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updated 1:03 PM UTC, Aug 18, 2017
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AMU अक़लियती किरदार: एक मिथ, स्वांग या अर्द्ध सत्य !

दो वक़्त की सूखी रोटियों की बोली लगाकर, गहने-कपड़े बेचकर, दर-दर भीख माँगकर जब 30 लाख की रक़म जुटाई जा रही थी, अंग्रेज़ों के राज में जब ये शर्त जोड़ी गयी कि अगर मुसलमानों के लिए अलीगढ़ में यूनिवर्सिटी बनानी है 30 लाख रुपए का रिज़र्व फ़ण्ड क्रिएट करना होगा...कितना दुश्वार रहा होगा सर् सैय्यद और उनके दोस्तों के लिए, उस वक़्त MAO College के तलबा के लिए ये रक़म जुटाना---ये सब बातें भ्रामक नशे, सतही हेकड़ी, खोखले टशन, बेमतलब की तुनक-मिज़ाजी में चूर आज के एएमयू के तालिब-इल्म के लिए एक कपोल-कल्पना से कम नहीं! आज की घड़ी में इस 30 लाख की क़ीमत क़रीब 300 करोड़ से ज़्यादा बैठेगी...अब आप अंदाज़ा लगाइए कि एएमयू को बनाने में आख़िर किसका ख़ून-पसीना लगा, सर् सैय्यद की क़यादत में जिन लोगों ने अपनी ज़मीनें दीं, पाई-पाई जोड़ा वो लोग कौन थे?

 

...ये बातें ढाबों पर धुएँ के छल्ले उड़ाता वो स्टूडेंट क्या जाने जो आज वाशरूम में हल्का होकर संडास का फ्लश दबाने तक में काहिली महसूस करता है! हर हॉल में मस्जिद होने का डंका पीटने वाला शायद ये भूल जाता है कि ढाबे पर अपने ही भाई की ग़ीबत करना अपने सगे भाई का गोश्त खाना हुआ...

 

माइनॉरिटी इंस्टिट्यूट का नाम आते ही अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जामिया मिल्लिया इस्लामिया का नाम ही खट से ज़ेहन में आता है...जबकि भारत में मज़हब, ज़ुबान, बोलचाल, तहज़ीब के ऐतबार से 13 हज़ार अक़लियती इदारे हैं जो मुस्लिम, ईसाई, सिख, पारसी, बौद्ध और जैन मज़हब के मानने वालों के हैं। इससे साफ़ हो जाता है अल्पसंख्यक के नाम पर सिर्फ़ एएमयू और जामिया का बार-बार नाम उछालना जायज़ नहीं है।

 

मैं ख़ुद लखनऊ किश्चियन कॉलेज से वाक़फ़ियत रखता हूँ...यहां ईसाइयों को दाख़िले में रिज़र्वेशन है और यहाँ एक चर्च भी है...यहां 11वीं से तालीम दी जाती है और इस शिक्षण-संस्थान का प्रिंसिपल क्रिश्चियन ही रहेगा...इसी तरह पंजाब में जैन धर्म के, सिखों के, आर्य समाज के इदारे हैं और यहां बाज़ाब्ता जैन धर्मावलंबियों के मंदिर और गुरूद्वारे भी हैं।

 

पंजाब में सिखों के जितने भी इदारे हैं चाहे वो गुरूनानक मेडिकल कॉलेज हो---वहाँ डंके की चोट पर सिख अनुयायियों के लिए कोटा सुरक्षित है और इन संस्थानों के अंदर गुरूद्वारे भी हैं जहां तलबा अपने धार्मिक अनुष्ठान का पालन करने के लिए पूरी तरह से आज़ाद है।

 

इसी तरह अखिल भारत में ईसाई मज़हब के सैंकड़ों इदारे हैं और इनके कैंपस में ही चर्च भी बने हुए मिल जाएंगे जहां स्टूडेंट्स आज़ादाना तौर पर अपने मज़हब के मुताबिक़ पोषित होता है।

 

आख़िर, सारी दिक़्क़त एएमयू और जामिया को लेकर ही क्यों है? क्या इसलिए कि देश में यही दो ऐसे इदारे हैं जहां से तालीम हासिल कर स्टूडेंट्स बेरून मुमालिक में अपनी हनक का लोहा मनवा रहे हैं!? एक आँकड़े के मुताबिक़ अकेले अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से आला सतही तालीम हासिल कर क़रीब 100 मुल्कों में तलबा अलग-अलग शोबों में अपनी ख़िदमात अंजाम दे रहे हैं। शायद दिक़्क़त और सोच यही है कि एएमयू के अक़लियती किरदार छिनने से मुस्लिम अल्पसंख्यकों की एक बड़ी खेप देश की मुख्यधारा से कट जाए और मुम्बई-चेन्नई-दिल्ली में मज़दूरी करे, ठेला चलाए, ढकेल लगाए, खोमचा बेचे, मिस्त्रिगिरी का काम करे, रिंच-पैना चलाए, पंक्चर जोड़े, कबाड़ का धंधा करे, मुर्ग़ी और बकरियां पाले-चराए। सरकार को तकलीफ़ है क्या कि भारत भूमि पर विदेशी कमाई से एक मुस्लिम ज़िम्मेदार शख़्स अपने परिवार का भरण-पोषण करे तो पर पढ़कर विदेश में प्रोफ़ेसर बनकर, डॉक्टर-सर्जन, इंजीनियर बनकर नहीं एक कामगार मज़दूर बनकर!

 

मरकज़ी हुकूमत एएमयू-जामिया को फ़ण्ड करती है, इन इदारों को संसद के एक्ट से क़ायम किया गया है; लेकिन ये भी तो कहीं दर्ज नहीं है कि अगर ये इदारे केंद्र सरकार से फ़ण्ड लेंगे तो इनका अक़लियती किरदार छिन जाएगा? जिस तरह मोहम्मडन एंग्लो ओरिएण्टल (MAO) कॉलेज को यूनिवर्सिटी बनाने को लेकर 30 लाख का चंदा किया गया था, अंग्रेज़ों के एक्ट से एएमयू का क़याम हुआ और बाद में देश की संसद ने ये माना कि एएमयू का गठन मुल्क के बदहाल मुसलमानों की तालीमी पसमांदगी दूर करने के लिए किया गया है...तब बार-बार एएमयू के इस कैरेक्टर को लील जाने की मुनज़्ज़म प्लाॅनिंग हजम नहीं होती है।

 

क्या BHU में बहुसंख्यक तौर पर हिंदू समाज के छात्र नहीं पढ़ते हैं? यही बात अगर AMU पर लागू हो कि यहां बहुसंख्यक तौर पर मुस्लिम समाज के तलबा तालीम हासिल करें तो इसमें ग़लत क्या है?! एक दौर ऐसा भी था जब देश की आज़ादी से पहले BHU माइनॉरिटी इंस्टिट्यूट था क्योंकि तब सत्ता की चाभी अंग्रेज़ों के हाथों में थी और हिन्दू समाज ने अपने बच्चों के मुस्तक़बिल को महफ़ूज़ करने के लिए बहुसंख्यक होते हुए भी BHU में हिंदू स्टूडेंट्स के लिए दाख़िले में आरक्षण लागू किया था...आज यही तस्वीर मुस्लिमों के सामने है कि वो अल्पसंख्यक हैं और सत्ता हिन्दू समाज के पास है...ऐसे में एएमयू में मुस्लिम समाज के बच्चों को आरक्षण मिलना एक तार्किक मौज़ूं है और ऐसा हर हाल में होना भी चाहिए!

 

एक मज़बूत लोकतंत्र में जब तक ये बुनियादी सोच नहीं पनपती है कि अल्पसंख्यकों के उत्थान के बिना, इनकी तालीमी बेदारी के बिना, इनकी आर्थिक उन्नति के बिना एक मुल्क का सपना अधूरा है तब तक हम ख़ालिस भाषणों में ही देश के संविधान की दुहाई देते रहेंगे...देश का संविधान हमें अपनी अंतरात्मा में आत्मसात करना होगा तभी सर्वसमाज का उत्थान सुनिश्चित हो पाएगा!

 

भारत सरकार सुप्रीम कोर्ट में क्या अपना ये मुवक़्क़ुफ़ साफ़ नहीं करेगी कि अगर वो एएमयू और जामिया के मुस्लिम अल्पसंख्यकों का 'तालीमी चीरहरण' करना चाहती है तो देश के सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध के 13 हज़ार शिक्षण-संस्थानों का क्या होगा जो इसी बुनियाद कर क़ायम हैं और चल रहे हैं जिस तरह से एमयू और जामिया?!

 

क्या 20 करोड़ मुस्लिम, 3 करोड़ ईसाई, 2 करोड़ सिख और अन्य बौद्ध-पारसी-जैन अल्पसंख्यक समाज के बच्चों की तालीमी बेदारी के लिए और भी शिक्षण-संस्थान नहीं खुलने चाहिए? क्या एएमयू अकेला करोड़ों मुस्लिम बच्चों की तालीमी ज़रूरतों को पूरी कर सकता है? जब सरकार को देश में अल्पसंख्यकों-पिछड़ों-दलितों-आदिवासियों के शैक्षणिक -उत्थान के लिए नए तालीमी इदारे खोलने चाहिए वो एएमयू और जामिया पर पिली पड़ी है।

 

ये सब एक तंदुरुस्त जम्हूरियत के लिए मुनासिब नहीं। अगर सरकार अपने संविधान-प्रदत्त अधिकारों का अनुचित दोहन करती है तो इससे किसी भी धर्म-सम्प्रदाय का भला होने से रहा...देश में धर्म के चश्मे से तालीमी असहिष्णुता का बीज रोपकर बीजेपी हुकूमत वोट तो ले सकती है, लेकिन इससे अन्ततोगत्वा समाज का ही अहित होगा...

