‌सिंह शैलू, तुलसीपुर के प्रत्याशी कैलाश नाथ शुक्ला, बलरामपुर के प्रत्याशी पल्टू राम एवं उतरौला के प्रत्याशी राम प्रताप वर्मा को भारी मतो से विजयी बनाने की अपील की। इस दौरान श्रावस्ती सांसद दद्दन मिश्रा एवं भाजपा जिला अध्यक्ष राकेश सिंह आदि ने भी जनसभा को संबोधित करते हुए भाजपा प्रत्याशियों के लिए समर्थन मांगा। इस अवसर पर विनय प्रकाश त्रिपाठी, सुरेश सिंह ‌शेरा, प्रदीप सिंह, कमलेश सिंह, शिव प्रसाद यादव, जनमेजय सिंह, राजबहादुर यादव, विष्णुदेव गुप्ता, अनूप चंद गुप्ता, राम दयाल यादव, अमरनाथ गुप्ता, मोती लाल जायसवाल व रामपाल यादव सहित तमाम पार्टी पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता मौजूद रहे।

UP Election-2017 कल है चौथे चरण की वोटिंग जानिए कहाँ-कहाँ हैं चुनाव

लखनऊ, उत्तर प्रदेश में चौथे चरण में चुनाव 23 फरवरी को होने हैं। चौथे चरण के चुनाव लिए सभी पार्टियों का प्रचार-प्रसार चरम पर है, सभी पार्टियाँ मतदाताओं को लुभाने के लिये जी जान से जुटी हुई हैं। इस चरण में कुल 53 सीटों के लिए मतदान होगा जिसमे 12 जिलों की 53 सीटों के लिये 680 उम्मीदवार मैदान में हैं। यह उम्मीदवारों में 98 राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, चुनाव मैदान में जहाँ विरासत से राजनीति में आए कुछ प्रत्याशी शामिल हैं, तो वही कुछ इसे प्रत्याशी हैं जो दर्शकों से मतदाताओं की पसंद बने हुए हैं।

 

53 सीटों पर चुनाव के लिए 6 राष्ट्रीय पार्टियां, पांच क्षेत्रीय पार्टियां और 87 गैर मान्यता प्राप्त पार्टियां हैं, इसके आलावा 200 निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। जिले के हिसाब से उम्मीदवारों की संख्या इस प्रकार है- इलाहाबाद की 12 विधानसभा की सीटों के लिए 181 उम्मीदवार, प्रतापगढ़ की सात सीटों के लिए 87 उम्मीदवार, फ़तेहपुर की छह सीटों के लिए 72 उम्मीदवार, बाँदा जिले की चार सीटों के लिए 52 उम्मीदवार, चित्रकूट की दो सीटों के लिए 26 उम्मीदवार, हमीरपुर की दो सीटों के लिए 18 उम्मीदवार, झांशी की चार सीटों के लिए 53 उम्मीदवार, जालौन की तीन सीटों के लिए 30 उम्मीदवार, कौशांबी की तीन सीटों के लिए 41  उम्मीदवार, ललितपुर की दी सीटों के लिए 24 उम्मीदवार, महोबा की दो सीटों के लिए 21 उम्मीदवार और रायबरेली की छह सीटों पर 75 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं।

 

चौथे चरण में कुल 19487 मतदान केंद्र पर कुल 18435563 मतदाता उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करेंगे। चौथे चरण में बीजेपी और सहयोगी दल के 54 प्रत्याशी हैं, बसपा के 53 प्रत्याशी हैं सपा के 33 और कांग्रेस के 25 प्रत्याशी हैं। विधानसभा की 21 सीटें संवेदनशील हैं, संवेदनशील सीटें वो होती हैं, जिसमे तीन या उससे अधिक उम्मीदवारों ने अपने ऊपर दर्ज अपराधिक मामले घोषित कर रखे हों। उत्तर प्रदेश के किसी भी क्षेत्र के मुकाबले इस क्षेत्र में हमेशा से सबसे ज्यादा वोट डाले जाते हैं।   

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301गौरा विधान सभा में भाजपा को ब्राम्हणोंं की उपेक्षा पड रही भारी

श्यामलाल शुक्ल/गोंडा, गोंडा की ब्राम्हण बाहूल्य मतदाताओं वाली विधानसभा गौरा में किसी दल ने ब्राह्मण प्रत्याशी नहीं दिया। माना जाय तो गौरा में जातिवार ब्रहमण 15 प्रतिशत मुस्लिम 18प्रतिशत, कुर्मी 16प्रतिशत, दलित 19प्रतिशत, अहिर 06 प्रतिशत, क्षत्रिय 07प्रतिशत व अन्य पिछडा वर्ग 19प्रतिशत के लगभग मतदाता हैं। भाजपा पिछले सालों से पुराने भा ज पा नेता रमाकांत तिवारी दिनेश शुक्ला बैभव पांडे पूर्व प्रमुख बाबूराम यादव को टिकट देने के नाम पर खूब दौडाया सभी ने लाखों में जेब ढीली किया, अन्त में बसपा से आये प्रभात कुमार वर्मा को टिकट देकर ब्रम्हणों व यादव को निराश कर दिया। स पा से चुनाव लड रहे रामप्रताप सिंह भी भाजपा छोडकर आये नेता हैं।

