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updated 8:02 AM UTC, Feb 28, 2017
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गाउन पर बैन की मांग पहुँची प्रधानमंत्री कार्यालय-लग सकता है "ब्लैक गाउन" पर बैन

दीक्षांत समारोह में गाउन पहनने की बाध्यता न हो, इस विदेशी पंरपरा को तुरंत खत्म किया जाए। इस मुद्दे को लेकर लंबे समय से अपनी आवाज बुंलद करने वाले मध्यप्रदेश के मंहत डाॅ0 अवधेशपुरी महाराज की मांग पर केंद्र सरकार की विश्वविधालय समन्वय समिति ने एक कमेटी का गठन किया। गाउन पर बैन को लेकर उनकी मांग इस समय प्रधानमंत्री कार्यालय में भी गूंज रही है। हो सकता है कि किसी भी वक्त गाउन पहनने को लेकर केंद्र सरकार बंदी के आदेश पारित कर दे। पूरे मुद्दे पर रमेश ठाकुर ने डाॅ0 अवधेशपुरी महाराज से विस्तृत बातचीत की।  

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गाउन बंदी को लेकर आपकी मांग मध्यप्रदेश से दिल्ली तक पहुंच गई है?

वर्ष 2014 में मुझे अपनी पीएचडी की उपाधी लेनी थी। मुझे गाउन पहनने को कहा गया, मैंने मना कर दिया। मैंने भारतीय परिधान में डिग्री लेने का आग्रह किया। उसी दिन मैंने मध्यप्रदेश सरकार को एक खत लिखा जिसमें पूरे प्रदेश भर के विश्वविधालयों में डिग्री ग्रहण के दौरान गाउन पहनने पर प्रतिबंध की मांग की। राज्य सरकार ने मेरे खत पर गंभीरता से विचार किया। सीएम कार्यालय से वह खत वाइस चांसलर के पास राय लेने को भेजा। उन्होंने मेरे खत का समर्थन किया। इसके बाद मेरी मांग पूरे भारत में आग की तरह फैल गई। कई लोग दीक्षांत समारोह में गाउन पहनने से मना करने लगे। इसके बाद मैं लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन से मिला। उन्होंने सदन समिति में मेरी मांग रखी। जिस पर अधिकांश सदस्यों ने मेरी मांग का जायज माना। अब मामला प्रधानमंत्री के पास पहुंच गया है। मुझे पूरी उम्मीद है कि गाउन पर बैन को लेकर देर-सबेर फैसला ले लिया जाएगा। रोहतक की एमडीयू और रेवाड़ी की इंदिरा गांधी यूनिवर्सिटी ने तो ऐलान भी कर दिया है कि वे अब इस परिधान को लागू नहीं करेंगे।

 

दीक्षांत समारोह में डिग्रियां लेते वक्त काला गाउन पहनने की परंपरा दशकों पुरानी है, आखिर दिक्कत क्या इसमें?

दिक्कर नहीं है, लेकिन संस्कृति के खिलाफ है। दरअसल काला गाउन हमें आज भी गुलामी का अहसास कराता है। दीक्षांत समारोह में डिग्री लेने के दौरान जो गाउन (रोब) डाला जाता है वह पाश्चात्य संस्कृति का प्रतीक है। एक तरफ हम स्वदेशी होने की बात करते हैं दूसरी तरह हम अंग्रेजों द्वारा स्थापित रिवाज को अब भी मनाते हैं। आखिर क्यों? हिंदुस्तान जब अंग्रेजों की गुलामी की बेड़ियों में बंधा था तब लार्ड मैकाले की शिक्षा शुरू की गई थी। तब यहां इंग्लैंड की परंपराओं को लागू किया गया और तभी से भारत में उन्हीं की रिवाजों को निभाया जाता रहा है। जो भी विद्यार्थी स्नातक करने के बाद डिग्री लेता है तो उसे काला गाउन पहनने पर बाध्य किया जाता है। इसे रोब भी कहा जाता है। हालांकि संकाय के हिसाब से इसका रंग भी बदला जाता रहा है। लेकिन इस रिवाज को बदलने की आवाज अब चारों ओर उठ खड़ी हुई है। मुझे उम्मीद है केंद्र की मोदी सरकार जल्द अंग्रेजी परंपरा को खत्म कर देशी ड्रेस कोड लागू करेगी।

 

आपकी मांग का समर्थन कई राज्य भी करने लगे हैं?

कोई विरोध करेगा इसका सवाल ही नहीं उठता। आप जल्द देखेंगे, वह दिन दूर नहीं जब भारतीय परिधान में विद्यार्थियों को डिग्रियां दी जाएंगी। जल्द ही पूरा भारत एक ही रंग में रंगा नजर आएगा। राजस्थान सरकार ने दीक्षांत समारोह में काले गाउन की जगह सफेद ड्रेस पहनने के दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। उनके शिक्षा मंत्री कालीचरण सर्राफ ने पिछले साल ही ऐलान कर दिया था कि अंग्रेजों के समय से चलती आ रही यह ड्रेस रिवाज जल्द ही इतिहास बनने जा रही है। नया ड्रेस कोड प्राइवेट यूनिवर्सिटीज पर भी लागू होगा। राजस्थान ऐसा करने वाला देश का पहला राज्य है। हरियाणा के शिक्षा मंत्री ने भी मेरी मांग की वकालत करते हुए कहा है कि भारतीय संस्कृति के खिलाफ अभी तक शिक्षा में कांग्रेस सरकार अंग्रेजों के मार्गदर्शन पर चल रही थी, उसे बंद करना बहुत जरूरी है।

 

गाउन की जगह क्या उपयोग करने की मांग है आपकी?

