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updated 4:36 PM UTC, Apr 30, 2017
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एक ख़त सैनिकों के नाम ! जाँबाज़ सैनिकों के लिए सोचना होगा...

संजय मेहता: परिवार से दूर।  बच्चों से दूर । पत्नी से दूर । मां से दूर । हर वक्त मौत के साए में जिंदगी गुजारते हमारे सैनिक । शहीद हो गए। शहीदी के बाद। फूल , माला , निंदा , वायदे । संवेदना के कुछ शब्द। बहूत कुछ। फिर वही बात। सब बक्से में बंद। उनको भूला देना।



हम आजादी का आनंद लेते हैं। हम क्या करते हैं उनके लिए ? कुछ नहीं। समाज, सियासत क्या देता है? सम्मान भी नहीं देता। अच्छा खाना भी नहीं देता। खाना मांगने पर बर्खास्तगी मिलती है। क्या यह शर्मनाक नहीं है ? आश्चर्यजनक नहीं है ? बिल्कुल है। फिर हम चुप क्यों हैं?

 

शहादत के बाद भी सियासत। तुष्टिकरण का रंग। स्वार्थ। आज हमारे सैनिक शांत हैं। उनके सम्मान को चोट पहूंचायी गयी। बार-बार, लगातार। अब गुस्सा पनप रहा है। अंदर ही अंदर। सैनिक की शहादत समर्पण है। मुल्क के प्रति। राजनीति उसकी कीमत लगाती है। सुन लो नेताओं। तुम्हारी औकात नहीं। शहादत की कीमत लगाने की।

 

आखिर  सैनिकों  की कुर्बानी कब तक? जो पत्नी विधवा बनी उसका जिम्मेवार कौन? अनाथ हुए बच्चों का जिम्मेदार कौन? क्या आपकी संवेदना सजा देगी। उन घरों को फिर से? क्या आपके अनुदान से बच्चे के चेहरे पर हंसी आ जाएगी? क्या बुजुर्ग माँ बाप का सहारा आप ला सकते हैं? नहीं।

 

बहूत तकलीफ हो रही है। खून ख़ौल रहा है। रोकिए इस हालात को। कभी सेना के कैम्प पर हमला। उग्रवादियों का हमला। दुश्मन मुल्क का हमला। हर जगह जवान मारे गए। तेरी ये राजनीति किस दिन के लिए है? तेरी नीति किस दिन के लिए है? तेरी योजना किस दिन के लिए है? अब तो हद हो गयी। विधवा बनने का सिलसिला रुक ही नहीं रहा । बर्दाश्त नहीं हो रहा। अब बस।

 

अब हमें सोचना होगा। आपको सोचना होगा। सबको सोचना होगा। शहादत का कर्ज उतारना होगा। हम नागरिक सैनिकों को सम्मान दें। इस सियासत को सबक सिखाएं । शहादत पर राजनीति न होने दें।  सैनिकों को गुमनामी में न खोने दें। आइये संकल्पित हो। अपने देश के लिए। अपने तिरंगे के लिए। अपने जाँबाज़ सैनिकों के लिए।

 

जय हिन्द।

 

क्या कर्ज माफी ही है किसानों की समस्या का अंतिम हल ?

सौरभ शुक्ल- किसानों की कर्ज माफी का फैसला बिल्कुल दिल से लिया गया फैसला है। ठीक उसी तरह जैसे एक कट्टर धार्मिक व्यक्ति मन्नत पूरी होने पर 5 किलो फुल क्रीम दूध मंदिर के भीतर शिव लिंग पर चढ़ाता है और उसी मंदिर के बाहर भिखारन की गोद में बच्चा भूख से बिलखता रहता है।

 

योगी आदित्यनाथ ने और उनकी सरकार ने चुनाव जीतने की मन्नत पूरी होने के एवज में किसान जनता जनार्दन पर ३६,३ ५९ करोड़ रुपए का प्रसाद चढ़ाया है।

 

