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updated 8:08 AM UTC, Apr 24, 2018
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कानून से ज्यादा जरूरी है सोच का बदलना

रवि उपाध्याय/बाल यौन उत्पीड़न संरक्षण कानून यानी पॉक्सो में संशोधन संबंधी अध्यादेश को केंद्रीय मंत्रिमंडल और फिर राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई। अब बारह साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार करने वालों को मौत की सजा का प्रावधान किया जा सकेगा। प्रश्न है कि अभी तक पाॅक्सो कानून ही पूरी तरह से सख्ती से जमीन पर नहीं उतरा है तो उसे और कड़ा करना क्यों जरूरी है?

 

हमारे देश में कानून बनाना आसान है लेकिन उन कानूनों की क्रियान्विति समुचित ढं़ग से न होना, एक बड़ी विसंगति है। क्या कारण है कि पाॅक्सों कानून बनने के बावजूद एवं उसकी कठोर कानूनी स्थितियों के होने पर भी नाबालिग बच्चियों से बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही है।

 

पिछले दिनों उन्नाव, कठुआ और सूरत आदि में नाबालिग बच्चियों के साथ सामूहिक बलात्कार की घटनाएं सामने आईं, तो देश भर से मांग उठी कि पॉक्सो कानून में बदलाव कर नाबालिगों के साथ बलात्कार मामले में फांसी का प्रावधान किया जाना चाहिए। क्या फांसी की सजा का प्रावधान कर देने से इस अपराध को समाप्त किया जा सकेगा? सोच एवं व्यवस्था में बदलाव लाये बिना फांसी की सजा का प्रावधान कारगर नहीं होगा।

 

बाल यौन उत्पीड़न एवं शोषण पर प्रभावी नियंत्रण के लिये जरूरत इस बात की भी है कि ऐसे मामलों की जांच और निपटारा शीघ्र होना चाहिए। इसके लिये सरकार ने पॉक्सो कानून में बदलाव संबंधी अध्यादेश तैयार किया, जिसमें पहले से तय न्यूनतम सजाओं को बढ़ा कर मौत की सजा तक कर दिया गया है।

 

ऐसे मामलों के निपटारे के लिए त्वरित अदालतों का गठन होगा और जांच को अनिवार्य रूप से दो महीने और अपील को छह महीने में निपटाना होगा। निश्चित ही ऐसे और इससे भी सख्त प्रावधान नाबालिगों के बलात्कार एवं पीड़िता के हत्या के मामलों में किये जाने चाहिए, इस दिशा में सरकार की सक्रियता स्वागत योग्य है।

 

बच्चियों के साथ बलात्कार एवं दुष्कर्म कोरे दंडनीय अपराध ही नहीं होते, वे समाज के लिए पीड़ादायक भी होते हैं। वे राष्ट्र के लिए लज्जा और गहन व्यथा का विषय भी होते हैं। कानून का कठोर होना अच्छी बात है। कानून का भय होना और भी अच्छी बात है, लेकिन समाज का उदासीन एवं मूकदर्शक हो जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।

 

कोई भी समाज-व्यवस्था या राज्य व्यवस्था कानून के बल पर अपराध मुक्त नहीं हो सकती है। एक आदर्श समाज व्यवस्था के लिये हर व्यक्ति का जागरूक, संस्कारी एवं चेतनाशील होना जरूरी है। संस्कारी मनुष्य के निर्माण में राजव्यवस्था की भूमिका नगण्य होती है, यही कारण है कि कड़े कानूनों की आवश्यकता पड़ती है।

 

जघन्य अपराधों की बढ़ोतरी कोई भी सरकार बर्दाश्त नहीं करती, लेकिन अपराधवृद्धि के तमाम कारणों पर नियंत्रण के लिये सरकार की जिम्मेदारी ज्यादा जरूरी है। इसलिए अपने नागरिकों को उच्चतर जीवन आदर्श देना सरकार की ही जिम्मेदारी है, लेकिन सरकारें अपनी इस जिम्मेदारी से भागती रही है।

 

पॉक्सो कानून कोे सख्ती से लागू किये जाने की ज्यादा आवश्यकता है और उससे भी ज्यादा जरूरत इस बात की है कि इन कानूनों का दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ और ज्यादा सख्त कार्यवाही की जाए। समाज के निर्दोष लोगों को अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिये इस तरह के फर्जी मामले बनाकर उन पर ये सख्त कानून लागू किये जाने की घटनाएं भी बढ़ रही है।

 

यह स्थिति ज्यादा त्रासद एवं भयावह है। कुल मिलाकर अब समय आ गया है कि हम अपनी सोच बदलें। ऐसे मामलों की शिकायत दर्ज करने और जांचों आदि में जब तक प्रशासन का रवैया जाति, धर्म, समुदाय आदि के पूर्वाग्रहों और रसूखदार लोगों के प्रभाव से मुक्त नहीं होगा, या इस तरह के कानूनों को आधार बनाकर अपने प्रतिद्वंद्वियों को दबाने, धन एठने एवं बदला लेने की भावना से ऐसे फर्जी मामले बनाने की घटनाएं बढ़ती रहेगी, तब तक बलात्कार जैसी प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए मौत की सजा का प्रावधान पर्याप्त नहीं होगा।

 

निर्भया कांड के बाद बलात्कार मामलों में सजा के कड़े प्रावधान की मांग उठी थी। तब कड़ा पॉक्सो कानून बना। उसमें भी ताउम्र या मौत तक कारावास का प्रावधान है। पर उसका कोई असर नजर नहीं आया है। उसके बाद बलात्कार और पीड़िता की हत्या की दर लगातार बढ़ी है। कुछ लोगों की यह सोच है कि सख्त कानून के बन जाने से बलात्कार जैसे जघन्य अपराध करने वालों के मन में कुछ भय पैदा होगा और ऐसे अपराधों की दर में कमी आएगी, ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि यह विसंगतिपूर्ण सोच है।