पवित्र ‘‘गीता’’ सभी को कर्तव्य एवं न्याय के मार्ग पर चलने की सीख देती है

(1) पवित्र ‘‘गीता’’ हमें कर्तव्य एवं न्याय के मार्ग पर चलने की सीख देती है:-

श्रावण कृष्ण अष्टमी पर जन्माष्टमी का पावन त्यौहार बड़ी ही श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा की जेल में हुआ था। कर्षति आकर्षति इति कृष्णः। अर्थात श्रीकृष्ण वह है जो अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। श्रीकृष्ण सबको अपनी ओर आकर्षित कर सबके मन, बुद्धि व अहंकार का नाश करते हैं। भारतवर्ष में इस महान पर्व का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक दोनों तरह का विशिष्ट महत्व है। यह त्योहार हमें आध्यात्मिक एवं लौकिक संदेश देता है। आस्थावान लोग इस दिन घर तथा पूजा स्थलों की साफ-सफाई, बाल कृष्ण की मनमोहक झांकियों का प्रदर्शन तथा सजावट करके बड़े ही प्रेम व श्रद्धा से आधी रात के समय तक व्रत रखते हैं। श्रीकृष्ण के आधी रात्रि में जन्म के समय पवित्र गीता का गुणगान तथा स्तुति करके अपना व्रत खोलते हैं तथा पवित्र गीता की शिक्षाआंे पर चलने का संकल्प करते हैं। साथ ही यह पर्व हर वर्ष नई प्रेरणा, नए उत्साह और नए-नए संकल्पों के लिए हमारा मार्ग प्रशस्त करता है। हमारा कर्तव्य है कि हम जन्माष्टमी के पवित्र दिन श्रीकृष्ण के चारित्रिक गुणों को तथा पवित्र गीता की शिक्षाओं को ग्रहण करने का व्रत लें और अपने जीवन को सार्थक बनाएँं। यह पर्व हमें अपनी नौकरी या व्यवसाय को समाज हित की पवित्र भावना के साथ अपने निर्धारित कर्तव्यों-दायित्वों का पालन करने तथा न्यायपूर्ण जीवन जीते हुए न्यायपूर्ण समाज के निर्माण की सीख देता है।

(2) ‘कृष्ण’ को कोई भी शक्ति प्रभु का कार्य करने से रोक नहीं सकी:-

कृष्ण के जन्म के पहले ही उनके मामा कंस ने उनके माता-पिता को जेल में डाल दिया था। राजा कंस ने उनके सात भाईयों को पैदा होते ही मार दिया। कंस के घोर अन्याय का कृष्ण को बचपन से ही सामना करना पड़ा। कृष्ण ने बचपन में ही ईश्वर को पहचान लिया और उनमें अपार ईश्वरीय ज्ञान व ईश्वरीय शक्ति आ गई और उन्होंने बाल्यावस्था में ही कंस का अंत किया। इसके साथ ही उन्होंने कौरवों के अन्याय को खत्म करके धरती पर न्याय की स्थापना के लिए महाभारत के युद्ध की रचना की। बचपन से लेकर ही कृष्ण का सारा जीवन संघर्षमय रहा किन्तु धरती और आकाश की कोई भी शक्ति उन्हें प्रभु के कार्य के रूप में न्याय आधारित साम्राज्य धरती पर स्थापित करने से नहीं रोक सकी। परमात्मा ने कृष्ण के मुँह का उपयोग करके न्याय का सन्देश पवित्र गीता के द्वारा सारी मानव जाति को दिया। परमात्मा ने स्वयं कृष्ण की आत्मा में पवित्र गीता का ज्ञान अर्जुन के अज्ञान को दूर करने के लिए भेजा। इसलिए पवित्र गीता को कृष्णोवाच नहीं भगवानोवाच अर्थात कृष्ण की वाणी नहीं वरन् भगवान की वाणी कहा जाता है। हमें भी कृष्ण की तरह अपनी इच्छा नहीं वरन् प्रभु की इच्छा और प्रभु की आज्ञा का पालन करते हुए प्रभु का कार्य करना चाहिए।   

(3) परमात्मा सज्जनों का कल्याण तथा दुष्टों का विनाश करते हैं:-

महाभारत में परमात्मा की ओर से वचन दिया गया है कि ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत,

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्, धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे।।’ अर्थात धर्म की रक्षा के लिए मैं युग-युग में अपने को सृजित करता हूँ। सज्जनों का कल्याण करता हूँ तथा दुष्टों का विनाश करता हूँं। धर्म की संस्थापना करता हूँ। अर्थात एक बार स्थापित धर्म की शिक्षाओं को पुनः तरोताजा करता हूँ। अर्थात जब से यह सृष्टि बनी है तब से धर्म की स्थापना एक बार हुई है। धर्म की स्थापना बार-बार नहीं होती है। (अ) परमात्मा ने अपने धर्म (या कत्र्तव्य) को स्पष्ट करते हुए अपने सभी पवित्र शास्त्रों में एक ही बात कही है जैसे पवित्र गीता में कहा है कि मेरा धर्म है, ‘‘परित्राणांय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्’’ अर्थात परमात्मा की आज्ञाओं को जानकर उन पर चलने वाले सज्जनों (अर्थात जो अपनी नौकरी या व्यवसाय समाज के हित को ध्यान में रखकर करते हैं) का कल्याण करना तथा मेरे द्वारा निर्मित समाज का अहित करने वालों का विनाश करना।

(ब) परमात्मा ने आदि काल से ही मनुष्य का धर्म (कत्र्तव्य) यह निर्धारित किया है कि वह केवल अपने सृजनहार परमात्मा की इच्छाओं एवं आज्ञाओं को शुद्ध एवं पवित्र मन से पवित्र ग्रन्थों को गहराई से पढ़कर जाने एवं उन शिक्षाओं पर चलकर बिना किसी भेदभाव के सारी सृष्टि के मानवजाति की भलाई के लिए काम करें। मनुष्य के जीवन का उद्देश्य है कि प्रभु की शिक्षाओं को जानना तथा पूजा के मायने है उनकी शिक्षाआंे पर दृढ़तापूर्वक चलना। मात्र भगवान श्रीकृष्ण के शरीर की पूजा, भोग लगाने तथा आरती उतारने से कोई लाभ नहीं होगा।

(4) सारी सृष्टि की भलाई ही हमारा धर्म है:-

भगवान श्रीकृष्ण से उनके शिष्य अर्जुन ने पूछा कि प्रभु! आपका धर्म क्या है? भगवान श्रीकृष्ण ने अपने शिष्य अर्जुन को बताया कि मैं सारी सृष्टि का सृजनहार हूँ। इसलिए मैं सारी सृष्टि से एवं सृष्टि के सभी प्राणी मात्र से बिना किसी भेदभाव के प्रेम करता हूँ। इस प्रकार मेरा धर्म अर्थात कर्तव्य सारी सृष्टि तथा इसमें रहने वाली मानव जाति की भलाई करना है। इसके बाद अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि भगवन् मेरा धर्म क्या है? भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि तुम मेरी आत्मा के पुत्र हो। इसलिए मेरा जो धर्म अर्थात कर्तव्य है वही तुम्हारा धर्म अर्थात कर्तव्य है। अतः सारी मानव जाति की भलाई करना ही तुम्हारा भी धर्म अर्थात् कर्तव्य है। भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि इस प्रकार तेरा और मेरा दोनों का धर्म अर्थात् कर्तव्य सारी सृष्टि की भलाई करना ही है। यह सारी धरती अपनी है तथा इसमें रहने वाली समस्त मानव जाति एक विश्व परिवार है। इस प्रकार यह सृष्टि पूरी की पूरी अपनी है परायी नहीं है।

(5) ‘अर्जुन’ के मोह का नाश प्रभु की इच्छा और आज्ञा को पहचान लेने से हुआ:-

कृष्ण के मुँह से निकले परमात्मा के पवित्र गीता के सन्देश से महाभारत युद्ध से पलायन कर रहे अर्जुन को ज्ञान हुआ कि कर्तव्य ही धर्म है। न्याय के लिए युद्ध करना ही उसका परम कर्तव्य है। उस समय राजा ही जनता के दुःख-दर्द को सुनकर न्याय करते थे। कोई कोर्ट या कचहरी उस समय नहीं थी। जब राजा स्वयं ही अन्याय करने लगे तब न्याय कौन करेगा? न्याय की स्थापना के लिए युद्ध के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं बचा था। भगवानोवाच पवित्र गीता के ज्ञान को एकाग्रता से सुनने के बाद अर्जुन हाथ जोड़कर बोला प्रभु अब मेरे मोह का नाश हो गया है और मुझे ईश्वरीय ज्ञान एवं मार्गदर्शन मिल गया है। अब मैं निश्चित भाव से युद्ध करुँगा। अर्जुन ने विचार किया कि जो परमात्मा की बनायी सृष्टि को कमजोर करेंगे वे मेरे अपने कैसे हो सकते हैं? पवित्र गीता के ज्ञान को जानकर उसने निर्णय लिया कि न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दण्ड देना चाहिए। फिर अर्जुन ने अन्याय के पक्ष में खड़े अपने ही कुल के सभी अन्यायी यौद्धाओं तथा 11 अक्षौहणी सेना का महाभारत का युद्ध करके विनाश किया। इस प्रकार अर्जुन ने धरती पर प्रभु का कार्य करते हुए धरती पर न्याय के साम्राज्य की स्थापना की।

(6) ‘माता देवकी’ ने प्रभु की इच्छा और आज्ञा को पहचान लिया:-

कृष्ण की माता देवकी ने प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा को पहचान लिया और वह एक महान नारी बन गईं तथा उनका सगा भाई कंस ईश्वर को न पहचानने के कारण महापापी बना। देवकी ने अपनी आंखों के सामने एक-एक करके अपने सात नवजात शिशुओं की हत्या अपने सगे भाई कंस के हाथों होते देखी और अपनी इस हृदयविदारक पीड़ा को प्रभु कृपा की आस में चुपचाप सहन करती रही। देवकी ने अत्यन्त धैर्यपूर्वक अपने आंठवे पुत्र कृष्ण के अपनी कोख से उत्पन्न होने की प्रतीक्षा की ताकि मानव उद्धारक कृष्ण का इस धरती पर अवतरण हो सके तथा वह धरती को अपने भाई कंस जैसे महापापी के आतंक से मुक्त करा सके तथा धरती पर न्याय आधारित ईश्वरीय साम्राज्य की स्थापना हो।