 

माना जाय तो प्रभात गौरा में सवर्ण विरोधी नेता रहे इनके द्वारा सार्वजनिक मंचों पर ब्रम्हणों को पानी पी पी कर अपमानित करने का अनुभव है अब टिकट के बाद भाजपा को  इस क्षेत्र में अपने परम्परागत मतदाताओं को रिझाने के लिए ढूंढ ढूंढ कर पार्टी के ब्रम्हणण चेहरों को लाकर डैमेज कंट्रोल करने में लगी है लेकिन सारा प्रयास बेअसर दिख रहा है।

 

पहले बिहार के एक ब्रम्हण नेता को लाकर मसकनवा में सभा कराई गई फिर आज भोजपुरिया गायक से नेता बने मनोज तिवारी ने आकर भाजपा के लिए वोट मांगा। स्थानीय सांसद जिनका इस क्षेत्र में खासा प्रभाव माना जा रहा था वो भी बेअसर साबित हुए। गौरा में भाजपा को सपा के राम प्रताप पहले भाजपा का होने के नाते नुकसान पहुचा रहे हैं। वहीं कांग्रेस के तरूण पटेल कुर्मी बिरादरी में भाजपा प्रत्याशी को नुकसान पहुंचा रहे हैं। भाजपा का टिकट न मिलने से बागी हुए बैभव पांडे भी रालोद से मैदान में आकर बची बचाई कसर निकालेंगे तो गौरा विधान सभा में निर्दल प्रत्याशी कुंवर बिक्रम सिंह सपा से टिकट न मिलने पर अपने परिवार सहित गाँव गाँव राज घराने का होने सब के सुख दुख में खडे रहकर साथ रहने की मार्मिक अपील के साथ वोट मांग रहे हैं। जिससे राज घराने का होने के नाते काफी असर है।

 

गौरा में राष्टीय दलों की सक्रिय राजनीति में रहनेवालों को टिकट न देकर बडे नेताओं दलबदलुओं व शिफारिसी टिकट के चलते गाँव गाँव निराशा हाथ लग रही है। ब स पा प्रत्याशी अपने जातिगत समीकरण दलित मुस्लिम के सहारे मन ही मन लड्डू खा रहा है कि जीत पक्की है। लेकिन मतदाता सारे दलों का समीकरण बिगाड कर कोई चौंकाने वाला परिणाम चाहता है जिससे कि आगे चलकर राजनैतिक दलों के टिकट वितरण में कार्यकर्ताओं की उपेक्षा न हो।


भोजपुरिया गायक मनोज तिवारी भाजपा के प्रति ब्राहम्णो का खासकर इस सीट पर आक्रोश रोक पाने में नाकामयाब रहें इसलिए भाजपा अब कलराज मिश्रा को भी लाने की योजना बना रही हैं अब देखना हैकि पांचवें चरण में यहां के 311876 मतदाता किस पर मुहर लगाते हैं इतनी कोशिशों के बाद भा ज पा के पुराने लोग अपने घरों पर बैठे हैं और हर हाल में पार्टी व कार्यकर्ता के बीच अराजकता फैलानेवाले पार्टी के अच्छे दिनों में साथ आनेवालों को हरहाल में सबक सिखाने का लोगों में कौतूहल परवान चढ रहा है।

275 विधानसभा क्षेत्र अयोध्या-क्या बीजेपी को इस बार मिलेगें राम ?

अयोध्या, 2012 में यहां सपा का परचम लहाराया था। तेजनारायण पांडे उर्फ पवन पांडे ने। जब 1991 से 2012 तक लगातार विधायक रहे भाजपा के दिग्गज नेता लल्लू सिंह को पटखनी दी थी। यह उस चुनाव की बहुत बड़ी घटना थी। इसकी दो वजह थी- पहला लल्लू सिंह पार्टी के कद्दावर नेता है। वे पिछले 25 साल से अयोध्या सीट पर काबिज थे। दूसरा भाजपा के राजनीति की धुरी यही इलाका रहा है। यहां की सीट गवाना, वह भी उस पार्टी से जिसे रामविरोधी कहा जाता है, छोटी बात नहीं थी। वहां टहलने-घूमने पर मालूम चला की हालात ज्यादा नहीं बदले है।

 

कहा जा रहा है कि रामविरोधी पार्टी के प्रत्याशी और निवर्तमान मंत्री पवन पांड़े मजबूत स्थिति में है। हालांकि इसकी बड़ी वजह सपा-कांग्रेस का गठबंधन है। लोगों की राय है कि इस बार फिर पवन पांड़े सीट निकाल लेगे। वे आगे कहते हैं  कि अगर गठबंधन न हुआ होता तो पवन पांड़े सीट हार जाते। उनके कामकाज के बारे में पूछने पर मालूम चला कि ठीक-ठीक काम किया है। मगर वैसा नहीं की वे जीत जाते।

 