 

कई विशेषज्ञ मौत की सजा को बलात्कार जैसी प्रवृत्ति पर काबू पाने के लिए पर्याप्त नहीं मानते। उनका मानना है कि चूंकि ऐसे ज्यादातर मामलों में दोषी आसपास के लोग होते हैं, इसलिए उनकी शिकायतों की दर कम हो सकती है। पहले ही ऐसे अपराधों में सजा की दर बहुत कम है।

 

इसकी बड़ी वजह मामलों की निष्पक्ष जांच न हो पाना, गवाहों को डरा-धमका या बरगला कर बयान बदलने के लिए तैयार कर लिया जाना है। यह अकारण नहीं है कि जिन मामलों में रसूख वाले लोग आरोपी होते हैं, उनमें सजा की दर लगभग न के बराबर है। लेकिन दूसरी और यह भी तथ्य देखने में आ रहा है कि देश में इस कानून के अन्तर्गत फर्जी मामले अधिक दायर हो रहे हैं। कुछ मामलों में इस कानून को आधार बनाकर राजनीतिक लाभ भी उठाने की कोशिश हो रही है।

 

उन्नाव और कठुआ मामले में भी इस तरह के स्वर सुनने को मिल रहे हैं। जब कभी हमारे अधिकारों का शोषण होता है, निर्धारित नीतियों के उल्लंघन से अन्याय होता है तो हम अदालत तक पहुंच जाते हैं। परन्तु यदि अदालत भी सही समय पर सही न्याय और अधिकार न दे सके तो फिर हम कहां जाएं? अनेक खौफनाक प्रश्न एवं आंकडे़ ऐसे पीड़ित लोगों से जुड़े हैं, इन हालातों में जिन्दगी इतनी सहम जाती है कि कानून पर से ही भरोसा डगमगाने लगता है।  

 

मूलभूत प्रश्न है कि समाज एवं शासन व्यवस्था को नियोजित करने के लिये कानून का सहारा ही क्यों लेना पड़ रहा हैं? कानूनमुक्त शासन व्यवस्था पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। भारत का मन कभी भी हिंसक नहीं रहा, लेकिन राजनीतिक स्वार्थों के लिये यहां हिंसा को जबरन रोपा जाता रहा है।

 

हमें उन धारणाओं, मान्यताओं एवं स्वार्थी-संकीर्ण सोच को बदलना होगा ताकि इनको आधार बनाकर औरों के सन्दर्भ में गलतफहमियां, संदेह एवं आशंका की दीवारें इतनी ऊंची खड़ी कर दी हैं कि स्पष्टीकरण के साथ उन्हें मिटाकर सच तक पहुंचने के सारे रास्त ही बन्द हो गये हैं। ऐसी स्थितियों में कैसे कानून को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है? कानून से ज्यादा जरूरी है व्यक्ति एवं समाज चेतना को जगाने की।

 

समाज के किसी भी हिस्से में कहीं कुछ जीवनमूल्यों के विरुद्ध होता है तो हमें यह सोचकर चुप नहीं रहना चाहिए कि हमें क्या? गलत देखकर चुप रह जाना भी अपराध है। इसलिये बुराइयों से पलायन नहीं, उनका परिष्कार करना जरूरी हैं।

 

ऐसा कहकर अपने दायित्व और कत्र्तव्य को विराम न दें कि सत्ता, समाज और साधना में तो आजकल यूं ही चलता है। चिनगारी को छोटा समझ कर दावानल की संभावना को नकार देने वाला जीवन कभी सुरक्षा नहीं पा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने एक पहल की है कि हम अपनी सोच बदलें। यह जिम्मेदारी केवल अदालतों की नहीं है।

 

पूरी सामाजिक व्यवस्था की है। तीन तलाक के बहुचर्चित प्रसंग के बाद यह बहुत संगत है कि हम अपनी उन प्रथाओं पर भी एक नजर डालें जो कालांतर में कानून बन गईं। समाज एवं राष्ट्र की व्यवस्थाओं में कानूनों के माध्यम से सुधार की बजाय व्यक्ति-सुधार एवं समाज-सुधार को बल दिया जाना चाहिए।

 

व्यक्ति की सोच को बदले बिना अपराधों पर नियंत्रण संभव नहीं है। भारतीय समाज का सांस्कृतिक चैतन्य जागृत करें। सामाजिक मर्यादाओं का भय हो, तभी कानून का भय भी होगा।

 

 

 

अॉस्ट्रेलिया के कप्तान स्मिथ और वार्नर पर एक साल का प्रतिबंध, BCCI ने दिखाया IPL से भी बाहर का रास्ता

रवि उपाध्याय/दिल्ली..बॉल टेंपरिंग विवाद में बुरे फसें आस्ट्रेलिया के कप्तान स्टीव स्मिथ और अक्रामक सलामी बल्लेबाज डेविड वार्नर दोनों पर एक साल और कैमरन बैनक्राफ्ट पर नौ महीने का प्रतिबंध लगा दिया है।

 

हालांकि इन दिग्गज आस्ट्रेलिया खिलाडियों का वर्ल्ड कप में खेलने पर कोई खतरा नहीं है।विश्व कप से पहले यह लगा प्रतिबंध समाप्त हो जायेगा।

 

आस्ट्रेलिया क्रिकेट बोर्ड के बाद अब गेंद BCCI के पाले में आ गिरी है जहां BCCI ने दोनों को IPL से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया है।

 

उल्लेखनीय है कि बॉल टेंपरिंग मामले में तीनों खिलाडियों की सजा के बाद टीम के कोच डेरेन लेहमन भी पद से इस्तीफा देने पर विचार कर रहे है।

 