(7) परमात्मा का वास मनुष्य के पवित्र हृदय में होता है:-

परमात्मा ने कहा कि मैं केवल आत्म तत्व हूँ और मैं मनुष्य की सूक्ष्म आत्मा में ही रहता हूँ। वहीं से इस सृष्टि का संचालन करता हूँ। ‘जबकि मेरी रचना- अर्थात मनुष्य’ के हृदय में (1) आत्मतत्व होने के साथ ही साथ उसके पास (2) शरीर तत्व या भौतिक तत्व भी होता है। यह सारी सृष्टि और सृष्टि की सभी भौतिक वस्तुएं मैंने मनुष्य के लिए बनायी हैं। बस मनुष्य का हृदय और आत्मा मैंने अपने रहने के लिए बनायी है। ऐसा न हो कि कहीं हमारे हृदय में उत्पन्न स्वार्थ का भेड़िया हमारी आत्मा को ही न नष्ट कर डाले। ‘गीता’ का सन्देश है कि न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दण्ड देना चाहिए। हमारे ऋषि-मुनियों का चारों वेदों के ज्ञान का एक लाइन में सार है कि उदारचरितानाम्तु वसुधैव कुटुम्बकम् अर्थात उदार चरित्र वाले के लिए यह वसुधा कुटुम्ब के समान है। गीता का एक लाइन में सार है - सर्वभूत हिते रतः अर्थात समस्त प्राणी मात्र केे हित में रत हो जाये।    

(8) विद्यालय है सब धर्मों का एक ही तीरथ-धाम:-

 

विद्यालय एक ऐसा स्थान है जहाँ सभी धर्मों के बच्चे तथा सभी धर्मों के टीचर्स एक स्थान पर एक साथ मिलकर एक प्रभु की प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना का यह ही सही तरीका है। सारी सृष्टि को बनाने वाला और संसार के सभी प्राणियों को जन्म देने वाला परमात्मा एक ही है। सभी अवतारों एवं पवित्र ग्रंथों का स्रोत एक ही परमात्मा है। हम प्रार्थना कहीं भी करें, किसी भी भाषा में करें, उनको सुनने वाला परमात्मा एक ही है। अतः परिवार तथा समाज में भी स्कूल की तरह ही सभी लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ मिलकर एक प्रभु की प्रार्थना करें तो सबमें आपसी प्रेम भाव भी बढ़ जायेगा और संसार में सुख, एकता, शान्ति, न्याय एवं अभूतपूर्व भौतिक एवं आध्यात्मिक समृद्धि आ जायेगी। विद्यालय है सब धर्मों का एक ही तीरथ धाम - क्लास रूम शिक्षा का मंदिर, बच्चे देव समान।

लेखक - डाॅ. जगदीश गांधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक,

सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

 

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रचनाकारों के तानाशाही दुनिया बन रही सोशल मीडिया...!

फेसबुक का प्रयोग लोग घृणा फैलाने के लिए कर रहे हैं । जो लोग इसे फैलाने की कोशिश कर रहें हैं उनकी हिम्मत बहुत बढ़ी हुई है । वे स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी अल्ल बल्ल बक रहे हैं । वे जो बोल रहे हैं जो फैला रहे हैं वो मार्केट की रेशनल्टी को क्रॉस नहीं कर पा रहा है पर इसकी डैमेज कॉस्ट भोले मस्तिष्क पर बहुत ज्यादा है । सरकार को सोशल मीडिया को ध्यान में रख कर एक कानून बनाने की ज़रूरत है । जिसका दायरा बहुत व्यापक हो । वो कानून ऐसा हो कम्युनेशन के खिलाड़ियों के खेल को समझ सके उन्हें दंडित कर सके ।

 

फेसबुक और ट्विटर अपने कानूनों से चलने वाली चीजें हैं । पर देश मे इस संदर्भ में लॉ ऑफ लैंड की ज़रूरत है जो फेसबुक और ट्विटर के ऊपर हो । जब एक्सप्रेशन को रिस्ट्रिक्शन के कानून भारत मे साठवें दशक से सत्तर के दशक तक आते आते स्थाई हो गए थे । वे कानून प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए ठीक हैं पर सोशल मीडिया के लिए नाकाफी हैं । रयूमर और घृणा के फैलने के तरीके बहुत तेज़ हो चुके हैं । क्या बुरा है कि फेसबुक और ट्विटर आई डी आधार से लिंक हों । जो हो आइडेंटिटी के साथ हो । अगर आप इतने ही ईमानदार हैं तो अभव्यक्ति के खतरे उठाएंगे । आप शूट एंड स्कूट न करना चाहेंगे न ही करेंगे । जान पहचान के मुहल्ले में और बिना जान पहचान के शहर में व्यवहार के पैटर्न बिल्कुल अलग होते हैं ।

 

बहुत से अपराध शहर में इसलिए होते हैं क्यो कि अडेन्टिटी छुपी रहती है पर जान पहचान के मुहल्लों में ऐसा नहीं होता । क्यों डिस्कोथीक में बत्तियाँ चकमक चकमक करती हैं क्यो फ़्यूम उड़ाया जाता है क्यो नाचने से पहले नकाब लगाए जाते हैं इन सबके पीछे छुपा है आइडेंटिटी का छुपाव । आइडेंटिटी के छुपते ही गैर जिम्मेदार अवचेतन सामने आ जाता है । फेसबुक में जो होती है वो कई बार अवचेतन की लड़ाइयाँ ही होती है । ऐसा अवचेतन जिसे सभयता और कानून के बंधनों ने दबाया और कमजोर किया है । ऐसा अवचेतन जो किसी भी सभ्यता के निर्माण में बाधक है।जंगल पर अवचेतन हावी रहता है और महान संस्कृतियों पर सक्रिय चेतन ।

 

जर्मनी ने सोशल मीडिया के लिए कठोर कानून बने हैं । दुनिया तानाशाहों की थी तब रचनाकारों को स्वतंत्रता की ज़रूरत थी पर सोशल मीडिया रचनाकारों के तानाशाही की दुनिया है । किसी को घसीटना और मारना बहुत आसान है । ये गैंग्स ऑफ वासेपुर की दुनिया है । यहाँ तक पुलिस नहीं पहुँच पाती । जो सोंच रहे हैं कि आज रामाधीर सिंह हावी है वे नहीं जानते कि रामाधीर सिंह की कोख में सरदार खान पैदा ले चुका है । धृणा के दो हिस्से होते हैं और बिना मूठ की तलवार होती है । वो जिसके हाँथ में होती है उनसे भी काटती है जिसे लगती है उसे भी । मानता हूँ कि  सोशल मीडिया इस जनतंत्र की सेल्फी विद आउट मेकअप है फिर भी इसे सेल्फी विदाउट ड्रेस नहीं होने दिया जा सकता ।

Exclusive Report -झारखंड में आदिवासियों की हालत बदतर कुपोषण ,मलेरिया के शिकार हैं हज़ारों बच्चे

झारखंड के कोल्हान क्षेत्र अंतर्गत सारंडा एवं आसपास के क्षेत्रों में आदिवासियों की हालत चिंताजनक है. आदिवासियों की स्थिति को नजदीक से जानने - समझने के लिए झारखंड के विनोबा भावे विश्वविद्यालय के एलएलबी के छात्र संजय मेहता इन दिनों नक्सल प्रभावित सारंडा वन क्षेत्र में हैं.

 

वे गाँव - गाँव जाकर , आदिवासियों के बीच समय बिताकर उनकी स्थितियों का अध्ययन कर रहे हैं. संजय मेहता का यह प्रयास एक व्यक्तिगत प्रयास है.आदिवासियों  से आत्मीय जुड़ाव के कारण वे व्यक्तिगत तौर पर इस कार्य को अंजाम दे रहे हैं.पिछले माह की 21 जून से लगातार वे गाँवों का दौरा कर आदिवासियों से मिल रहे हैं.उनके दर्द को बांट रहे हैं.

पढ़िए सारंडा के बीहड़ों से संजय मेहता की यह रिपोर्ट......

 

झारखंड की राजधानी राँची से चाईबासा की दूरी 136 किमी है. वहीं सारंडा लगभग 200 किमी दूर है. चाईबासा झारखंड के कोल्हान प्रमंडल का मुख्यालय है . इस क्षेत्र को पश्चिमी सिंहभूम एवं लोहांचल के नाम से जाना जाता है. इन क्षेत्रों में आदिवासियों की हालत जानवरों से भी बदतर है . आदिवासी जीविका के लिए तरस रहे हैं .

 

आदिवासी गाँव के लगभग हर बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. बच्चों को शिशुकाल में पोषण नहीं मिल रहा है. बच्चों की हालत चिंताजनक है. गर्भवती महिलाओं को भयंकर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. लौह अयस्क क्षेत्र होने के कारण लोगों को पीने के पानी की भी समस्या है.

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अपनी माँ के साथ कुपोषित बच्चा

 

21 जून से लगातार मैं इस क्षेत्र के तमाम गाँवों में वक्त गुजार कर इनकी स्थितियों का पड़ताल कर रहा हूँ.हर तरफ निराशा और बेबसी है. ऐसा प्रतीत होता है जैसे इन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया गया है. आदिवासियों की जो हालत इस क्षेत्र में है वह रोंगटे खड़ी करती है. काफी निराशाजनक स्थिति है. क्षेत्र के किरीबुरू ,  मेघाहातुबुरु , बदजामदा , गुवा , कोटगढ़ , जेटेया , बड़ापसिया , लोकसाई , बालिझरण , दिरीबुरु , बराईबुरु , टाटीबा , पेटेता, पोखरपी , कादजामदा , महुदी , नोवामुंडी समेत कई अन्य गाँवों में आदिवासी जिंदगी से जद्दोजहद कर रहे हैं.

 

सरकार - सिस्टम पूरी तरह फेल

 

आदिवासी परिवारों की हालत देखकर यह कहा जा सकता है कि सरकार और सिस्टम इस क्षेत्र में पूरी तरह फेल है . अस्पतालों में डॉक्टर नहीं , स्कूलों में शिक्षक नहीं , गाँव का हर बच्चा कुपोषण का शिकार . जीविका के लिए प्रकृति पर निर्भरता.  शासन व्यवस्था से कटे इन गाँवों की हालत  सरकार एवं नौकरशाही के कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़ी करती है.