कुछ लोगों का यह भी कहना है कि वे अच्छी स्थिति में भाजपा की वजह से है। भाजपा ने वहां से वेद प्रकाश गुप्ता को उतारा है। इनको लेकर भाजपा में ही विरोध है जो जगजाहिर है। वे बसपा से भाजपा में आए हैं । संगठन से जुड़े लोगों का कहना है कि उनसे बेहतर लोग स्थानीय इकाई में मौजूद है। इसके बाद भी पार्टी ने समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करके बाहरी नेता को टिकट दिया। उनका अयोध्या में कोई जनाधार नहीं है। संगठन के लोगों का मानना है कि पार्टी ने पवन पांड़े के सामने एक कमजोर उम्मीदवार उतारा है। कहा जा रहा है कि वहां पर मुख्य मुकाबला सपा और बसपा के बीच है। 2012 के चुनाव में सपा के पवन पांडे को 55262 वोट मिले थे वहीं बीजेपी के लल्लू सिंह को 49857 वोट मिले थे।

कुल 3 लाख मतदाताओं में यहाँ 60 हजार दलित,50 हजार मुस्लिम मतदाता हैं जो निर्णायक भूमिका में हैं।

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156 विधान सभा क्षेत्रों में अतिपिछड़ी जातियों की हैं निर्णायक भूमिका

विधान सभा चुनाव-2017 के महासमर के चैथे से सातवे चरण के चुनाव में सत्ता की प्रबल दावेदार भाजपा महागठबंधन, सपा-कांग्रेस गठबंधन व बसपा की गंगा जमुना के दोआब, घाघरा, राप्ती, केन, बेतवा, गोमती, कर्मनासा, सई, तमसा, सरयू आदि नदियों के बेसिन में असल परीक्षा होगी। नदियों के इन दोआबों में राजनीतिक दलों के भाग्य का असली परीक्षा होती है। पूर्वांचल की 170 कानपुर क्षेत्र की 6़9 व बुन्देलखण्ड की 19 विधान सभा क्षेत्रों में चैथे चरण के रूप में 19 फरवरी, 23 फरवरी, 27 फरवरी, 4 मार्च व 8 मार्च को चुनाव होना है। इन क्षेत्रों की 156 विधान सभा क्षेत्रों में निषाद, कश्यप, बिन्द, कोयरी, काछी, पाल, बघेल, राजभर, चैहान, विश्वकर्मा, प्रजापति जैसी अतिपिछड़ी जातियां निर्णायक हैं।

 

उत्तर प्रदेश के बदलते हालात में सत्ता की प्रबल दावेदार भाजपा-अपना दल-भासपा, कांग्रेस-सपा व बसपा के मध्य जबरदस्त संघर्ष होना है। बुलन्देलखण्ड में बसपा का प्रदर्शन विगत चुनावों में बेहतर रहता रहा है। परन्तु इस बार भाजपा व सपा-कांग्रेस गठबंधन इनसे आगे निकलने की कवायद में जुड़े हैं। विगत विधान सभा चुनाव-2012 में सपा को पूर्वांचल की 170 सीटों में से 106 सीटें मिली थी। जबकि बुलन्देलखण्ड से उसे मात्र 4 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। विधान सभा चुनाव-2012 में पूर्वांचल की 106 सीटों में सपा सरकार के गठन में किंग मेकर की भूमिका निभाते हुए पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सहयोग किया। 2007 के विधान सभा चुनाव में बसपा को पूर्वांचल से 102 सीटें तथा राम लहर में भाजपा को 97 सीटें मिली थी और इन सीटों के साथ बसपा व भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकारे बनी थी। पूर्वांचल में वहीं दल आगे रहता हैं जिसे अतिपिछड़ों का भरपूर सहायोग मिलता है। सामाजिक चिन्तक लौटन राम निषाद ने कहा कि मुलायम सरकार से नाराज 17 अतिपिछड़ी जातियों के साथ-साथ अन्य अतिपिछड़ी जातियों ने विकल्प के तौर पर बसपा को चुना था और मायावती सरकार से नाराजगी व 17 अतिपिछडी जातियों ने अनुसूचित जाति आरक्षण के सवाल पर सपा को एक जुट हो समर्थन दिया और अखिलेश सरकार द्वारा इन जातियों को अनुसूचित जाति आरक्षण देने की पहल से एक बार फिर ये जातियां सपा के पाले में जा सकती हैं।

 

19 फरवरी को जिन क्षेत्रों में मतदान होना हैं, वे गंगा, जमुना, चम्बल बेसीन, गोमती, घाघरा, सई नदी के किनारे की विधान सभायें हैं। जिनमें से आधा क्षेत्र मुलायम सिंह यादव परिवार के प्रभाव वाले क्षेत्र हैं। 23 फरवरी को गंगा, यमुना, चम्बल, केन बेतवा नदियों के क्षेत्रों में चुनाव होना जिसमें निषाद जातियों की काफी निर्णायक स्थिति है। गंगा के किनारे फर्रूखाबाद, कन्नौज, कानपुर, उन्नाव, फतेहपुर, रायबरेली, प्रतापगढ़, कौशाम्बी, भदोही, मिर्जापुर, इलाहाबाद, चन्दौली, वाराणसी, गाजीपुर, बलिया व जमुना के किनारे औरैया, इटावा, जालौन, हमीरपुर, बांदा, इलाहाबाद, के क्षेत्र आते हैं। इसी तरह गोमती के किनारे सीतापुर, लखनऊ, बाराबंकी, अमेठी, सुल्तानपुर, जौनपुर, राप्ती के किनारे गोरखपुर, सिद्धार्थनगर, श्रावस्ती, संतकबीरनगर और घाघरा के दोनो पार अम्बेडकर नगर, आजमगढ़, बाराबंकी, बस्ती, बलिया, बहराईच, देवरिया, फैजाबाद, गोरखपुर, संतकबीरनगर, सीतापुर, गोण्डा जनपद की विधान सभायें जिसके किनारे निषाद मछुआरा जातियों की बड़ी संख्या निषाद करती है। चम्बल के क्षेत्र में इटावा जालौन, सई के किनारे उन्नाव, रायबरेली, अमेठी, सुल्तानपुर, जौनपुर, केन बेतवा के किनारे हमीरपुर, बांदा की विधान सभायें अवस्थित है।