अॉस्ट्रेलिया क्रिकेट बोर्ड का कहना है की टीम के लिए जीत जरूरी है लेकिन देश भावना की प्रतिष्ठा को ताक पर रखकर नहीं। इस हरकत पर देश के लोगों में भारी गुस्सा तथा निराशा है।

 

दुनियांभर में किरकिरी करा चुके इन अॉस्ट्रेलियन खिलाडियों को अपने पद से भी हाथ धोना पड़ा है।इन खिलाडियों की चौंका देने वाली हरकत से अॉस्ट्रेलिया के पीएम भी काफी नाराज नजर आ रहे है और उन्होंने कहा इस तरह की घटना निराशा पैदा करती है।

हिंदी साहित्य के शेक्सपियर हैं मुंशी प्रेमचंद

मदरसे से तालीम हासिल कर हिंदी साहित्य का सबसे बड़ा स्तम्भ बनना इतना आसान ना था, लेकिन मुंशी प्रेमचंद ने इस मिथक को तोड़ा है। 31 जुलाई तारीख़ के पन्नों में गुम-सी हो गयी है जिसके जन्मदिन पर प्रेमचंद जैसे खांटी गंवईं नामचीन साहित्यकार का कोई नामलेवा नहीं है!

 

हिंदी के सबसे बड़े यथार्थवादी लेखक मुंशी प्रेमचंद की "ईदगाह" कहानी शायद ही कोई हो जिसने ना पढ़ी हो---एक छोटा बच्चा हामिद जो दूसरे हमउम्र बच्चों की तरह खेल-खिलौनों, गुड्डे-गुड़ियों के लालच में नहीं पड़ता और अपनी दादी के लिए मेले से एक चिमटा ख़रीद कर लाता है...मगर चिमटा ही क्यों?---वो इसलिए कि रोटियां सेंकते वक़्त उसकी दादी के हाथ जल जाते थे।

 

एक छोटी-सी कहानी "ईदगाह" में प्रेमचंद ने हामिद से बड़ी-बड़ी बातें कहलवा दीं---वो बातें जो ना केवल पाठक के दिल को भेद जाती हैं बल्कि पाठक उसे अपनी आत्मा में समेट लेने को आतुर दिखता है।

 

प्रेमचंद मनुष्य के मनोविज्ञान को समझने वाले लेखक थे...देश की आज़ादी से पहले भारतीय समाज पर अंग्रेज़ों के दमन का जैसा चित्रण प्रेमचंद ने अपनी साहित्य में किया वैसा कोई दूसरा लेखक नहीं कर पाया है।

 

प्रेमचंद ने "कफ़न", "नमक का दारोग़ा", "पूस की रात", "ईदगाह", "बड़े घर की बेटी", "घासवाली" जैसी कहानियों में  और "गोदान", "ग़बन", "निर्मला", "कर्मभूमि", "सेवासदन", "कायाकल्प", "प्रतिज्ञा" जैसे उपन्यास लिखकर आम लोगों की भाषा में यथार्थ के नए प्रतिमान गढ़े।

 

फ़िरंगियों के आधिपत्य-काल के शोषण, ग्रामीणांचल के किसानों की दरिद्रता, गाँवों में व्याप्त ग़रीबी, उत्पीड़न, जहालत, अशिक्षा, भेदभाव, मज़हबी छुआछूत, वंचना, औरतों की बदहाली प्रेमचंद के शब्द पाकर जीवंत हो उठे और अंग्रेज़ों के अत्याचार का असली चेहरा प्रेमचंद द्वार रचित साहित्य के मार्फ़त आम जनमानस के सामने आ पाया।

 

दरअसल प्रेमचंद जिस तरह का साहित्य लिख रहे थे उसके पीछे उनकी ग़ुरबत और मुल्क का साम्राज्य अंग्रेज़ों के आधिपत्य में होना था...इस तरह कहा जा सकता है कि प्रेमचंद ने जो जिया वही लिखा---जिस तरह उनके दिन पैसों की तंगी में बीत रहे थे उसी तरह के पात्र उनकी कहानियों में देखने को मिल जाएंगे।

 

देश की जनता के दर्द को को अपनी लेखनी में उतारने की वजह से अंग्रेज़ हुक्मरानों को प्रेमचंद के अंदर बग़ावत की बू महसूस होने लगी थी---इसलिए प्रेमचंद नवाब राय के नाम से लिखा करते थे। अंग्रेज़ों ने नवाब राय को खोज निकाला और सज़ा के तौर पर उनकी कहानी-संग्रह "सोज़े-वतन" को उनकी आंखों के सामने जला दिया गया...इसके बाद धनपत राय नवाब राय नहीं हमेशा के लिए "प्रेमचंद" हो गए और ये नाम सुझाया था इनके क़रीबी मुंशी दया नारायण निगम ने।

 

परिवार की दरिद्रता दूर करने और इनका पालन-पोषण करने के लिए प्रेमचंद अपनी क़िस्मत आज़माने 1934 में मायानगरी मुम्बई भी पहुंचे थे लेकिन उनकी कहानियों पर बनने वाली फ़िल्मों को लेकर जनता ने उनके साथ न्याय नहीं किया।

 

प्रेमचंद के ज़िंदा रहते और उसके बाद भी जैनेंद्र, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, फणीश्वरनाथ रेणु, मोहन राकेश, यशपाल जैसे हिंदी के धुरंधर लेखक हुए लेकिन पॉपुलैरिटी और कालजयी छाप के मामले में प्रेमचंद के आगे कोई नहीं टिक पाया।

 

ये ठीक ऐसे ही है कि जैसे अंग्रेज़ी साहित्य में शेक्सपियर जैसा दूसरा बड़ा साहित्यकार पैदा नहीं हुआ वैसे ही प्रेमचंद जिस क़द के लेखक थे वैसा लेखक हिंदी साहित्य में शायद दोबारा जन्म न ले पाए! प्रेमचंद ने जिन समस्याओं और विसंगतियों पर कहानी और उपन्यास लिखे वो परेशानियां और विसंगतियां आज भी जस की तस मौजूद हैं; पर प्रेमचंद की तरह धारदार तरीक़े से क़लम चलाने वाला आज के दौर में कोई लेखक है ही नहीं!