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बड़ापासिया पंचायत क्षेत्र में दूषित पानी के कारण आदिवासियों के नाखूनों में हुआ संक्रमण

 

यूनिसेफ और राज्य सरकार के रिपोर्ट में हो चुकी है कुपोषण की पुष्टि

 

फरवरी 2017 में राज्य सरकार एवं यूनिसेफ की एक रिपोर्ट जारी की गई थी जिसमे कहा गया था कि सारंडा क्षेत्र के 20 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं.

इस रिपोर्ट में सही आंकड़ा नहीं पेश किया गया. सच्चाई को छुपा दिया गया. क्षेत्र की जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है. 20 प्रतिशत से कहीं अधिक लगभग बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. लगभग हर आदिवासी बच्चा कुपोषण का शिकार है. बच्चे हड़िया पीकर जीवित हैं. बच्चों के पेट फुले हुए हैं. कई बच्चे बीमारी से मर भी जाते हैं .लेकिन किसी को कुछ पता भी नहीं चल पाता.

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बड़ानंदा पंचायत के सर्बिल गाँव में अपनी 19 माह की कुपोषित बहन को हड़िया पिलाती एक छोटी बच्ची

 

सुदूर गाँवों में सुविधाएं मयस्सर नहीं

 

इस क्षेत्र के सुदूर गाँवों में सरकारी सुविधाओं का बुरा हाल है. ग्रामीणों के सामने पीने के पानी के लाले हैं. बेरोजगारी चरम सीमा पर है. कई गांवों में बिजली भी नहीं पहुँची है. कई क्षेत्रों में सड़कों की हालत जर्जर है. कुछ गाँवों में सड़कें बनी हैं.

 

पंचायती चुनाव से चुनकर आए जनप्रतिनिधि भी खनन क्षेत्र होने के कारण विकास योजनाओं को जनता तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं. किरीबुरू पंचायत की मुखिया पार्वती कीड़ो ने बताया कि सेल लीज क्षेत्र होने के कारण विकास की राशि वापस चली जाती है. सेल अनापत्ति प्रमाण पत्र प्रदान नहीं करती है क्योंकि सेल का अपना सीएसआर का कार्य होता है. उन्होंने कहा कि इस ओर कई बार पदाधिकारियों का ध्यान आकृष्ठ कराया गया लेकिन कुछ नहीं हुआ.

 

क्या कहते हैं ग्रामीण

 

क्षेत्र के कोटगढ़ पंचायत के काठिकोडा गाँव के संतोष लागुरी कहते हैं कि हम गरीब लोग हैं. सरकार हमारे ऊपर ध्यान नहीं दे रही है. गाँव के बच्चे मलेरिया - कुपोषण से पीड़ित हैं. हमलोग तंग आ चुके हैं.

 

किरीबुरू के जोलजेल बिरुआ दुर्दशा  बताते हुए कहते हैं कि सरकार की हर योजना फेल है. हमलोग को कुछ सुविधा कहीं से नहीं मिल रहा है. बडाजामदा के प्रफुल्लो नाकुड़ ने कहा कि हमारे क्षेत्र में विकास का काम भगवान भरोसे है. बच्चे बीमार रहते हैं.अस्पताल में डॉक्टर नहीं आते हैं.हमलोग करे भी तो क्या करें ?

 

गुवा के जुदा बोदरा ने कहा कि एक तो हमलोग बेरोजगार है. ऊपर से सरकार मदद नहीं करती. बच्चों को बीमारी हो जा रही है.मलेरिया का प्रकोप है. कुछ सुविधा नहीं मिलती.हमलोग बहुत मुश्किल में हैं.

 

बड़ापासिया गाँव के घनश्याम बोबोंगा कहते हैं  कि आदिवासियों की हालत बहुत खराब है. हमलोग निम्न स्तर की जिंदगी जीने को मजबूर हैं. सरकार की सुविधा हमलोगों को नसीब नहीं है. कोई अधिकारी भी इधर कभी नहीं आते हैं.

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कोलई (मेफ्लाई) कीड़े को बेचती आदिवासी महिला

 

ग्रामीणों ने बताया कि खराब पानी के कारण हम सबों के पैरों एवं नाखूनों में अलग तरीके का संक्रमण हो गया है. नोवामुंडी की आदिवासी महिलाओं ने कहा कि हम कोलई नाम के कीड़े को भूनकर खाते हैं. इस कीड़े को भूनकर बेचते भी हैं . अभी के मौसम में यह हमारे भोजन और जीविका का मुख्य साधन है. कई अन्य गाँवों के ग्रामीणों ने भी अपना दुख व्यक्त किया.

 

 

सारंडा एक्शन प्लान छलावा: ग्रामीण

 

ग्रामीण कहते हैं झारखंड बनने के बाद आदिवासियों के विकास की बात कही गयी . कई वादे किए गए . करोड़ों रुपये खर्च किये गए . केंद्र सरकार ने भी पहल की लेकिन तस्वीर नहीं बदली. पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने भी इस क्षेत्र में कई दौरा किया था. फिर भी तमाम दावों के बावजूद आदिवासियों की हालत नहीं बदली.

 

आदिवासी जानवरों की जिंदगी जीने को मजबूर हैं. लोगों की निराशा आक्रोश का रूप धारण कर रही है. व्यवस्था के प्रति इनलोगों में गुस्सा बढ़ा है. पूरे क्षेत्र के हालात खुद बयां करते हैं कि सारंडा एक्शन प्लान एक छलावा बनकर रह गया. आदिवासी आज भी वहीं हैं.

 

 

भूतपूर्व सैनिकों को राह दिखाती एक संस्था -"वाॅरियर्स क्लब"

नयी दिल्ली। जो सैनिक पूरी जवानी देश के दुर्गम इलाकों,बर्फ और पहाड़ो में काटता है और हर तरह के कठिन परिस्थितियों में देश की सेवा में अपनी प्राणों की आहूति देने को तैयार रहता है वही सैनिक जब अपनी ड्यूडी पूरी कर रिटायर्ड होते है तो उन्हें सामने फिर एक नई परिस्थिती आ जाती है जिसमें वास्तविक जीवन में उसको कई कठिनाईयों का सामना करना पडता है। नई नौकरी ढूंढने से लेकर, बच्चों की शिक्षा,मकान से लेकर हर तरह की समस्या उसके सामने खडी हो जाती है। जो सैनिक रात भर जागकर हमे चैन की नींद सोने देता है उसी का शोषण शुरु हो जाता है। इन्हीं सब चीजों को ध्यान में रखकर दो भूतपूर्व सैनिकों ने मिलकर Warrior 's Club की स्थापना की है।

 

Warrior 's Club  सन 2016 में भूतपूर्व सैनिक प्रदीप शर्मा द्वारा स्थापित किया गया तथा Warrior 's Club भूतपूर्व सैनिकों (NCOs / JCOs ) के लिए लगातार कार्यरत है। इसके संस्थापक प्रदीप शर्मा का मानना है की हमारे देश की सेना में सैनिकों को कई क्षेत्रों (जैसे सुरक्षा, प्रशासन एवं सप्लाई चेन आदि) में उत्तम दर्जे का प्रशिक्षण प्राप्त होता है, हालाँकि सेना से बाहर कल्चरल डिफरेंस की वजह से सैनिकों को नौकरी ढूंढने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इसके अलावा, भूतपूर्व सैनिक सेना से बाहर कम वेतन मिलने की वजह से कई सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं।

 

इन सभी बातों को मध्य नज़र रखते हुए प्रदीप शर्मा ने अपने सहयोगी सतीश कुमार के साथ मिल कर Warrior 's Club की स्थापना की, जिसके माध्यम से वे भूतपूर्व सैनिकों को विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं, जिसमे सबसे महत्वपूर्ण, Orientation प्रोग्राम (डिफेन्स टू कॉर्पोरेट) एवं भूतपूर्व सैनिकों को नौकरी दिलवाने में मदद करना है।  इसके अतिरिक्त भी Warrior 's Club , अपने मेंबर्स को कई विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध करवाता है। पिछले एक वर्ष में Warrior 's Club अपने कई मेंबर्स को अच्छी नौकरी दिलवाने में मदद की है।

 

Warrior 's Club भूतपूर्व सैनिकों के परिवार के लोगों का भी ध्यान रखता है और सैनिकों के बच्चों की हाॅयर एजुकेशन के लिए काउंसिलिंग तथा सरकारी नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में भी मदद करता है। साथ ही भूतपूर्व सैनिकों के परिवार वालों के लिए इनके द्वारा स्थापित अन्य शहरों के Warrior 's Club में रहने खाने की सुविधा भी दी जाती है।

 

 

Warrior 's Club के इन प्रयासों की कई इंडस्ट्री लीडर्स एवं संस्थाओं ने सराहना की है एवं इसे भूतपूर्व सैनिकों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। वारियॅर क्लब की लक्ष्य भूतपूर्व सैनिकों में नई चेतना का संचार करना तथा राज्य की नीति से हटकर भूतपूर्व सैनिको को सहयोग प्रदान करते रहना है जिससे बदलते नए परिवेश में सैनिक अपने को समाज में स्थापित कर सकें।

दिव्यांगो को मिला शक्ति सम्मान

 