 

आगामी दिनों में जिन विधान सभा क्षेत्रों में विधान सभा चुनाव होना है वे गंगा, जमुना, बेतवा, घाघरा, सरयू, केन, चम्बल, कर्मनासा, गांगी, मगई, छोटी सरयू, गोेमती, कनहर, सोन, रिहन्द, आमीन, सई, गन्डक, देशो, राप्ती, तमसा, टोंस, भैसही, व्यास, बेशो आदि नदियों के किनारे अधिकांश विधान सभा क्षेत्र अवस्थित है। जहां निषाद, मछुआरा, केवट, बिन्द, मल्लाह, कश्यप, राजभर, चैहान, कुशवाहा, मौर्य, काछी, कोयरी, गड़ेरिया, बियार, कुम्हार आदि अतिपिछड़ी जातियां बड़ी संख्या में पाई जाती है। जिसमें मिर्जापुर, इलाहाबाद, फतेहपुर, बांदा, हमीरपुर, कानपुर नगर, कानपुर देहात, फर्रूखाबाद, औरैया, उन्नाव, गाजीपुर, भदोही, चन्दौली, गोरखपुर, संतकबीरनगर, फैजाबाद, सिद्धार्थनगर, कुशीनगर, महाराजगंज, आजमगढ़, बलिया, बहराईच, गोण्डा, श्रावस्ती, सुल्तानपुर, अम्बेडकर नगर में अतिपिछड़ों में सबसे अधिक संख्या-निषाद, मल्लाह, केवट, बिन्द, जातियों की है। गाजीपुर, बलिया, मऊ आजमगढ़, देवरिया, कुशीनगर, चन्दौली में राजभर, चैहान जातियां कई विधान सभाओं में निर्णायक है। कुशवाहा मौर्य गाजीपुर, बांदा, फतेहपुर, इलाहाबाद, अम्बेडकरनगर, सोनभद्र, देवरिया, कुशीनगर, फर्रूखाबाद, झांसी की 20-22 विधान सभा क्षेत्रों में निर्णायक है। दबंग पिछड़ी जातियों में गाजीपुर, बलिया, आजमगढ़, जौनपुर, चन्दौली, फैजाबाद, देवरिया, में यादव, मिर्जापुर, इलाहाबाद, गोण्ड़ा, बाराबंकी, प्रतापगढ़, महाराजगंज, गोरखपुर, बस्ती, फैजाबाद, अम्बेडकरनगर, सिद्धार्थनगर, देवरिया, कुशीनगर, कानपुर, फतेहपुर, चित्रकूट, बांदा में कुर्मी व मैनपुरी, इटावा, औरैया, फर्रूखाबाद, कन्नौज, उन्नाव, फतेहपुर, रायबरेली, जालौन, हमीरपुर, महोबा की दो दर्जन विधान सभा क्षेत्रों में किसान, लोधी जाति निर्णायक स्थिति में हैं। सामाजिक चिन्तक लौटन राम निषाद ने कहा कि आगामी चरणों में जो चुनाव होना है उसमें निषाद राज के वंशजों की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी और निषाद राज के वंशज ही राजनीतिक दलों के भाग्य का फैसला करेंगे। देखना होगा कि केवट, निषाद किसकी नईया को पार लगाते हैं।

मिर्जापुर में 76 प्रत्याशी मैदान में जानिए कौन हैं मैदान में

मिर्ज़ापुर, विधानसभा चुनाव के लिए गुरुवार को नामांकन का अंतिम दिन था। नामांकन के अंतिम दिन तक कुल 76 उम्मीद्वारो ने नामांकन दाखिल किया।आज नामांकन के अंतिम दिन कुल 31 प्रत्यशियों ने नामांकन दाखिल किया जिसमें निर्दलो की संख्या ज्यादा था।आज नगर विधान सभा से 9 प्रत्यशियों ने नामांकन दाखिल किया तो छानवे विधानसभा से 4 और मड़िहान से 7 प्रत्यशियों ने नामांकन किया और मझवां से 7 और  चुनार से 4 प्रत्यशियों ने चुनावी मैदान में उतरने के लिए नामांकन दाखिल किया है।

 

अब तक कुल 76 नामांकन हुए है। जिनमे से नगर विधान सभा से  20 प्रत्यशियों ने नामांकन किया तो  छानवे में 10 और मझवां में 20  साथ ही  चुनार में 12 और मड़िहान में 14 प्रत्यशियों ने नामांकन दाखिल किया है। 22 फरवरी तक नाम वापस लेने की तारीख है।इसके बाद चुनावी प्रचार जोर पकड़ता जायेगा।