 

...या यूँ कहा जाए कि आज के दौर की समस्याएं प्रेमचंद के ज़माने से भी ज़्यादा जटिल और भयावह हैं लेकिन इसे शब्दों में उतारने वाला कोई साहित्यकार मौजूद नहीं है क्योंकि हिंदी भाषा में आज का कथालेखन तो एक विशेष विचार को आगे बढ़ाने के लिए हो रहा है...आज के दौर का हिंदी-साहित्य सत्ता की स्तुति-गान तक महदूद होकर रह गया है।

 

आज जब साहित्यकार का जुड़ाव समाज से होना चाहिए तो वो सत्ता के गलियारों में भ्रमण करता मिल जाएगा, आज का लेखक अपनी परंपराओं से कटकर वर्तमान और भविष्य की बाट जोह ही नहीं पा रहा है। आज का लेखक समाज के गूढ़तम रहस्यों का पर्दाफ़ाश कर अपनी अंतरात्मा की आवाज़ का प्रसार करने की बजाय अपनी लेखनी का प्रचार-प्रसार करने की उधेड़बुन में रहता है---ऐसे आलम में एक 'महान साहित्य' की कल्पना करना बेईमानी-सा जान पड़ता है।

 

देश की आज़ादी के बाद हिंदी साहित्य में श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास "रागदरबारी", निर्मल वर्मा के उपन्यास "वे दिन", मन्नू भंडारी के उपन्यास "महाभोज" और "आपका बंटी" ख़ूब चर्चित रहा था। अभी हालिया सालों में कमलेश्वर के "कितने पाकिस्तान" और निर्मल वर्मा के "अंतिम अरण्य", कृष्णा सोबती के "समय सरगम" जैसी कृतियों की जमकर तारीफ़ हुई। इधर सबसे ज़्यादा चर्चा में रही विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास "दीवार में खिड़की रहती थी" और अलका सरावगी के उपन्यास "कलिकथा वाया बाईपास" रही। इसके बावजूद ये रचनाएं मानव मन के अंतस्थल में प्रवेश करने में नाकाम रहीं क्योंकि प्रेमचंद की तरह समाज का सटीक विश्लेषण और मनुष्य के हृदय के गूढ़तम रहस्यों को टटोलने में ये लेखक असमर्थ रहे हैं। इसीलिए ग़ैर हिंदी भाषियों के लिए हिंदी साहित्य का मतलब आज भी प्रेमचंद ही है।

 

एक वजह और है कि आज का हिंदी लेखक समाज के आख़िरी पायदान पर खड़े शख़्स से कनेक्ट नहीं कर पा रहा है क्योंकि आज का भारतीय समाज चेतन भगत को तो चाव से पढ़ता है लेकिन जहां उसे समाज की नग्न सच्चाई से दो-चार होना पड़ता है तो वो किनाराकशी अख़्तियार करने लगता है क्योंकि आज के दौर का मनुष्य साहित्य में मनोरंजन चाहता है, चटखारा चाहता है---जो हिंदी साहित्य में उसे मिल नहीं पाता है।

 

आज हिंदी साहित्य का रुझान शहरी मध्यवर्ग की तरफ़ एकांगी हो चला है जिसमें उनकी ही बातें, उनकी ही पीड़ा, उनकी ही जीवन-शैली, उनका ही समाज केंद्रित होकर रह गया है, आज के साहित्य में किसानों, मज़दूरों, दलितों-शोषितों पर लिखने वाले को पिछड़ा हुआ लेखक माना जाता है...इसलिए इस विधा पर कोई क़लम चलाना नहीं चाहता और उनकी सोच भी ग्रामीणांचल की बयार से हटकर बहती है जहां भौतिकतावाद का दुर्गंध बसता है!

 

आज हिंदी साहित्य की कोख प्रेमचंद के बिना सूनी नज़र आ रही है...आज हिंदी साहित्य को एक प्रेमचंद चाहिए जो भूमंडलीकरण और बाज़ारीकरण के इस दौर में भारतीय समाज में आये बदलाव को रेखांकित कर सके, भारतीय समाज में आये बदलाव और स्थायी समस्याओं पर एक कालजयी कृति का सृजन कर सके और समाज की स्थायी समस्याओं के द्वंद्व को शब्दों की लड़ियों में पिरोकर मानव मन की छटपटाहट को एक नया आयाम दे सके!

 

बुझे दिए से लाखों चिराग जलाने की ठान ली .....

मनोज श्रीवास्तव /लखनऊ। सात वर्ष पहले सड़क दुर्घटना में एकलौते पुत्र को खो देने वाले आशुतोष सोती को तोड़ दिया लेकिन सोती ने थोड़ा सा नजरिया क्या बदला जो उनके गम को दम में बदल दिया।अब वह हर वर्ष सड़क दुर्घटना से हजारों बच्चों की जिंदगी बचाते हैं। बच्चों को सड़क दुर्घटना में बचाने के लिए सोती प्रति वर्ष जुलाई माह और इस बार राजधानी में बच्चों को यातायात नियमों के प्रति जागरूक करते हुए बच्चों से प्रतिज्ञा कराते हैं कि यातायात नियमों का उलंघन नहीं करेंगे।

 