धर्म और वचनबद्धता के लिहाज से तो ये फैसला ठीक है लेकिन तर्क के आधार पर इस रकम की एक एक पाई बर्बादी की तरफ जाती ही दिख रही है। वजह ये कि आज तो किसान का कर्ज माफ हो गया है। लेकिन उस वजह पर कोई वार नहीं हुआ सरकार की तरफ से जिसके चलते किसान कल फिर कर्ज लेगा। किसानों पर कर्जा एक कैंसर की तरह फैल गया है और ये माफी सिर्फ़ ब्रूफेन की 'गोली' की तरह है जिसको खाने से दर्द कम होने के साथ साथ खतरे भी कई हो जाते हैं।

 

आज दिन भर मैं किसानों के बीच रहा, उनकी आप बीती सुनी। ये जाना कि आख़िर किसान कर्ज के बोझ तले दबा क्यों रहता है? उनका दुख, दर्द सब दिन भर सुनता और बांटता रहा। उन्हीं की कुछ बातें शब्दों में पिरोकर आपको बता रहा हूं।

 

किसी ने कहा आलू की लागत ४-५ रुपए किलो आती है और फसल पैदा होने के बाद उसे १-१.५ रुपए किलो बेचते हैं। प्याज़ खेत से ५० पैसे किलो बिकता है। गेहूं २०-२० रुपए किलो लागत से पैदा होता है लेकिन  सरकार १६.२५ रुपए किलो से ज्यादा देने को तैयार नहीं है।

 

सरकार को डर है कि अगर दाम बढ़ा दिए गए तो देश में महंगाई बढ़ जाएगी। किसान की दलील है कि जबतक लागत के बराबर या उससे ज्यादा पैसा नहीं मिलेगा खेती में किसान हमेशा कर्जदार रहेगा। एक कर्ज माफ होगा तो वो दूसरा लेगा, उसे चुकाने के लिए तीसरा कर्ज और इसी तरह कर्ज की ऊंची सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते थक कर छलांग लगा लेगा, आत्महत्या कर लेगा।

 

किसानों को ये भी डर सता रहा है कि अब तमाम बैंकिंग सिस्टम के माफिया कर्ज माफ़ी की इस एक्सरसाइज के दौरान उनसे वसूली भी करेंगे। बैंक के अधिकारी नोड्यूज सर्टिफिकेट देने के लिए घूस मांगेंगे और तमाम दलाल कर्ज माफ कराने वाली स्कीम में शामिल कराने के नाम पर पैसे ऐठेंगे।

 

सबसे बड़ी और अहम बात एक ८५ साल के बुजुर्ग किसान ने कही जिसने अपनी हड्डियां खेतों में ही गला दीं, "इनसे न हो पाएगा, किसानों की हालत कोई नेता नहीं सुधार पाया तो ये क्या कर पाएंगे।"

 

बात सही भी है। सरकारों ने आज़ादी से आजतक बहुत किया लेकिन कश्मीर से कन्याकुमारी तक या फिर अटक से लेकर कटक तक किसान हर मौसम में कुछ ना कुछ तबाही झेलता है। अगर पैदावार ज्यादा अच्छी हुई तो वो भी डिमांड सप्लाई समीकरण के हिसाब से दाम गिरा देती है।

 

ऐसे में सरकार को चाहिए था कि इस रकम से कुछ ऐसे कदम उठाए जाते जो न सिर्फ चुनावी वादा पूरे करते बल्कि किसानों की माली हालत को बेहतर बनाने की राह में मील का पत्थर साबित होते।

 

वैसे बता दूं शिवलिंग पर दूध चढ़ाना कतई गुनाह नहीं है और सावन में शिवलिंग पर दूध चढ़ाए जाने के वैज्ञानिक साक्ष्य भी मौजूद है। लेकिन धर्म एक "बाई-पास" ये भी देता है कि दूध के पैकेट/बर्तन को शिवलिंग पर स्पर्श कराकर बाहर गरीब को बांट दिया जाए।

 