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नामाकंन के बाद मझंवा विधानसभा क्षेत्र से युवा  प्रत्यशी निर्दल आशीष त्रिपाठी ने मीडिया से बताया कि जो इस समय राजनीति चल रही है ,हम भी प्रयासरत थे की किसी पार्टी से टिकट मिल जाए लेकिन दिग्गज शूरमाओ के  सह-मात के खेल मे ,नही मिला तो क्या हुआ हम चुनाव निर्दल ही लड़ेंगे,वही कहा कि हमारा क्षेत्र विकास से काफी पीछे चला गया ,हम क्षेत्र कि जनता को विकास के मुद्दो पर चुनाव लड़ रहे हैं।

UP Election 2017-पूर्वांचल की दहलीज पर सियासी रथ

पूर्वांचल, यहाँ की कुल जमा सियासी कहानी इतनी भर है कि मतदाता जाति और धर्म की बेड़ियों में जकड़ा है। और दल जीत की चाह में समर्पण और सेवा को भूलाकर जीताऊ उम्मीदवार पर दाँव लगा रहे हैं। इस वजह से पार्टी के लोग बागी हो गए है। इस बगावत  और जातीय समीकरण के गुणा-भाग में सियासी ऊट किस करवट बैठेगा, यह तो समय ही बताएगा।

 

शहर दर शहर पोस्टर, बैनर और होर्डिंग गायब थे। दीवारें से राजनीतिक लड़ाई हट चुकी थी। सड़क और गांव की पगडंड़ियों के किनारे खड़े खंभे बेहद सकून में थे। कोई महीना भर पहले इस तरह के हालात नहीं थे। शहर राजनीतिक पोस्टरों की मंड़ी बन गए थे और खंभे, छते व दीवारें उनका शोरूम। हालांकि अब हालात बदल गए है। यह चुनावी अधिसूचना का असर है। जो साफ दिख रहा है। कोई भी दल चुनाव आयोग से नाहक नूरा-कुश्ती करने के मूड में नहीं है। हालात यह है कि समाजवादी साइकिल पथ पर लगे खंभों पर भी कालिख पुता है। कारण उस पर साइकिल का निशान है। प्रशासन सक्रिय है। जगह-जगह पुलिस और अर्द्धसैनिक बल के दस्तें गाड़ियों की तलाशी ले रहे हैं। किसी को भी कोई सहुलियत नहीं दी जा रही है। मगर इसके लिए वहां पर कप्तान साहब या फिर अर्द्धसैनिक बल का मौजूद होना पहली शर्त है। जहां कही भी चेक पोस्ट पर इन लोगों की गैर-मौजूदगी रहती है वहां पर मुंह देखकर तलाशी होती है। खास लोगों को खास सुविधा के तहत बिना तलाशी के ही छोड़ दिया जाता है। लेकिन जब साहब या अर्द्धसैनिक बल के लोग रहते है तो गाड़ी में सवार लोगों की पाकेट तक को नहीं बख्शा जाता।

 

आयोग की चुस्ती के कारण प्रत्याशी भी सतर्क है और चतुराई के साथ काम कर रहे हैं। दिन में प्रचार करते समय वे पार्टी के झंडे का इस्तेमाल करने से बचते हैं। लेकिन शाम ढलते ही हाथी, कमल, साइकिल से सजी गाड़ियां आयोग को मुंह चिढ़ाती हुई निकल पड़ती है। और जैसे-जैसे रात होती है वैसे-वैसे आयोग के तमाम नियम कानून को ठेंगा दिखाने का काम शुरु हो जाता है। कही कंबल बंटते है तो कही कुछ और। इसकी कानों-कान खबर जिसे दिया जाता है उसे भी नहीं रहती है। उसको तो लगता है कि फला आदमी उसे इंसानियत के नाम पर कुछ दे रहा है। लेकिन वहां से दूर गुप अंधेरे में खड़ी और समानों से भरी गाड़ी कुछ अलग हकीकत बयान करती है। कहने का मतलब इतना भर है कि रात के अंधेरे में मतदाता को प्रभावित करने का खेल चल रहा है।

 

गनीमत बस इतना ही है कि  शोर मचाते लोउडस्पीकर नदारद है। मगर वो भी अवध प्रांत की राजधानी रहे फैजाबाद में दिखे। लेकिन कुछ ही पल में इस बात का भ्रम टूट गया कि वो चुनावी प्रचार कर रहे हैं। वो तो रामचरित मानस का दोहा 'होए सोई जो राम रचि रखा, का कर तर्क बढावई शाखा' गा रहे थे। वह सुनकर ऐसा लग रहा था  जैसे वह राजनीतिक दलों से कह रहे हो कि होगा वही जो हरि इच्छा होगी। मगर मानने वाला कौन है? चुनाव सिर पर है। यह वह इलाका है जहां पाचवें चरण में मतदान होगा। इसमें तीन मंडल (फैजाबाद, बस्ती और देवीपाटन मंडल) शामिल है जिसमें 52 सीटें है। 2012 में यहां से सपा को 37 सीटें मिली थी, वही बसपा तीन सीट पर ही सिमट गई थी। भाजपा और कांग्रेस को पांच-पांच सीटें लेकर ही संतोष करना पड़ा था। वो साइकिल का दौर था। मगर 2014 के आम चुनाव में साइकिल पटरी से उतर गई थी। मोदी की आंधी नेसबको सकते में डाल दिया था। यहां की सारी सीटें भाजपा की झोली में गई थी।  वो 2014 का दौर था जब 'हर-हर मोदी, घर-घर मोदी ' का नारा था। अब 2017 है। मोदी की जगह भाजपा ने ले ली है। सियासत में जातीय समीकरण और ध्रुवीकरण घुस चुका है। हर कोई अपने नफा-नुकासन के हिसाब से सियासी बायोडाटा बदल रहा है। कब, कौन किसके पाले में चला जाए, कहना मुश्किल है।