सोती फॉउंडेशन वर्ष भर स्कूलों, कॉरपोरेट ऑफिसों और शहर प्रमुख स्थानों पर संगोष्ठी ,नाटक-नुक्कड़, वाद -विवाद प्रतियोगिया, हेलमेट बाँट कर बच्चों और उनके अभिभावकों को सुरक्षित यातायात करने के लिए जागरूक करता हैं। इस बार फाउंडेशन के अध्यक्ष आशुतोष सोती ने लखनऊ के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को यातायात सुरक्षा की शपथ दिलाई और अभिभावकों से कम उम्र के बच्चों को गाड़ी न चलाने देने की प्रतिज्ञा करवाई।

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जिला विद्यालय निरीक्षक डॉ. मुकेश कुमार सिंह ने विद्यार्थी से पूरी सतर्कता के साथ वाहन चलाने का आह्वाहन किया, उन्होंने कहा बच्चों कभी भी ड्राइविंग करते समय मोबाइल फोन पर बात न करें। आशुतोष ने बताया कि 15 जुलाई 2010 में इंटर में पढ़ रहे उनके बेटे शुभम सोती की जान ऐसे ही गई थी। आज उसकी सातवीं पुण्यतिथि है मैं चाहता हूँ कि थोड़ी सी लापरवाही के कारण किसी अभिभावक को अपना बच्चा न खोना पड़े। उन्होंने कहा कि अगर यातायात नियमों का पालन कर लोग वाहन चलाएं तो सड़क हादसों में कमी आएगी। कार्यक्रम में रामाधीन सिंह इंटर कॉलेज के प्राचार्य डॉ. शिव कुमार यादव ने कहा कि विद्यार्थियों को आसपास के लोगों को भी सुरक्षित वाहन चलाने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

कब तक रहेगी शर्म जारी... मासिक धर्म पर जागरूकता के लिए वर्कशॉप

जागो गॉव (NGO ) आधी आबादी के ख़ामोशी को तोड़ने के लिए ,उस पर खुल कर चर्चा हो ,28 MAY 2017 को JAGO GAON ITI COLLEGE दामोदरपुर,बेगूसराय में मे Menstrual hygine management पर वर्कशॉप आयोजित की है I जिसमे पंचायत भर से इस छेत्र से जुड़ी महिलाएं अपना अनुभव रखा।

 

मासिक धर्म और उससे जुड़ी बातों को समाज का रवैया नितांत रूढ़िवादी है , जिसका कारण महिलाओं के जीवन की एक सामान्य क्रिया ,शर्म,लज्जा एवं चुप्पी का विषय बनकर रह गयी है ! इसी सन्दर्व मे जागो गॉव बिहार के बेगूसराय के घर -घर जाकर ,स्कूल ,कॉलेज ,खेत -खलियान ,मंदिर एवं स्वयं सहायता समूह की बैठक बुलाकर माहवारी सम्वन्धी बातो पर खुल कर चर्चा करती है I

 

I आशा जो 10वी का छात्रा बताती है हमारे स्कूल मे शौचालय नहीं है ,जब कभी माहवारी का समय आता है उस समय स्कूल नहीं जाती ,लगभग महीने मे 6 दिन अनुपस्थित रहना परता है I क्योकि मासिक का निश्चित तारीख नहीं है I जागो गॉव के case study के तहत प्रत्येक छात्रा को 40 दिन अनुपस्थित रहती है प्रतिवर्ष Iकार्यक्रम में महिलाओं और पुरुषों के साथ बच्चों की सहभागिता खास रही लेकिन इससे भी अधिक ख़ास था माता पिता के साथ बच्चों का कार्यक्रम और वक्ताओं के बारे में बातचीत करना. ये अपने आप में एक बहुत सकारात्मक बदलाव दिखा कि अभिभावक बच्चों को लाये और उनके साथ माहवारी के विषय पर बात करने में सहज दिखे. कई बच्चियां अपनी माँओं के साथ आई हुई थी उन्होंने पूरे समय तक रूककर वक्ताओं के विचारों को सुने . अगर आज की पीढ़ी इन विचारों को सुनेगी और समझेगी तो उम्मीद की किरण कायम रहेगी ..

 

इस कार्यशाला में लाने के लिए उनके अभिभावकों को साधुवाद देना ही होगा .. यहाँ लाने का निर्णय उनकी खुली मानसिकता को दर्शाती है .स्पष्ट हैं कि वे अपने बच्चों से इस विषय पर बात करते होंगे और इस कार्यशाला के माध्यम से वे उनकी समझ और मानसिकता को और परिपक्व बनाना चाहते हैं | इस कार्यशाला के माध्यम से माहवारी जैसे महत्वपूर्ण विषय पर सारगर्भित विचार सामने आये | आगे आने वाले समय में इस तरह की कार्यशालाओं से इस मुद्दे पर एक सकरात्मक माहौल अवश्य बनेगा।

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समाज का खेल अजब है " रसोई नहीं जा सकती ,मंदिर मे जाना मना है I पूजा नहीं कर सकती ,यहाँ तक की दूसरों के साथ खेत जाना जरूरी है I महिलाओ को स्वास्थ्य को लेकर अमूमन यही ख़ामोशी है I माहवारी के कपड़े को धुप मे नहीं सुखाना है ठीक से धूप में ना सुखाए गए हल्के गीले अंडरगार्मेंट्स को पहनने से फंगल इंफ़ेक्शन का ख़तरा बढ़ जाता है जो भारतीय महिलाओं में आम सी बात मानी जाती है

जागो गॉव ने हालिया अध्ययन में पाया कि 75 फ़ीसदी महिलाएं अब भी पैड किसी भूरे लिफ़ाफ़े या काली पॉलीथीन में लपेटकर ख़रीदती हैं.।

 

अनुसंधान क्षेत्र से जुड़े संगठन एसी नेलसन के ये आंकड़े भारत के लिए शर्मनाक हैं. सिंगापुर और जापान में जहां 100 फ़ीसदी, इंडोनेशिया में 88 फ़ीसदी और चीन में 64 फ़ीसदी महिलाओं को ये सुविधा प्राप्त है वहीं भारत में केवल 12 फ़ीसदी महिलाएं ही माहवारी के दौरान साफ-सुथरे नैपकिन का इस्तेमाल करने में सक्षम हैं I