आज दिनांक 21-05-2017 को उन्नत भारत द्वारा नयी दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब ऑफ़ इंडिया में शारीरिक रूप से अक्षम यानी दिव्यांग व्यक्तियों के लिए दिव्यांग शक्ति सम्मान का आयोजन किया, समारोह में वैसे दिव्यांगों का सम्मान किया गया जो अपने कार्यों से समाज के अन्य दिव्यांगों तथा शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए प्रेरणा श्रोत बनें। बाबु जगजीवन राम राष्ट्रीय प्रतिष्ठान की मदद से कार्यक्रम का आयोजन किया गया, इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता राज्य मंत्री श्री विजय सांपला, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री श्याम जाजू, उन्नत भारत के अध्यक्ष अभिषेक मिश्र, बाबु जगजीवन राम राष्ट्रीय प्रतिष्ठान के उपाध्यक्ष श्री मति स्वाति कुमार और कोषाध्यक्ष श्री संजय निर्मल, पूर्व विधायक विनोद कुमार बिन्नी, विकलांगता अधिकार के मुख्य आयुक्त डॉ. संजय कान्त प्रसाद एवं भाजपा नेता संदीप दुबे उपस्थित थे, सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता राज्य मंत्री श्री विजय सांपला ने सरकार के द्वारा दिव्यांगों के लिए किये कार्यों की जानकारी दी, इस मौके पर कार्यक्रम के आयोजक अभिषेक मिश्र ने बताया की कार्यक्रम का उदेश्य दिव्यांगो को अच्छे कार्यों से लगातार जुड़े रहने की प्रेरणा मिले इसके लिए लगातार इस तरह के आयोजन उन्नत भारत द्वारा किया जाएगा समारोह में सम्मानित हुए दिव्यांगो में शिक्षिका दर्शाना, विकलांग सहारा समिति के कपिल अग्रवाल एवं सोनू भोला, बैंक में कार्यरत एवं अंतर्राष्ट्रीय शूटिंग में रजत पदक विजेता पूजा अग्रवाल, सामाजिक संस्था के लिए रिंकू वर्मा, नमिता भल्ला, नरिन्दर अग्रवाल, नृत्य में प्रमोद, और खेल के क्षेत्र से रवि चौहान, अंशुल, जोगिन्दर सिंह को दिया गयाI

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समर्पित अभिनेता और राजनेता की तरह हमेशा याद किये जाएंगे विनोद खन्ना

महान कलाकार और राजनीतिज्ञ विनोद खन्ना का जन्म 6 अक्टूबर 1946 को पेशावर (अब पाकिस्तान का भाग) में हुआ था। एक साल बाद 1947 में हुए भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद विनोद खन्ना का परिवार मुंबई आ गया। विनोद खन्ना एक व्यापारिक पंजाबी परिवार से ताल्लुक रखते थे। विनोद खन्ना की माँ का नाम कमला और पिता का नाम किशनचंद खन्ना था। विनोद खन्ना के तीन बहनें और एक भाई थे। विनोद खन्ना ने सेंट मैरी स्कूल, मुंबई से दूसरी क्लास तक शिक्षा प्राप्त की और फिर सेंट जेवियर्स हाईस्कूल, दिल्ली में स्थानांतरित कर दिया गया। 1957 में, खन्ना परिवार दिल्ली आ गया जहां विनोद खन्ना ने दिल्ली पब्लिक स्कूल, मथुरा रोड से शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद खन्ना परिवार 1960 में मुंबई पुनः लौट आया, लेकिन उन्हें नासिक के पास देओली में बार्न्स स्कूल भेजा गया। अपने बोर्डिंग स्कूल के समय विनोद खन्ना ने सोलवां साल और मुगल-ए-आजम फिल्म देखीं और अभिनय के प्रति उनका प्यार जागा। विनोद खन्ना ने सिडनहैम कॉलेज, मुंबई से वाणिज्य विषय में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। विनोद खन्ना का विवाह 1971 में गीतांजलि से हुआ। जिनसे उनके दो पुत्र हैं, राहुल खन्ना और अक्षय खन्ना। राहुल खन्ना और अक्षय खन्ना दोनों ही बॉलीवुड में सक्रिय हैं। 1985 में विनोद खन्ना का गीतांजलि से तलाक हो गया। इसके बाद विनोद खन्ना ने दूसरा विवाह कविता से 1990 में किया। जिनसे उनका एक पुत्र साक्षी खन्ना और एक पुत्री श्रद्धा खन्ना है।      

 

विनोद खन्ना ने अपने फिल्मी कॅरियर की शुरुआत सुनील दत्त की 1968 में आई फिल्म ‘मन का मीत’ से की, जिसे अधूरति सुब्बा राव द्वारा निर्देशित किया गया, इस फिल्म में मुख्य नायक सोम दत्त थे, और विनोद खन्ना को खलनायक की भूमिका मिली। ‘मन का मीत’ फिल्म तमिल फिल्म ‘कुमारी पेन’ की रीमेक थी। अपने कैरियर की शुरुआत में विनोद खन्ना ने 1970 में आई ‘पूरब और पश्चिम’, ‘सच्चा झूठा’, ‘आन मिलो सजना’, और ‘मस्ताना’ 1971 में ‘मेरा गाव मेरा देश’ और एलान में सहायक अभिनेता और खलनायक की भूमिकाएं अदा कीं। विनोद खन्ना उन कुछ अभिनेताओं में से एक थे जिन्हे शुरूआती भूमिकायें सहायक अभिनेता और खलनायक की मिली लेकिन 1971 के बाद विनोद खन्ना को फिल्मों में मुख्य अभिनेता की भूमिकाएं मिलने लगीं।

 

विनोद खन्ना को मुख्य अभिनेता के रूप में पहला ब्रेक शिव कुमार निर्देशित फिल्म ‘हम तुम और वो’ से 2971 में मिला। इसके बाद 1982 तक विनोद खन्ना ने दर्जनों यादगार हिट फिल्में दीं, जिनमें प्रमुख रूप से ‘मेरे अपने’, ‘अचानक’, ‘फरेबी’, ‘हत्यारा’, ‘गद्दार’, ‘आप की खातिर’, ‘राजमहल’, ‘मैं तुलसी तेरे आँगन की’, ‘खूंन की पुकार’, ‘शक’, ‘आरोप’, ‘ताकत’, ‘जेल यात्रा’, ‘दौलत’, ‘आधा दिन आधी रात’, ‘द बर्निंग ट्रैन’, ‘कुर्बानी’ की। इस बीच विनोद खन्ना ने गुजरे जमाने की सभी प्रमुख अभिनेत्रियों, मौसमी चटर्जी, लीना चंदावरकर, विद्या सिन्हा, योगिता बाली, रेखा, नीता मेहता, शबाना आजमी, सायरा बानो, राखी, परवीन बॉबी, रीना रॉय, जीनत अमान इत्यादि के साथ काम किया। 1971 से 1982 के बीच में विनोद खन्ना ने 47 बहुनायक फिल्मों में भी काम किया। जिनमें ‘शंकर शंभू’, ‘चोर सिपाही’, ‘एक और एक ग्यारह’ में शशि कुमार के साथ काम किया। ‘हेरा फेरी’, ‘खून पसीना’, ‘अमर अकबर एंथोनी’, ‘जमीर’, ‘परवरिश’ और ‘मुकद्दर का सिकंदर’ में विनोद खन्ना महानायक अमिताभ बच्चन के साथ दिखाई दिए और ‘हाथ की सफाई’ और ‘आखिरी डांकू’ में उन्होंने रणधीर कपूर के साथ सह-भूमिका की। विनोद खन्ना ‘डाकू और जवान’ में सुनील दत्त के साथ दिखाई दिए। उन्होंने एक ‘हसीना दो दीवाने’, ‘एक बेचारा’, ‘परिचय’, ‘इंसान’, ‘अनोखी अदा’ और ‘जन्म कुंडली’ में जितेन्द्र के साथ काम किया। विनोद खन्ना ने ‘रखवाला’, ‘पत्थर और पायल’, ‘द बर्निंग ट्रेन’, ‘बंटवारा’ और ‘फरिश्ते’ में धर्मेंद्र के साथ स्क्रीन साझा की।

 

विनोद खन्ना ने 1882 में आध्यात्मिक गुरु ओशो (रजनीश) के अनुयायी बन गए और 1982-86 तक पांच वर्षों तक फिल्म जगत को छोड़ दिया। इसके बाद विनोद खन्ना ने अपनी दूसरी फिल्मी पारी भी सफलतापूर्वक खेली। पांच साल फिल्म इंडस्ट्री से दूर रहने के बाद 1987 में विनोद खन्ना ने ‘इन्साफ’ फिल्म के साथ जबरदस्त वापसी की जिसमे उनके विपरीत भूमिका में डिंपल कपाड़िया थीं। वापसी के बाद उन्होंने ‘जुर्म’ और ‘चांदनी’ में रोमांटिक भूमिका निभाई, लेकिन उन्होंने ज्यादातर एक्शन फिल्मों में भूमिका निभाई। 1990 के दशक में, विनोद खन्ना ने  ‘मुक्कदार का बादशाह’, ‘सीआईडी’, ‘जुर्म’, ‘रिहाई’, ‘लेकिन’, और ‘हमशक्ल’ सहित कई फिल्मों में काम किया। इसके साथ ही उन्होंने नए नायकों (ऋषि कपूर, गोविंदा, संजय दत्त, रजनीकांत, सलमान खान, सन्नी देओल) के साथ कई फिल्मों में साझा भूमिकाएं अदा कीं, जिनमें प्रमुख रूप से ‘आखिरी अदालत’, ‘महासंग्राम’, ‘खून का कर्ज’, ‘पुलिस और मुजरिम’, ‘क्षत्रिय’, ‘इंसानियत के देवता’, ‘एक राजा रानी’ और ‘ईना मीना डीका’ थीं। मीनाक्षी शेषाद्रि के साथ विनोद खन्ना की जोड़ी की काफी सराहना की गई और इस जोड़ी ने ‘जुर्म’, ‘महादेव’, ‘पुलिस और मुजरिम’, ‘हमशक्ल’ और ‘सत्यमेव जयते’ जैसी सफल फिल्मों में काम किया।

 

1997 में, उन्होंने ‘हिमालय पुत्र’ में अपने बेटे अक्षय खन्ना को फिल्म इंडस्ट्री में लांच किया, जिसमें उन्होंने भी अभिनय किया। 1999 में, विनोद खन्ना को तीन दशकों से अधिक हिंदी फिल्म उद्योग के लिए उनके योगदान के लिए ‘फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट’ पुरस्कार मिला। उसके बाद भी उन्होंने कई फिल्मों में काम किया। विनोद खन्ना ने ‘दीवानापन’ (2002), ‘रेड अलर्टः द वार विदिन’, ‘वांटेड’ (2009) और ‘दबंग’ (2010) में चरित्र भूमिकाएं निभायीं। एकल नायक के रूप में विनोद खन्ना ने ‘द फेस ऑफ ट्रुथ’ (2005) और पाकिस्तानी फिल्म ‘गॉडफादर’ (2007) में अभिनय किया, साथ ही साथ मल्टी-स्टारर फिल्म ‘रिस्क’ (2007) में भी विनोद खन्ना का काम प्रशंसनीय था। विनोद खन्ना आखिरी बार शाहरुख खान के साथ ‘दिलवाले’ में नजर आये।