 

मगर यही तो चुनावी रोमांच है जिसे जानने-समझने की यात्रा 31 जनवरी को लखनऊ से शुरू हुई। जाहिर तौर पर पहला पड़ाव अयोध्या रहा। यह वही शहर है जिसके इर्द-गिर्द कमंडल की राजनीति का तानाबान बुना गया था। उसी के सहारे भाजपा ने अपनी सियासत चमकाई। और वह इस लायक बनी कि उसे दिल्ली की गद्दी मिली। लिहाजा उसके लिए रामबाण बनी सियासी जमीन को टटोलना स्वभाविक था। यहां आना इसलिए भी जरूरी था क्योंकि सपा का भी राजनीतिक उत्थान इसी की देन है। यही से मुलायम सिंह यादव मुल्ला मुलायम बने और लखनऊ में गद्दीनशीन हुए। इसीलिए यह सीट खासा मायने रखती है। 2012 में यहां सपा का परचम लहाराया था। तेजनारायण पांडे उर्फ पवन पांडे ने भाजपा के दिग्गज नेता लल्लू सिंह को पटखनी दी थी। यह उस चुनाव की बहुत बड़ी घटना थी। इसकी दो वजह थी- पहला लल्लू सिंह पार्टी के कद्दावर नेता है। वे पिछले 25 साल से अयोध्या सीट पर काबिज थे। दूसरा भाजपा के राजनीति की धुरी यही इलाका रहा है। यहां की सीट गवाना, वह भी उस पार्टी से जिसे रामविरोधी कहा जाता है, छोटी बात नहीं थी। वहां टहलने-घूमने पर मालूम चला की हालात ज्यादा नहीं बदले है।

 

कहा जा रहा है कि रामविरोधी पार्टी के प्रत्याशी और निवर्तमान मंत्री पवन पांड़े मजबूत स्थिति में है। हालांकि इसकी बड़ी वजह सपा-कांग्रेस का गठबंधन है। पप्पू ने कहा कि इस बार फिर पवन पांड़े सीट निकाल लेगे। वे आगे कहते हैं  कि अगर गठबंधन न हुआ होता तो पवन पांड़े सीट हार जाते है। उनके कामकाज के बारे में पूछने पर पप्पू ने कहा कि ठीक-ठीक काम किया है। मगर वैसा नहीं की वे जीत जाते। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि वे अच्छी स्थिति में भाजपा की वजह से है। भाजपा ने वहां से वेद प्रकाश गुप्ता को उतारा है। इनको लेकर भाजपा में ही विरोध है जो जगजाहिर है। वे बसपा से भाजपा में आए हैं । संगठन से जुड़े लोगों का कहना है कि उनसे बेहतर लोग स्थानीय इकाई में मौजूद है। इसके बाद भी पार्टी ने समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करके बाहरी नेता को टिकट दिया। उनका अयोध्या में कोई जनाधार नहीं है। संगठन के लोगों का मानना है कि पार्टी ने पवन पांड़े के सामने एक कमजोर उम्मीदवार उतारा है। कहा जा रहा है कि वहां पर मुख्य मुकाबला सपा और बसपा के बीच है।

 

यहां के हालात से रूबरू होते-होते हम लोग गोड़ा-बस्ती की सीमा में पहुंच गए। तय हुआ कि बस्ती की तरफ चलते है। उसकी खास वजह हरैया थी। यह बस्ती शहर की विधान सभा सीट है। इस क्षेत्र का भी बहुत धार्मिक महत्व है। इलाके का असल नाम ‘हरि रहिईया’ है। यह नाम कैसा पड़ा इसका दिलचस्प किस्सा है। कहा जाता है कि जनक सुता को ब्याह कर भगवान श्री राम इसी रास्ते से अयोध्या गए थे। इसीलिए इसका नाम ‘हरि रहिईया’ पड़ गया।  मान्यता यह भी है कि राजा दशरथ ने संतान प्राप्ति के लिए यहाँ बहने वाली मनोरमा नदी के किनारे हवन किया था। लिहाजा इस जगह  का अपना अलग धार्मिक महत्व है।

 