 

जागो गॉव ने दामोदरपुर गॉव के case study मे पाया की ग्रामीण स्तर पर 1 फीसदी है I ग्रामीण इलाकों में माहवारी के दौरान महिलाएं आज भी घर के सबसे गंदे कपड़े, टाट-पट्टी यहां तक की रेत और राख का इस्तेमाल केर रही है कई जगह पर इन विषयों पर बातचीत वर्जित है और शर्म का कारण हमारे समाज का।

 

 

सीता देवी ने कहा कि जिस माहवारी के रक्त से पुरुष घिन करते हैं उनका जीवन माहवारी के इसी रक्त पर आधारित होता है| हैरत की बात है कि आज के समय में भी इसके साथ सामाजिक कलंक और अज्ञानता जुड़ी है. इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर चुप्पी तोड़ना तथा इनकी ओर समाज का ध्यान आकर्षित करना इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य था. डॉक्टर गुंजन ने चित्रों के द्वारा समझाया ,आनंद कुमार और शिक्षक गोपाल जी और कई ग्रामीण महिलाओ ने शिरकत की ,माहवारी पर चुप्पी तोड़ने की बात कही।

Mountain dew के बोतल में मिला घोंघा, अब न कहना "डर के आगे जीत है"

सोनभद्र। किसी भी बड़ी कम्पनी की पहचान उसकी शुद्धता ही होती है लेकिन कुछ समय से विश्वस्तरीय कम्पनियों द्वारा निर्मित खाद्य व पेय पदार्थों की शुद्धता के साथ स्वास्थ्य के लिए भी नुकसान है  ऐसे में सवालिया निशान उठना लाजिमी है। ऐसा ही एक मामला सोनभद्र के रामगढ़ बाजार में सामने आया जहाँ एक छोटे होटल पर बिक्री के लिए रखे गए माउंटेन डिव में स्नेल (घोंघा) मिलने से दुकानदार अचंभित रह गया। जिससे मौके पर मौजूद ग्रहको ने कम्पनी की शुद्धता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया तो वही खाद्य सुरक्षा एवं औषधि विभाग एक टीम गठित करके जाँच करने का आदेश दिया और घेंघा पाए गए माउंटेन डिव की लेब्रोटरी जाँच रिपोर्ट आने के बाद कम्पनी पर कार्यवाही की बात कही। साथ ही नकली तरीके से रिफलिंग होने की आशंका जताई है।

 

दुकानदार का कहना है कि मै रामगढ बाजार के पेप्सी एजेन्सी से 1 पेटी Mountain Dew  व 1 पेटी pepsi लिया । दुकान पर ग्राहक को Dew की बोतल देने पर उसमे से आवाज आने लगा तो देखा की उसके अन्दर sneal घोंघा दिखाई दे रहा था ।

 

मैने पेप्सी एजेन्सी से शिकायत किया तो वह ऊपर के अधिकारी से बात कर बोतल माँगने लगा । मैने नही दिया । वही दुकान पर कोल्ड्रिंक Dew पीने आये ग्राहक ने जब दुकानदार से Dew माँगा तो देखा उसके अन्दर घोंघा snail था । ग्राहक का कहना है के पेय पदार्थ बनाने वाली कम्पनीया लोगो के स्वस्थ से खिलवाड कर रही है । इन कम्पनियों के ऊपर राष्ट्रद्रोह का मुकद्दमा करना चाहिए । इसकी जानकारी जब जिला अभिहित अधिकारी मानिक चन्द्र को हुयी तो उन्होने ने मामले को गम्भीरता से लेते हुए टीम गठित कर जाँच करने की बात कही ।

योगीराज में सरकारी स्कूल के छात्रों को मिलेगा "खा़की" से छुटकारा

लखनऊ। जल्द ही यूपी के सरकारी स्कूल के बच्चों को नया ड्रेस कोड जारी किया जाएगा। बच्चों को अपनी हवलदार के जैसे दिखने वाले ड्रेस कोड से छुटकारा मिल जाएगा। 75 जिलों के 1 लाख प्राइमरी और 45,000 सेकेंडरी स्कूलों के 1.85 करोड़ छात्रों की स्कूलों में चलने वाले इस ड्रेस के रंग से नाखुश थी। स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस ड्रेस को बदलवाना चाह रहे थे। उनका मानना था कि ये रंग होमगार्ड की ड्रेस से मिलता-जुलता है।गौरतलब है कि यूपी सरकार बच्चों की यूनिफॉर्म मुफ्त में देती है। माना जा रहा है कि अब इसका रंग बदल जाएगा।

 

सपा सरकार ने यूपी में शासन के दौरान 2012 में पुराने यूनिफॉर्म कोड नेवी ब्लू शॉर्ट्स/ट्राउजर और लड़कियों के लिए नेवी ब्लू स्कर्ट के साथ स्काई ब्लू शर्ट  को बदलकर खाकी रंग में नई यूनिफॉर्म जारी की थी।

 

अब खाकी कलर की पैन्ट शर्ट या सलवार सूट की जगह भूरे रंग का फुल ट्राउजर व स्कर्ट और गुलाबी रंग की चेक पैटर्न में भूरे रंग की कॉलर वाली शर्ट दी जाएगी।जबकि मिडिल स्कूलों में छात्राओं की यूनिफॉर्म अब काली सलवार के साथ गुलाबी चेक पैटर्न वाला कुर्ता और काला दुपट्टा होगी। इसके लिए बेसिक शिक्षा परिषद को सैंपल दिया गया है और फाइनल आदेश आने में अभी वक्त लगेगा।

 