योगी सरकार को भी कुछ ऐसा फैसला लेना चाहिए था ताकि जनता की ये गाढ़ी कमाई किसानों को भीतर से मजबूत करने में खर्च होती और लंबे समय तक अपना असर छोड़ सकती।

 

देश की सीमाओं पर मोदी सरकार बनाएगी भारतमाला

दिल्ली
अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वर्णिम चतुर्भुज बनाने का कदम बढ़ाया था। नरेंद्र मोदी भारतमाला बनाना चाहते हैं। भारतमाला मोदी सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना का नाम है। इसके तहत भारत के पूरब से पश्चिम तक यानी मिजोरम से गुजरात तक सीमावर्ती इलाकों में सड़क बनाई जाएगी। इस पर करीब 14,000 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इस सड़क को महाराष्ट्र से पश्चिम बंगाल तक तटीय राज्यों में एक रोड नेटवर्क से जोड़ा जाएगा।

केंद्रीय सड़क सचिव विजय छिब्बर ने ईटी को बताया, 'हमारी योजना अपनी सीमाओं, खासतौर से उत्तरी सीमाओं पर सड़कें बनाने की है। हमने इसे भारतमाला नाम दिया है।' छिब्बर ने बताया कि सभी जरूरी मंजूरियां मिल जाने पर इस साल काम शुरू हो सकता है।

मोदी का इस प्रोजेक्ट पर खास जोर है, लिहाजा मिनिस्ट्री को उम्मीद है कि अगले कुछ महीनों में एक विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार कर ली जाएगी। अधिकारियों ने बताया कि सरकार को पूरब से पश्चिम तक भारत की पूरी सीमा को कवर करने के लिए लगभग 5,300 किमी़ की नई सड़कें बनानी होंगी और इस पर 12,000-14,000 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। सरकार को पांच साल में यह प्रोजेक्ट पूरा करने की उम्मीद है।


प्रोजेक्ट पर काम गुजरात और राजस्थान से शुरू होगा। फिर पंजाब और जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड का नंबर आएगा। इसके बाद उत्तर प्रदेश और बिहार के तराई क्षेत्र में काम पूरा करने के बाद सिक्किम, असम, अरुणाचल प्रदेश से होते हुए मणिपुर और मिजोरम में भारत-म्यांमार बॉर्डर तक सड़कें बनाई जाएंगी।

भारतमाला प्लान में रणनीतिक पहलू भी है। इससे सीमावर्ती इलाकों से बेहतर कनेक्टिविटी संभव होगी, जिनके एक बड़े हिस्से के उस पर चीन का शानदार रोड इंफ्रास्ट्रक्चर है। सड़कें बेहतर होने पर मिलिट्री ट्रांसपोर्ट बेहतर हो सकेगा। अधिकारियों ने कहा कि ये सड़कें बन जाने पर बॉर्डर ट्रेड भी बढ़ेगा।

साथ ही, कई राज्यों में बेहतर सड़कों से आर्थिक गतिविधियों में तेजी आएगी। इस योजना में सड़कों का ज्यादातर हिस्सा पहाड़ी राज्यों में बनेगा, जहां कनेक्टिविटी और इकनॉमिक ऐक्टिविटी का मामला कमजोर है।

रोड्स डिपार्टमेंट का कहना है कि इसमें फंडिंग की दिक्कत नहीं आएगी क्योंकि उसे हर साल कम से कम एक लाख करोड़ रुपये खर्च करने का अधिकार दिया गया है। विभाग का हालांकि मानना है कि लैंड एक्विजिशन और पर्यावरण से जुड़ी मंजूरियां हासिल करना चुनौती भरा होगा।

रोड सेक्रेटरी ने कहा कि भारतमाला एक तरह से एक और बड़े प्रोजेक्ट सागरमाला को कनेक्ट करेगा। सागरमाला के तहत बंदरगाहों और तटीय इलाकों को रेल और रोड नेटवर्क के जरिये देश के भीतरी क्षेत्रों से जोड़ने का प्लान है

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