लेकिन इस सीट का सियासी महत्व भी कुछ कम नहीं है। यहां से राजकिशोर सिंह विधायक है जो सपा सरकार में मंत्री थे। वे लगातार तीन बार से सीट पर काबिज है। उनके खिलाफ भाजपा ने  अजय सिंह को उतारा है। वे कांग्रेस से भाजपा में आए है। इनकी छवि राजकिशोर की ही तरह शोषक की है। राजकिशोर को लेकर यहां के लोगों में बहुत में आक्रोश है। खुद उनकी बिरादरी के लोग ही उनका साथ छोड़ रहे हैं। उन पर कई तरह के आरोप है। यह आरोप कोई और नहीं वहां की जनता लगा रही है। वहां पर जिस तरह का माहौल पूर्व मंत्री को लेकर है उससे लगता है कि लड़ाई भाजपा और बसपा में है। वही अगर जातीय गुणा-भाग को देखा जाए तो बसपा ने ब्राह्मण उम्मीदवार उतारकर अपनी दावेदारी मजबूत कर ली है। इसी बीच जनसंपर्क में मशगूल हरैया से बसपा प्रत्याशी विपिन शुक्ला दिख गए। वे अपनी जीत को लेकर आश्वस्त है। हो भी क्यों न, हरैया से सटे कप्तानगंज सीट के दिग्गज और पूर्वांचल के चौधरी क्षत्रप राम प्रसाद चौधरी उनके लिए प्रचार कर रहे है। उनका काफिला कप्तानगंज जाते समय रास्ते में दिखा है जो कि पूर्वांचल के सामांती समाज के हिसाब से बहुत छोटा था। यह बहुत चौंकाने वाला था क्योंकि इधर का छुटभैया नेता भी दस गाड़ियों के साथ चलता है। और वे तो चौधरी क्षत्रप है। पूछने पर पता चला कि यह उनकी सादगी नहीं, मजबूरी है। चुनाव आयोग के सामने सबने घुटने टेक दिए है।

 

जहां तक बात बस्ती सदर की है तो वहां मुख्य मुकाबला भाजपा और बसपा के बीच है। मगर अंदरखाने में जो चर्चा है अगर उसकी माने तो चौधरी क्षत्रप नहीं चाहते कि सदर की सीट बसपा निकाले। जो भी हो वहां पर लड़ाई में कोई त्रिकोण नहीं है। मगर रूधौली सीट पर ऐसा नहीं है। वहां लडाई त्रिकोणीय है। सपा, बसपा और भाजपा आमने-सामने है। इस सीट पर भाजपा ने कांग्रेस विधायक संजय जयसवाल को उतरा है। कहा जा रहा है कि  भाजपा ने उन्हें क्रांस वोटिंग का ईनाम दिया है।

 

हालांकि महादेवा सीट पर रवि सोनकर को भाजपा ने किस बात का  ईनाम दिया है, मालूम नहीं है। उन्हें सपा विधायक और मंत्री रामकरन आर्य के सामने उतारा गया है। वह सुरक्षित सीट है। यहां से बसपा के प्रत्याशी दूधराम है। यह सीट पिछले दो दशक से घूम फिर कर इन्हीं दोनों के पास रही है। इस सीट से एक मिथ भी जुड़ा है। इधर के लोगों का मानना है कि जो पार्टी यहां से चुनाव जीतती है लखनऊ में उसी की सरकार बनती है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस सीट को लेकर जो मिथ है वह टूटेगा या फिर वह जिसके तहत अखिलेश ने चुनाव अभियान सुल्तानापुर से शुरु किया था। माना जाता है कि जो मुख्यमंत्री चुनाव अभियान यहां से आरंभ करता है उसे सूबे की कुर्सी मिलती है। उसी कुर्सी के खेल में राजनीतिक दल आधी आबादी के हक को भूल गए हैं। उसे याद दिलाने का बीड़ा बस्ती के जाने माने समाजसेवी पंडित सुनील कुमार भट्ट ने उठाया है। उन्होंने बस्ती मंड़ल में महिलाओं को  जागरूक करने का अभियान चला रखा है। इसका प्रभाव संतकबीर नगर जिले तक है। इस जिले में तीन सीटे है जहां पर लड़ाई त्रिकोणीय है।

 

यह वही इलाका है जहां से पीस पार्टी ने सीट निकाली थी। 2012 में इसका पूर्वांचल और तराई की कुछ सीटों पर बहुत जोर था। माना जा रहा था कि पार्टी 10-12 सीट निकालेगी। लेकिन उसकी झोली में चार सीटें गई थी और वह मत के हिसाब से सूबे की पांचवी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी। पार्टी के अध्यक्ष डा. मोहम्मद आयूब संतकबीर नगर से जीते थे। वहां पर उनकी छवि बेहद मजबूत है। उनके काम-काज की इलाके में चर्चा भी बहुत है। मगर बातचीत में लोग कहते है कि इस बार उनके लिए सीट निकालना सहज नहीं होगा। इसकी वजह बसपा और भाजपा के प्रत्याशी को बताया जाता है। सपा के बारे में पूछने पर कहते है कि यहां पर उनका कोई वजूद नहीं है। लेकिन साथ में यह बताने से नहीं चूकते कि गठबंधन से सपा मजबूत हुई है। वे कहते हैं कि अखिलेश ने बहुत बढ़िया  काम किया है।

 