गाउन की जगह भारतीय परिधान में दी जाए डिग्रियां। डिग्री लेते वक्त विद्यार्थियों के गले में हमारी देशी संस्कृति के अनुरूप लाल रंग के पटके होने चाहिए। छात्रों के लिए सफेद पेंट और शर्ट और छात्राओं के लिए सलवार-कुर्ता ड्रेस कोड तय करने की मांग की है। गाउन न अपनाने की मांग मेरे अकेले की नहीं है। कई विश्वविधालयों में इस परंपरा को खत्म ही कर दिया है। हरियाणा सरकार के मौजूदा वित्तमंत्री कैप्टन अभिमन्यु ने भी गाउन पहनने से मना कर दिया था। उस वक्त डन्होंने भी कहा था कि पुराने प्रतीक और चिह्न छोड़कर मौलिक संस्कृति के प्रतीकों को स्वीकार किया जाए। इसके बाद हरियाणा की कई यूनीवर्ससिटीज में गाउन पहनने का चलन बंद हो गया। गाउन का समर्थन कोई भी नहीं कर रहा। देश में कोई भी मुद्दा होता है उसे हिंदु-मुस्लिम बना दिया जाता है, लेकिन इस मुद्दे पर सभी समुदाय एक साथ खड़े हैं

 

गाउन पर बैन से शिक्षा क्षेत्र में क्या बदलाव आएगा?

हम शिक्षा का आधुनिक स्वरूप देशी संस्कृत में बिखरता देखना चाहते हैं, जिसमें संस्कार और संस्कृति की छटा साफ दिखाई पड़े। यही वजह है कि आज स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले विषयों में गीता को शामिल की जा चुका है। योग की शिक्षा भी शुरू हो गई है। काला गाउन जब भी हम देखते है तो गुलामी की तस्वीर अनायास हमारे आंखों के आगे तैरने लगती है। इसलिए अंग्रेजों की परंपरा को बंद करने का समय है। बड़ी बात यह है कि इसके लिए खुद यूनिवर्सिटीज के वीसी आगे रहे हैं। इस मुद्दे पर अगर वोटिंग कराई जाए तो मत सत-प्रतिशत पक्ष में पडेंगे।

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सुभारती में फिल्म निर्माण कार्यशाला का शुभारम्भ

मेरठ। सुभारती पत्रकारिता एवं जनसंचार संस्थान में पन्द्रह दिवसीय फिल्म निर्माण कार्यशाला का आज से शुभारम्भ किया गया। फिल्म निर्माण विशेषज्ञ संजय कुमार श्रीवास्तव का स्वागत करते हुए संस्थान के डीन एवं प्राचार्य डॉ. धर्मेन्द्र सिंह ने बताया कि कार्यशाला का मूल उद्देश्य पत्रकारिता एनं जनसंचार के विद्यार्थियों को अधिक से अधिक प्रायोगिक रूप से कार्यकुशल बनाना है और इंडस्ट्री की जरूरतानुसार उन्हें तैयार करना है।

 

पन्द्रह दिन तक चलने वाली इस कार्यशाला में विद्यार्थी फिल्म निर्माण के सभी चरणों का प्रायोगिक (प्रेक्टिकल) ज्ञान अर्जित कर सकेंगे, जिसमें आईडिया विकसित करने से लेकर फिल्म के सम्पादन तक का स्तर शामिल है। इस कार्यशाला का संचालन फिल्म निर्माण विशेषज्ञ संजय कुमार श्रीवास्तव करेंगे। पहले दिन उन्होंने विद्यार्थियों को आईडिया और विषय का बृह्द ज्ञान दिया साथ ही कई फिल्में भी दिखाई।


इस मौके पर विभाग  के डीन डॉ. धर्मेन्द्र सिंह ने बताया कि पांच-पांच विद्यार्थियों का समूह निर्माण कर कई फिल्में भी निर्मित की जायेगी जिनकी एक निश्चित तिथि पर स्क्रीनिंग की जाएगी। उन्होंने बताया कि विभाग का इस कार्यशाला के आयोजन में निहीत उद्देश्य है कि विभाग के विद्यार्थी अधिक से अधिक कार्यकुशल बनें और मीडिया इंडस्ट्री में जिस तरह के कुशल लोगों की जरूरत है उसी पैमाने पर विभाग उन्हें तैयार कर फील्ड में उतार सके। इस तरह की कार्यशाला विभाग पहले भी करता रहा और आगे भी आयोजित करने की योजना है। इस मौके पर विभाग के उप-प्राचार्य डॉ. नीरज कर्ण सिंह, सहायक प्राध्यापक प्रियंका गौतम, राकेश कुमार, कामिनी अलोरिया, मुद्दसिर सुल्तान सहित कई विद्यार्थी मौजूद थे।

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