 

विनोद खन्ना ने स्मृति ईरानी द्वारा निर्मित धारावाहिक ‘मेरे अपने’ में ‘काशीनाथ’ की भूमिका निभाई जो कि हिंदी चैनल ‘9एक्स’ पर प्रसारित हुआ। 2014 में, उन्होंने ‘कोयलांचल’ में मुख्य भूमिका निभाई, जहां उन्होंने गॉडफादर की भूमिका निभाई जो कि कोयला माफिया का चेहरा था।

 

विनोद खन्ना ने अपने राजनैतिक कैरियर की शुरुआत भाजपा से की। विनोद खन्ना 1997 में पहली बार पंजाब के गुरदासपुर क्षेत्र से भाजपा की ओर से सांसद चुने गए। इसके बाद 1999 के लोकसभा चुनाव में गुरदासपुर लोकसभा से ही दूसरी बार जीतकर संसद पहुंचे। विनोद खन्ना को 2002 में अटल बिहारी वाजपेई सरकार में संस्कृति और पर्यटन के केंद्रीय मंत्री बनाया गया। 6 महीने के बाद उनका विभाग बदलकर उनको अति महत्वपूर्ण विदेश मामलों के मंत्रालय में राज्य मंत्री बना दिया गया। 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने गुरदासपुर लोकसभा सीट से फिर से चुनाव जीता। हालांकि, 2009 के लोकसभा चुनाव में विनोद खन्ना को हार का सामना करना पड़ा। लेकिन एक बार फिर 2014 लोकसभा चुनाव में विनोद खन्ना गुरदासपुर लोकसभा से चैथी बार चुनाव जीतकर संसद पहुंचे।

 

भारतीय सिनेमा के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ कलाकारों में से एक और अपने वक्त के सबसे खूबसूरत अभिनेताओं में गिने जाने वाले दिग्गज अभिनेता और राजनीतिज्ञ विनोद खन्ना का 27 अप्रैल 2017 को मुंबई के रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल में निधन हो गया। 70 वर्षीय विनोद खन्ना कैंसर से पीड़ित थे। भारतीय सिनेमा ने विनोद खन्ना के रूप में एक बेहतरीन अभिनेता खो दिया। महान कलाकार विनोद खन्ना का जाना सम्पूर्ण कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति है, जिसकी पूर्ति कर पाना नामुमकिन है। विनोद खन्ना का जिंदादिल अभिनय भारत के प्रत्येक नागरिक के दिलों में हमेशा जिंदा रहेगा। विनोद खन्ना एक समर्पित अभिनेता और राजनेता की तरह हमेशा याद किये जाएंगे। विनोद खन्ना के निधन का समाचार कला प्रेमियों के लिए अत्यंत दुखद है, ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे।

 

समानता की ओर अग्रसर होती महिलाएं

मंगलयान मिशन और एक साथ लॉंच किए गए 104 उपग्रहों को लेकर भारतीय महिला वैज्ञानिकों के योगदान की  प्रशंसा न केवल भारत द्वारा की जा रही है बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय महिला वैज्ञानिकों की सराहना हो रही है। डॉ. के.सी.थॉमस, एन वलारमती, मिनाल संपथ, अनुराधा टीके, रितू करिधल, मोमिता दत्ता और नंदनी हरिनाथ जैसे वैज्ञानिकों ने हर भारतीय को गौरवान्वित किया है।

 

        इन वैज्ञानिकों की तरह ही अनेक महिलाएं हैं जिन्होंने मिशाल कायम की है। वे विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्टता और ज्ञान के उदाहरण हैं। लेकिन यह आइना का एक पहलू है। यह पहलू शिक्षित, सफल और सशक्त भारतीय महिलाओं की स्थिति की है। दूसरी ओर महिलाओं की बड़ी आबादी आज भी यौनवाद, भेदभाव और दमन झेल रही है। ऐसी महिलाएं जीवन और समाज में अपने उचित स्थान की मांग करने से काफी दूर हैं। ऐसी महिलाएं भारत के संविधान में दिए गए समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14) सहित अपने मौलिक अधिकारों का उपयोग नहीं कर पाती। इस स्थिति में एकमात्र रास्ता दोनों पहलुओं के बीच की खाई को पाटना और संतुलन बनाना है। सौभाग्यवश, हम सही रास्ते पर हैं, लैंगिक समानता के सिद्धांतों पर काम कर रहे हैं। कार्यबल तथा निचले स्तर पर राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं के योगदान और भागीदारी से भारत ने 2016 के वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की वैश्विक लैंगिक अंतर रिपोर्ट में 21 स्थानों की छलांग लगाई हैं। भारत का स्थान 2016 में 87वां हो गया है जबकि 2015 में भारत 108वें पायदान पर था। शिक्षाप्राप्ति, आर्थिक भागीदारी तथा अवसर, स्वास्थ्य तथा राजनीतिक सशक्तिकरण के कारण यह सुधार हुआ है

(स्रोत : https://reports.weforum.org/global-gender-gap-report-2016/economies/#economy=IND)।

 

विश्व में राजनीतिक सशक्तिकरण के बारे में भारत का स्थान 9वां है। यह बड़ी उपलब्धि होने के साथ-साथ अपने देश द्वारा अपनाए गये लोकतान्त्रिक मॉडल की अंतर्निहित शक्ति का संकेतक करता है। लेकिन दो राय नहीं कि लैंगिक समानता के संबंध में लंबा रास्ता तय करना है और इस रास्ते की सबसे बड़ी बाधा यह है कि हमारा समाज महिला को किस रूप में देखता है। हालांकि विभिन्न क्षेत्रों की महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी और संवैधानिक ढांचा सशक्त बनाने वाले हैं लेकिन इऩ प्रावधानों के बारे में उदार और प्रगतिशील चेतना की भारी कमी है। कानूनी चेतना के बावजूद किसी भी सामान्य पुरूष और महिला के लिए न्याय तक पहुंचना और लंबी लड़ाई लड़ना कोई सहज काम नहीं है।

 

इसी तरह लैंगिक असंतुलन तथा लैंगिक भेदभाव के कारण 1961 के बाद से देश की महिला आबादी में कमी आ रही है। यह भारत की विकासगाथा पर एक धब्बा है। इस समस्या के समाधान के लिए यानी महिलाओं की गिरती आबादी की प्रवृति बदलने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा 2015 में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना लाँच की गयी। महिलाओं की कम होती संख्या कहानी के एक भाग को दिखाती है। यह केवल महिलाओं और लड़कियों की निम्न सामाजिक स्थिति का एक लक्षण है, गंभीर लक्षण। यह दिखाता है कि किस तरह भारत में पितृसत्ता का ढांचा अनादर, दुर्व्यवहार, असमानता और भेदभाव से एक महिला के जीवन चक्र को संचालित करता है। ऐसा भेदभाव और बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन सभी वर्गों तथा आबादी की महिलाओं के साथ किया जाता है।

 

आज भी महिलाओं को टी.वी देखने या रेडियो सुनने से रोकने के उदाहरण मिलते हैं। इस तरह के भेदभाव गंभीर या छोटे हो सकते हैं, अपमानजनक हो सकते हैं लेकिन कोई इसके विरोध की आवश्यकता महसूस नहीं करता। स्त्रीद्वेष तथा महिलाओं तथा लडकियों के प्रति हिंसा तेजी से बढ़ रही है।

 

महिला और बाल विकास मंत्रालय का #WeAreEqual  अभियान  

इस स्थिति में महिलाओं और लड़कियों के लिए समानता हासिल करने के लिए जागरूकता, सोच में परिवर्तन तथा सामाजिक और व्यवहारिक परिवर्तन की आवश्यक है। इस प्रक्रिया में पुरूषों और लड़कों के साथ भागीदारी आवश्यक हो जाती है। पुरुष और लड़के हमारे समाज को दर्पण दिखाते हैं और यौनवाद, असमानता और लैंगिक भेदभाव के विरुद्ध लड़ाई में बराबर के सहयोगी हैं।

 

जागरूकता बढ़ाने के लिए महिला और बाल विकास मंत्रालय ने 13 फरवरी को सोशल मीडिया अभियान #WeAreEqual  प्रारंभ किया। इसका उद्देश्य शिक्षा, स्वास्थ्य, पोष्टिकता और सम्मान के क्षेत्र में महिलाओं को समान अवसर की आवश्यकता के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। यह अभियान नारी शक्ति पुरस्कार समारोह सहित 8 मार्च, 2017 को मनाये जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का हिस्सा है। इस अभियान का कहना है “आप और मैं, हम एक हैं। इस अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर समानता का अपना नारा साझा करें और परिवर्तन में शामिल हों। ”

 

यह अभियान सोशल मीडिया पर लोकप्रिय हो रहा है। इसमें सेलेब्रेटी, खेल जगत के लोग और अभिनेता शामिल हो रहे हैं। लैंगिक समानता के लिए पुरूष और महिला सोशल मीडिया पर #WeAreEqual संदेश पोस्ट कर रहे हैं। लोग अपनी निजी कहानियां बता रहे हैं और लैंगिक रूप से समतामूलक समाज बनाने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं। यह अभियान न केवल लैंगिक समानता के महत्व और आवश्यकता का संकेत दे रहा है बल्कि लोगों को परिवर्तन लाने की जिम्मेदारी लेने को भी कह रहा है।

 

महिला और बाल विकास मंत्रालय के संकेत के अनुसार लोकप्रिय अभिनेता आलिया भट्ट और भारतीय क्रिकेट कप्तान विराट कोहली अभियान को समर्थन देंगे। सुपरस्टार अमिताभ बच्चन, पहलवान संग्राम सिंह, ओलंपिक बॉक्सर मैरि कॉम, दियामिर्जा और इसरो वैज्ञानिक के.थेनमोजी सेल्वी, सुभा वरियर तथा मिनाल रोहित ने इस अभियान को अपना समर्थन दिया है। समाज को प्रभावित करने वाले इस तरह के लोग परिवर्तन के लिए प्रेरणा दे सकते हैं।