इस पर बेसिक शिक्षा परिषद के एडिशनल डायरेक्टर महेंद्र सिंह राणा बताते हैं, ‘अभी केवल शासन की तरफ से हमें सैंपल दिए गए हैं, आदेश आने में तीन-चार दिन का वक्त लग सकता है। नई यूनिफॉर्म में भूरे रंग के ट्राउजर व स्कर्ट के साथ गुलाबी रंग की चेक पैटर्न वाली शर्ट है। हालांकि हमने अपनी तरफ से लखनऊ मंडल के स्कूलों में क्रय समिति के गठन और बच्चों की नाप लिए जाने का आदेश दे दिया है।’

मजदूर दिवस के पीछे छुपा इतिहास आखिर इस वजह से मनाया जाता है मजदूर दिवस

विशेष: दुनिया को अपने हाथों बनाने, खून और पसीना सजाने वाले मजदूरों के अधिकारों की जागरूकत के रूप में लेबर डे और मजदूर दिवस मनाया जाता है। कामगारों के लिए मजदूर दिवस एक बड़ी उपलब्धि के रूप में मनाया जाता है। मजदूर दिवस को इंटरनेशनल मई दिवस के रूप में भी जाना जाता है।

एक बात समझ नहीं आती, मजदूर को ‘मजदूर’ क्यों कहते हैं? क्या कोई और नाम नहीं हो सकता। ये शब्द कुछ-कुछ ‘मजबूर’ जैसा लगता है लेकिन मजदूर का काम इस शब्द से बिलकुल अलग है। मुश्किल है दुनिया के कोई भी प्रोफेश्नल इनका काम कर पाए और इनके जैसा बन पाए।

दुनिया में कितने ही मजदूर है जो मजदूरी करके अपना जीवन यापन करते हैं। ये मजदूर काफी कम मजदूरी में काफी बड़ा काम कर जाते हैं जो शायद हमारे बस का नहीं होता। इनका मकसद सिर्फ अपना और अपने परिवार का पेट भरना होता है इन्हीं मजदूरों के लिए साल भर में एक दिन होता हैं ‘मजदूर दिवस’।

 

मजदूर दिवस मई महीने की पहली तारीख को मनाया जाता है। आमतौर पर कई देशों में कई कंपनियों में मजदूरों को इस दिन छुट्टी दी जाती है।

 

मजदूर दिवस का इतिहास

 

मजदूर दिवस मनाने के पीछे भी एक दर्दनाक कहानी छुपी है। अंतराष्‍ट्रीय तौर पर मजदूर दिवस मनाने की शुरुआत 1 मई 1886 को हुई थी। दरअसल 1886 में अमेरिका में जब मजदूर संगठनों द्वारा एक शिफ्ट में काम करने की सीमा अधिकतम 8 घंटे करने की मांग की तो सरकार मानी नहीं। अमेरिका के मजदूर संघों ने मिलकर निश्‍चय किया कि वे 8 घंटे से ज्‍यादा काम नहीं करेंगे।


जिसके लिए संगठनों ने हड़ताल की, इस हड़ताल के दौरान शिकागो की हेमार्केट में बम ब्लास्ट हुआ। जिससे निपटने के लिए पुलिस ने मजदूरों पर गोली चला दी जिसमें कई मजदूरों की मौत हो गई और 100 से ज्‍यादा लोग घायल हो गए। इसके बाद 1889 में अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में ऐलान किया गया कि हेमार्केट नरसंघार में मारे गये निर्दोष लोगों की याद में 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाएगा और इस दिन सभी कामगारों और श्रमिकों का अवकाश रहेगा।

एक ख़त सैनिकों के नाम ! जाँबाज़ सैनिकों के लिए सोचना होगा...

संजय मेहता: परिवार से दूर।  बच्चों से दूर । पत्नी से दूर । मां से दूर । हर वक्त मौत के साए में जिंदगी गुजारते हमारे सैनिक । शहीद हो गए। शहीदी के बाद। फूल , माला , निंदा , वायदे । संवेदना के कुछ शब्द। बहूत कुछ। फिर वही बात। सब बक्से में बंद। उनको भूला देना।



हम आजादी का आनंद लेते हैं। हम क्या करते हैं उनके लिए ? कुछ नहीं। समाज, सियासत क्या देता है? सम्मान भी नहीं देता। अच्छा खाना भी नहीं देता। खाना मांगने पर बर्खास्तगी मिलती है। क्या यह शर्मनाक नहीं है ? आश्चर्यजनक नहीं है ? बिल्कुल है। फिर हम चुप क्यों हैं?

 

शहादत के बाद भी सियासत। तुष्टिकरण का रंग। स्वार्थ। आज हमारे सैनिक शांत हैं। उनके सम्मान को चोट पहूंचायी गयी। बार-बार, लगातार। अब गुस्सा पनप रहा है। अंदर ही अंदर। सैनिक की शहादत समर्पण है। मुल्क के प्रति। राजनीति उसकी कीमत लगाती है। सुन लो नेताओं। तुम्हारी औकात नहीं। शहादत की कीमत लगाने की।

 

आखिर  सैनिकों  की कुर्बानी कब तक? जो पत्नी विधवा बनी उसका जिम्मेवार कौन? अनाथ हुए बच्चों का जिम्मेदार कौन? क्या आपकी संवेदना सजा देगी। उन घरों को फिर से? क्या आपके अनुदान से बच्चे के चेहरे पर हंसी आ जाएगी? क्या बुजुर्ग माँ बाप का सहारा आप ला सकते हैं? नहीं।

 

बहूत तकलीफ हो रही है। खून ख़ौल रहा है। रोकिए इस हालात को। कभी सेना के कैम्प पर हमला। उग्रवादियों का हमला। दुश्मन मुल्क का हमला। हर जगह जवान मारे गए। तेरी ये राजनीति किस दिन के लिए है? तेरी नीति किस दिन के लिए है? तेरी योजना किस दिन के लिए है? अब तो हद हो गयी। विधवा बनने का सिलसिला रुक ही नहीं रहा । बर्दाश्त नहीं हो रहा। अब बस।

 

अब हमें सोचना होगा। आपको सोचना होगा। सबको सोचना होगा। शहादत का कर्ज उतारना होगा। हम नागरिक सैनिकों को सम्मान दें। इस सियासत को सबक सिखाएं । शहादत पर राजनीति न होने दें।  सैनिकों को गुमनामी में न खोने दें। आइये संकल्पित हो। अपने देश के लिए। अपने तिरंगे के लिए। अपने जाँबाज़ सैनिकों के लिए।

 

जय हिन्द।

 

क्या कर्ज माफी ही है किसानों की समस्या का अंतिम हल ?