कमोवेश इसी तरह का जवाब गोड़ा जिले की तबरगंज विधान में भी मिला। वहां लोगों ने बताया कि अखिलेश सरकार ने लोहिया आवास योजना के तहत गरीबों को रहने के लिए छत दी है। स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराई है। हमें बसपा के लोग ठग नहीं सकते। हम अनपढ़ जरूर है लेकिन सब समझते है। हालांकि भाजपा का नाम लिए बगैर नरायनपुर के लोगों ने कहा कि नोटबंदी का नुकसान बसपा को भी होगा। कारण पूछने पर कहते है कि बहन जी भाजपा के बजाए सपा पर हमला ज्यादा कर रही है। इस सीट पर मुकाबला सपा सरकार के मंत्री पंडित सिंह और भाजपा प्रत्याशी प्रेम नारायण पांडे के बीच है। यहां का सियासी मुकाबला इसलिए भी दिलचस्प हो गया है क्योंकि बसपा में रहे मंजू सिंह ने पिछले दिनों भगवा झंडा थाम  लिया। कहा जा रहा है कि उन्होंने भगवा झंडा सांसद ब्रजभूषण सिंह के कहने पर उठाया है।  वे प्रेम नारायण के लिए चुनाव प्रचार कर रहे हैं। माना जा रहा है कि मंजू सिंह के आने से भाजपा का पलड़ा भारी हो गया है।

 

स्थानीय लोगों की माने तो इसीलिए पंडित सिंह की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। उसको बचाने के लिए वे हर तरह का खेल, खेल रहे हैं। वही गोंडा सदर से भाजपा सांसद ब्रजभूषण सिंह की आन दांव पर है। वजह उनके सपुत्र इस सीट से मैदान में है। और उनका मुकाबला पंडित सिंह के पुत्र से है। जाहिर है ब्रजभूषण सिंह अपना पूरा जोर लगाएगें। पंडित सिंह भी पीछे रहने वाले कहां है। इन दोनों की प्रतिस्पर्धा बहुत पुरानी है। उसे लेकर गोंड़ा में कई किस्से प्रचलित है। उसी विरासत को दोनों के पुत्र आगे बढ़ाने पर तुले है। उस पर भाजपा नेता महेश तिवारी की बगावत ने ब्रजभूषण सिंह की राह को मुश्किल कर दिया है। महेश तिवारी टिकट न मिलने से बागी हो गए है। उनको मनाने की कोशिश जारी है। खैर जो भी हो मसला है जिले की सात सीटों का है जिसमें से महज एक सीट 2012 के चुनाव में भाजपा को मिली थी। बाकी पर सपा काबिज थी। इस बार किसका झंड़ा लहराएगा, वह तो समय ही बताएगा। मगर यहां पर जो जातीय जकड़न है उससे एक बात तो साफ है कि अधिकांश सवर्ण बसपा के साथ जाने के मूड में नहीं है। कमोवेश यही हालात बलरामपुर, बहराइच और श्रावस्ती में भी है। इन तीनों जिलों की 13 सीटों में से महज दो पर भाजपा ने जीत हासिल की थी। बाकी सारी सीटें सपा की झोली में गई थी। अपवाद स्वरूप एक सीट बसपा को और दो कांग्रेस के खाते में गई थी। हालांकि यहां का मौजूदा सियासी समीकरण पिछले साल दशहरे में हुए दंगों से उपजी कडुवाहट पर निर्भर करेगा। इस इलाके में सपा को लेकर खासा आक्रोश है। लोगों में जाति और धर्म विशेष को तरजीह देने से बहुत नाराजगी है। इस बीच मुसलमान चुप है। वह अपने पत्ते नहीं खोल रहा है।

 

उधर सिद्धार्थनगर जिले में जहां पर सपा या फिर भाजपा का कब्जा रहा है, वहां बसपा अपनी सियासी जमीन तलाशने में लगी है। यह नियत का मजाक ही है कि जिस बुद्ध की थाती पर बसपा अपना दावा करती है उसी की जन्म स्थली पर बसपा सियासी राह टोह रही है। रही बात भाजपा की तो यहां पर भी बगावत का शोर जोरों पर है। यहां के स्थानीय नेता हरिशंकर सिंह और राधारमण त्रिपाठी टिकट कटने से खासा नाराज है। उन लोगों ने पार्टी को सबक सीखाने का मन बना लिया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि वे चुनाव को कितना अपने पक्ष में मोड़ पाते है।


कुछ इसी तरह का कौतूहल अम्बेडकर जिले की पांच सीटों को लेकर है। इसे मायावती का घर माना जाता है। एक दौर में मायावती ने यहां से चुनाव लड़ा था। उन्होंने ही इसे अलग जिला बनाया। यह बसपा का गढ़ हुआ करता था जिस मिथ को 2012 में सपा ने तोड़ दिया। उस चुनाव में यहां की सारी सोटे सपा की झोली में गई थी। वह भी तब जबकि बसपा के प्रदेश अध्यक्ष रामअचल राजभर का यह गृह जनपद है। पिछले चुनाव में वे अपनी भी सीट नहीं बचा पाए थे। मौजूदा चुनाव में बसपा वापसी कर पाएगी या फिर सपा 2012 के प्रदर्शन को दोहराएगी, यह समय ही बताएगा। मगर यहां के सियासी समीकरण में जो जातीय गणित है वह बड़े उलट-फेर का संकेत दे रहा है।  

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