अभियान के लिए मैरि कॉम ने पोस्ट किया है “मैं चाहती हूं कि हर लड़की को अपने सपनों को पूरा करने की आजादी हो, खेल में उन्हें और अधिक मान्यता दी जाये”।

 

अमिताभ बच्चन ने #WeAreEqual संदेश देते हुए घोषित किया है कि “मेरे निधन पर मेरी संपत्ति, मेरी बेटी और मेरे बेटे के बीच समान रूप से साझा की जाएगी! #genderequality #WeAreEqual.” । कहने की आवश्यकता नहीं की यह संदेश पुरूष और महिलाओं की समान संपत्ति अधिकारों की कारगर वकालत करता है।

 

साधारणजन अपनी निजी कहानियां साझा कर रहे हैं और इस # टैग के साथ अपना संदेश दे रहे हैं। लोगों द्वारा रोजाना महिलाओं के यौनवाद का शिकार होने की बात स्वीकार की जा रही है।

 

निःसंदेह भारत को लैंगिक समानता की लक्ष्य प्राप्ति तथा लैंगिक भेदभाव मुक्त समाज बनाने की अपनी गति जारी रखनी होगी। ऐसा लैंगिक भेदभाव मुक्त समाज जिसमें सभी संसाधनों और अवसरों के मामले में पुरूष और महिलाओं की समान पहुंच होगी। हर प्रयास, हर अभियान और हर पहल मायने रखती है और प्रत्येक हितधारक को इसमें विश्वास रखना होग।

 

-लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं अभी एसओएस चिलड्रेन विलेजेज ऑफ इंडिया की कम्युनिकेशन प्रमुख हैं। लेख में व्‍यक्‍त किए गए विचार उनके निजी विचार हैं।

कभी गुमनाम जिंदगी जी रही केसर देवी, नानू देवी जैसी लाखों महिलायें अब हैं 'पॉवरफुल वुमेन'

स्त्री शक्ति के जरिये परिवार,समाज और राष्ट्र को सशक्त तथा समृद्ध बनाने की राजस्थान की विभिन्न कल्याण योजनाओ से लगभग डेढ करोड़ परिवार की महिलाओ के'पॉवरफुल वुमेंन' बनने की दिशा में एक सकारात्‍मक कदम है। गुमनाम सी अंधेरी जिंदगी जी रही जयपुर की केसर देवी, बीकानेर की नानू देवी  जैसी लाखों महिलाओं को 'भामाशाह योजना' के तहत परिवार की मुखिया बना कर उन्‍हें अधिकार सम्पन्न बनाने से उनके परिवार लाभान्वित हो रहे हैं।

  दरअसल राजस्थान में इन दिनो महिला सशक्तिकरण को लेकर क्रांति हो रही है। प्रदेश की 'भामाशाह योजना' से दूर दराज के गांव, शहर की महिलायें 'पॉवरफुल वुमेंन' बन रही है। इसका अर्थ यह है कि अब लगभग एक करोड़ 30 लाख परिवारों के अहम फैसलों में मुखिया होने के नाते उनकी भूमिका खास बनती जा रही है। इस योजना के तहत आवश्यक जानकारियों के सत्यापन के बाद परिवार की महिला मुखिया के नाम से बहु उद्देशीय भामाशाह परिवार कार्ड बनाया जाता है। जानकारों का मानना है कि देश में महिला और उनके वित्तीय सशक्तीकरण की सबसे बड़ी भामाशाह योजना से राजस्थान में­ महिला आत्मनिर्भरता के एक नये युग का सूत्रपात हो रहा है। मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे का यह 'ड्रीम प्रोजेक्ट' है जिसके तहत महिलाओं को परिवार की मुखिया बना सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत मिलने वाले नगद लाभ सीधे उनके बैंक खातों में जमा करवाने और गैर नगद लाभ दिलवाने की अभिनव पहल है। भामाशाह योजना शुरू होने से राजस्थान में युगान्तरकारी परिवर्तन होने जा रहा है। यह योजना देश में अपनी तरह की पहली सीधी लाभ हस्तान्तरण योजना है।

 

खास बात यह है कि भामाशाह योजना में राज्य के सभी परिवार अपना नामांकन करवा सकते हैं। भामाशाह योजना में नामांकन और भामाशाह कार्ड बनवाने को लेकर लोगों में अक्सर यह भ्रान्ति रहती है कि यह सुविधा केवल बीपीएल, बीपीएल महिला या किसी वर्ग विशेष के लिए है, जबकि वास्तविकता में इस योजना में राज्य के सभी परिवार अपना नामांकन करा सकते है। साथ ही यदि नामांकन में­ कोई त्रुटि अथवा अपूर्णता रह जाती है तो उसे संशोधित भी करवाया जा सकता है। इसी प्रकार भामाशाह कार्ड की यह विशेषता है कि यदि कार्ड गुम जाए अथवा चोरी हो जाता है तो भी कोई इसका दुरूपयोग नही कर पाएगा। चूंकि भामाशाह कार्ड बायोमैट्रिक पहचान सहित कोर बैंकिंग सुविधा युक्त है अतः यह पूरी तरह सुरक्षित है और लाभार्थी के खाते में जमा राशि उसके अलावा अन्य किसी के द्वारा निकालना संभव नही है। नामांकित परिवारों को संबंधित ग्राम पंचायत/शहरी निकाय के माध्यम से भामाशाह कार्ड

 

निःशुल्क देने का प्रावधान है। सूत्रो के अनुसार  ऐसे परिवार जिनका भामाशाह योजना में ­ नामांकन होना है अथवा जिन्हे भामाशाह कार्ड जारी नही हुआ है उन परिवारों अथवा सदस्यों को सभी राजकीय सेवाएं आगामी आदेश तक पूर्व की तरह ही मिलती रहें­गी।

 

राज्य सरकार द्वारा भामाशाह योजना में­ आवश्यक बदलाव कर इसे अधिक बड़े रूप में­ और अधिक व्यापक स्तर पर लागू किया जा रहा है और इसे प्रधानमंत्री की जन-धन योजना से भी जोड़ा गया है। भामाशाह योजना का उद्देश्य सभी राजकीय योजनाओं के नगद एवं गैर नगद लाभ सीधा पारदर्शी रुप से प्रत्येक लाभार्थी को पहुंचाना है। यह योजना के अंतर्गत राशन कार्ड, पेन्शन, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा के लिए छात्रावृत्ति पाने वाले लाभार्थियों को भी सम्मिलित किया जायेगा। यह योजना परिवार को आधार मानकर उनके वित्तीय समावेश के लक्ष्य को पूरा करती है और इसके तहत हर परिवार को भामाशाह कार्ड दिया जाएगा जो उनके बैंक खातों से जुड़े होंगे। यह बैंक खाता परिवार की मुखिया,जो कि महिला होगी के नाम से होगा और वह ही इस खाते की राशि को परिवार के उचित उपयोग में­ कर सकेगी। यह कार्ड बायो-मैट्रिक पहचान सहित कोर बैकिंग को सुनिश्चित करता है। इसके अन्तर्गत, प्रत्येक परिवार का सत्यापन किया जाएगा और पूरे राज्य का एक समग्र डेटाबेस बनाया जाएगा। इसके माध्यम से जाली कार्डों की भी जांच की जाएगी। विभिन्न विभागों द्वारा पात्राता के लिए सभी जनसांख्यिकी और सामाजिक मापदण्डों को भी इसमें सम्मिलित किया जाएगा।

 

आधिकारिक आंकड़ो के अनुसार अब तक राज्य के एक करोड़ 35 लाख परिवारों के 4 करोड़ 62 लाख व्यक्तियों का नामांकन हो चुका है एवं उन्हे बहुउद्देश्यीय भामाशाह परिवार पहचान कार्ड आवंटित किए जाने की प्रक्रिया चल रही है।  इस के तहत बैंक खातों में 4700 करोड़ रूपये का लाभ हस्तातंरित हो चुका है।

 

जयपुर जिले की ग्राम पंचायत जमवारगढ़ की बीपीएल परिवार की बुजुर्ग श्रीमती केसर देवी मानती है भामाशाह कार्ड ने उन्हें एक नई पहचान दी है। अब भामा शाह कार्ड उनके लिये जादुई चिराग बन गया है क्‍योंकि केवल भामाशाह कार्ड के जरिए ही विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्‍त किया जा सकता है। इसी तरह बीकानेर पंचायत समिति की बंबलू ग्राम पंचायत की बैसाखियों के सहारे चलने वाली नानू देवी  मानती है भामाशाह कार्ड उनकी लाठी है, भले ही वह चलने फिरने से लाचार हैं, लेकिन यह कार्ड उन्हें हर काम में सहारा देता है, चाहे वह पेंशन प्राप्‍त करना हो या कोई और कार्य। कार्ड के कारण उनमें नया आत्म विश्वास से भर गया है।

आधिकारिक जानकारी के अनुसार यह सुविधा अटल सेवा केन्द्र तथा ई-मित्र केन्द्रों पर स्थाई रूप से उपलब्ध है। जहां किसी परिवार के सभी सदस्य एक साथ जाकर आधार कार्ड व बैंक खाता संख्या के अलावा आवश्यक जानकारी देकर नामांकन करा सकते हैं। यदि किसी परिवार का बैंक खाता नही हो तो उसे भी ई-मित्र केन्द्र पर खुलवाने की सुविधा उपल्ब्ध है। ई-मित्र केन्द्र या भामाशाह योजना की वेबसाइट के माध्यम से ऑनलाइन नामांकन भी कराया जा सकता है। नामांकन और कार्ड से संबंधित समस्याओं व शिकायतों के समाधान के लिए भामाशाह का प्रबंधक जिला कलेक्टर और सांख्यिकी अधिकारियों को इसका अधिकारी और उपखंड अधिकारियों को नोडल अधिकारी बनाया गया है।

परिवार का कोई भी सदस्य अगर अपना व्यक्तिगत कार्ड बनवाने का इच्छुक हो तो वह 30 रुपये का शुल्क जमा करवाकर यह कार्ड बनवा सकता है। बीपीएल परिवार की महिला मुखिया को सरकार द्वारा भामाशाह कार्ड बनवाने पर दो किश्तों में 2 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जाती है जो महिला मुखिया के खाते में­ जमा करवा दी जाती है। इसकी पहली किश्त के रुप में­ एक हजार रुपये तथा छः महीने बाद दूसरी किश्त के रुप में लाभार्थी के खाते में एक हजार रुपये डालने का प्रावधान किया गया है।