सौरभ शुक्ल- किसानों की कर्ज माफी का फैसला बिल्कुल दिल से लिया गया फैसला है। ठीक उसी तरह जैसे एक कट्टर धार्मिक व्यक्ति मन्नत पूरी होने पर 5 किलो फुल क्रीम दूध मंदिर के भीतर शिव लिंग पर चढ़ाता है और उसी मंदिर के बाहर भिखारन की गोद में बच्चा भूख से बिलखता रहता है।

 

योगी आदित्यनाथ ने और उनकी सरकार ने चुनाव जीतने की मन्नत पूरी होने के एवज में किसान जनता जनार्दन पर ३६,३ ५९ करोड़ रुपए का प्रसाद चढ़ाया है।

 

धर्म और वचनबद्धता के लिहाज से तो ये फैसला ठीक है लेकिन तर्क के आधार पर इस रकम की एक एक पाई बर्बादी की तरफ जाती ही दिख रही है। वजह ये कि आज तो किसान का कर्ज माफ हो गया है। लेकिन उस वजह पर कोई वार नहीं हुआ सरकार की तरफ से जिसके चलते किसान कल फिर कर्ज लेगा। किसानों पर कर्जा एक कैंसर की तरह फैल गया है और ये माफी सिर्फ़ ब्रूफेन की 'गोली' की तरह है जिसको खाने से दर्द कम होने के साथ साथ खतरे भी कई हो जाते हैं।

 

आज दिन भर मैं किसानों के बीच रहा, उनकी आप बीती सुनी। ये जाना कि आख़िर किसान कर्ज के बोझ तले दबा क्यों रहता है? उनका दुख, दर्द सब दिन भर सुनता और बांटता रहा। उन्हीं की कुछ बातें शब्दों में पिरोकर आपको बता रहा हूं।

 

किसी ने कहा आलू की लागत ४-५ रुपए किलो आती है और फसल पैदा होने के बाद उसे १-१.५ रुपए किलो बेचते हैं। प्याज़ खेत से ५० पैसे किलो बिकता है। गेहूं २०-२० रुपए किलो लागत से पैदा होता है लेकिन  सरकार १६.२५ रुपए किलो से ज्यादा देने को तैयार नहीं है।

 

सरकार को डर है कि अगर दाम बढ़ा दिए गए तो देश में महंगाई बढ़ जाएगी। किसान की दलील है कि जबतक लागत के बराबर या उससे ज्यादा पैसा नहीं मिलेगा खेती में किसान हमेशा कर्जदार रहेगा। एक कर्ज माफ होगा तो वो दूसरा लेगा, उसे चुकाने के लिए तीसरा कर्ज और इसी तरह कर्ज की ऊंची सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते थक कर छलांग लगा लेगा, आत्महत्या कर लेगा।

 

किसानों को ये भी डर सता रहा है कि अब तमाम बैंकिंग सिस्टम के माफिया कर्ज माफ़ी की इस एक्सरसाइज के दौरान उनसे वसूली भी करेंगे। बैंक के अधिकारी नोड्यूज सर्टिफिकेट देने के लिए घूस मांगेंगे और तमाम दलाल कर्ज माफ कराने वाली स्कीम में शामिल कराने के नाम पर पैसे ऐठेंगे।

 

सबसे बड़ी और अहम बात एक ८५ साल के बुजुर्ग किसान ने कही जिसने अपनी हड्डियां खेतों में ही गला दीं, "इनसे न हो पाएगा, किसानों की हालत कोई नेता नहीं सुधार पाया तो ये क्या कर पाएंगे।"

 

बात सही भी है। सरकारों ने आज़ादी से आजतक बहुत किया लेकिन कश्मीर से कन्याकुमारी तक या फिर अटक से लेकर कटक तक किसान हर मौसम में कुछ ना कुछ तबाही झेलता है। अगर पैदावार ज्यादा अच्छी हुई तो वो भी डिमांड सप्लाई समीकरण के हिसाब से दाम गिरा देती है।

 

ऐसे में सरकार को चाहिए था कि इस रकम से कुछ ऐसे कदम उठाए जाते जो न सिर्फ चुनावी वादा पूरे करते बल्कि किसानों की माली हालत को बेहतर बनाने की राह में मील का पत्थर साबित होते।

 

वैसे बता दूं शिवलिंग पर दूध चढ़ाना कतई गुनाह नहीं है और सावन में शिवलिंग पर दूध चढ़ाए जाने के वैज्ञानिक साक्ष्य भी मौजूद है। लेकिन धर्म एक "बाई-पास" ये भी देता है कि दूध के पैकेट/बर्तन को शिवलिंग पर स्पर्श कराकर बाहर गरीब को बांट दिया जाए।

 

योगी सरकार को भी कुछ ऐसा फैसला लेना चाहिए था ताकि जनता की ये गाढ़ी कमाई किसानों को भीतर से मजबूत करने में खर्च होती और लंबे समय तक अपना असर छोड़ सकती।

 

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