भामाशाह योजना में पें­शन और छात्रावृति जैसे नगद लाभ तथा राशन सामग्री जैसे गैर नगद लाभों के वितरण की शुरूआत हो चुकी है। परिवारों के नामांकन के बाद सत्यापन और भामाशाह परिवार कार्ड बनने की प्रक्रिया के बीच पें­शन, छात्रावृति व राशन कार्ड से जुड़े महत्वपूर्ण विभागों के आंकड़ों के साथ भामाशाह के आंकड़ों का मिलान करते हुए इनमें एकरूपता लाई जा रही है। इससे परिवारों के बारे में दर्ज जानकारी से पें­शन, छात्रावृति व राशन सामग्री के पात्र वर्ग को 'नगद और गैर नगद लाभ’ का पारदर्शी तरीके से वितरण सुनिश्चित होगा। भविष्य में­ इस दूरदर्शी योजना में­ विभिन्न विभागों के अलग-अलग लाभ भी जोड़े जाएंगे। सूत्रो के अनुसार दरअसल इस योजना की परिकल्पना श्रीमती राजे ने अपने पिछले शासनकाल वर्ष 2008 में­ 'आधार कार्यक्रम' से बहुत पहले की थी।

मुख्यमंत्री श्रीमती राजे ने दिसम्बर, 2013 में पुनः मुख्यमंत्री बनने के बाद भामाशाह योजना का कार्यान्‍वयन फिर से शुरु करने का निर्णय लिया और इसी क्रम में­ भामाशाह योजना का पुनः शुभारंभ गत वर्ष 15 अगस्त को इतिहास पुरूष महाराणा प्रताप को अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले महान दानवीर भामाशाह की पवित्र धरा मेवाड़ के खुबसूरत शहर उदयपुर में­ हुआ। भामाशाह योजना के प्रभावी कार्यान्‍वयन के लिये भारत सरकार द्वारा वर्ष 2015-16 में राष्ट्रीय-ई-गवर्नेंस का "स्वर्ण पुरस्कार" राजस्थान को प्रदान किया गया था।  सूत्रों के अनुसार अब इस योजना के लाभ व्यापक पैमाने पर नजर आने लगा है।

 

विशेष लेख अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2017

प्राचीन काल से ही भारतीय इतिहास में महिलाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं। हमें पता है कि वैदिक या उपनिषद् युग में मैत्रेयी, गार्गी और अन्य महिलाओं ने ब्रह्म के ऊपर विचार करने की योग्यता के आधार पर ऋषियों का स्थान प्राप्त किया था। हजारों ब्राह्मणों की उपस्थिति में विदुषी गार्गी ने ब्रह्म के ऊपर शास्त्रार्थ करने की चुनौती याज्ञवल्क्य को दी थी।

 

स्वतंत्रता पूर्व समय में महिलाओं ने शिक्षा और सामाजिक उन्नति के उद्देश्य के लिए नेतृत्व किया था। वर्ष 1950 में भारत दुनिया के ऐसे कुछ देशों में गिना जाता था जिन्होंने अपने नागरिकों को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार प्रदान किया था। महिलाओं ने युवा भारत के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। और, आज हम देख रहे हैं कि महिलाएं सरकार, व्यापार, खेल, सशस्त्र बलों और यहां तक कि वास्तविक रॉकेट विज्ञान में भी अग्रणी भूमिका निभा रही हैं। महिलाओं ने समस्त मानक तोड़ दिये हैं और प्रतिदिन नए-नए मानक स्थापित कर रही हैं।

 

नारी शक्ति पुरस्कार 1999 में गठित किया गया था ताकि उन महिलाओं का सम्मान किया जा सके जिन्होंने उम्मीदों से बढ़कर काम किया, बंधे-बंधाये ढर्रे को चुनौती दी और महिला सशक्तिकरण में अविस्मरणीय योगदान किया। भारत सरकार ये पुरस्कार उन व्यक्तियों और संस्थानों को प्रदान करती है जिन्होंने महिलाओँ के लिए अभूतपूर्व सेवा की हो। महिला विकास और उन्नयन के क्षेत्र में शानदार योगदान करने के लिए यह पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। इस वर्ष नारी शक्ति पुरस्कार विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाली महिलाओं और संस्थानों को दिया जा रहा है। उल्लेखनीय है इस संबंध में बहुत सारे आवेदन प्राप्त हुए थे, जिसके मद्देनजर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने उन उम्मीदवारों का चयन किया है जो सामाजिक उद्यमिता, कला, बागवानी, योग, पर्यावरण संरक्षण, पत्रकारिता, नृत्य, सामाजिक कार्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे विभिन्न क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभाई है। महिलाओं ने इन सभी क्षेत्रों में राष्ट्रीय और अंतर्राषट्रीय स्तर पर अपनी छाप छोड़ी है तथा पूरी दुनिया के सामने यह साबित कर दिया है कि सफलता के लिए लैंगिक सीमा का कोई अस्तित्व नहीं होता। समस्त पुरस्कृत लोग सामाजिक उद्यमिता निर्माण, जैविक खपत को प्रोत्साहन देने और सतत पर्यावरण के निर्माण जैसे नए और उभरते हुए क्षेत्रों में योगदान कर रहे हैं। यह देखना बहुत उत्साहवर्धक है कि इन सभी क्षेत्रों में महिलाएं नेतृत्व कर रही हैं, जिससे भावी विकास कि रूपरेखा तय होगी।

 

इन पुरस्‍कार विजेताओं ने अंतरिक्ष अनुसंधान, रेलवे, मोटरसाइक्लिंग और पवर्तारोहण जैसे क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराकर महिलाओं से जुड़ी रूढ़ीवादी सोच को चुनौती दी है। इन्‍होंने न केवल चुनौती दी है बल्कि उन क्षेत्रों में उत्‍कृष्‍टता प्राप्ति की है जहां इतिहास में कभी महिलाओं की भागीदारी नहीं देखी गई। इसरो के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों, पहली डीजल ट्रेन चालक सुश्री मुमताज काजी, मोटरसाइक्लिस्‍ट सुश्री पल्‍लवी फौजदार और पर्वतारोही सुश्री सुनीता चोकेन ऐसे युवा भारतीयों के लिये एक उदाहरण हैं जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। ये विजेता बदलते वैश्विक भारत की एक अलग तस्‍वीर पेश करते हैं।

सरकार ने उन महिलाओं और संस्‍थानों को सम्‍मानित किया है जो कमजोर और पीडि़त महिलाओं के लिए कार्य कर रहे है और जिन्‍हें हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा देश के सुदूरवर्ती इलाकों में लिंग अनुपात में सुधार के लिए महिलाओं को आर्थिक स्‍वतंत्रता के प्रति प्रोत्‍साहित करने, महिला किसानों के लिए विकास कार्य करने तथा वास्‍तविक विकास के लिए प्रयास किये जा रहे हैं। छांव फाउण्‍डेशन और शिक्षित रोजगार केन्‍द्र प्रबंधक समिति, साधना महिला संघ जैसे संस्‍थानों तथा डॉ. कल्‍पना शंकर ने अपनी संस्‍था ‘हैंड इन हैंड’ के जरिये समाज में महिलाओं की उन्‍नति के लिए जमीनी स्‍तर पर कार्य किया है।

इन पुरस्‍कार विजेताओं ने यह साबित किया है कि नये विचार अक्‍सर स्थितिजन्‍य बाधाओं को पार कर सकते हैं। वित्तीय अवसरों की कमी का सामना कर रही महिलाओं ने धन जुटाने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग किया है। प्राकृतिक आपदाओं के बाद उन्‍हें स्‍थानीय लोगों के पुनर्वास के लिए अनूठे तरीके मिल गये हैं। आर्थिक अवसरों की कमी के साथ महिलाओं ने डिजिटल अर्थव्‍यवस्‍था में प्रवेश किया है। पुरस्‍कार विजेताओं में से एक ‘शरन’ की स्‍थापक डॉ. नन्‍दि‍ता शाह का उद्देश्‍य मधुमेह मुक्‍त भारत बनाना है। एक टैक्‍सटाइल डिजाइनर सुश्री कल्‍याणी प्रमोद बालाकृष्‍णन ने पारंपरिक शिल्‍प को बढ़ावा देकर गरीब बुनकरों की मदद की है।

सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों ने अपने-अपने क्षेत्रों में जीवन में सुधार लाने के लिए दशकों तक काम किया है। लोगों ने अपने घरों के आराम को छोड़कर लोगों के कल्याण के लिए संघर्ष किया है और उनका साथ दिया है। परिवर्तन धीरे-धीरे आता है लेकिन इन महिलाओं और संस्थानों ने यह साबित कर दिया है कि संगठित प्रयत्नों से सकारात्मक बदलाव आता है। इन लाभार्थियों ने यह साबित किया है कि कोई भी व्यक्ति अगर ठान ले तो कुछ भी संभव है। सुश्री टीयाशा अद्या और सुश्री बानो हरालु ने मत्स्य विडाल के शिकार पर रोक लगाने के लिए संघर्ष किया। सुश्री वी.नानाम्ल ने योग की शिक्षा देने के लिए बेहतरीन योगदान दिया। आज उनके विद्यार्थी देशभर में योग की शिक्षा देने के कार्य में जुटे हुए हैं।

इस वर्ष के नारी शक्ति पुरस्कार ने हमारे देश के एक अलग स्तर को प्रमाणित किया है ये पुरस्कार पाने वाली जीवट महिलाएं अपने समर्पण, विश्वास और प्रेरणा के लिए मिशाल हैं। इन महिलाओँ ने यह साबित किया है कि यदि कोई व्यक्ति सही दिशा में कार्य करे तो लाखों लोगों के जीवन में सुधार लाया जा सकता है। आइए हम लोगों को प्रेरित करें कि वे श्रेष्ठ भारत के लिए जनकल्याण के कार्य जारी रखें।

 -लेखिका महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की सचिव हैं, लेखक में प्रस्तुत उनके विचार निजी हैं

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