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updated 5:57 PM UTC, Feb 23, 2017
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अगस्ता का राज खोलेंगे त्यागी ?

क्या पूर्व वायुसेना प्रमुख एसपी. त्यागी ने मुखबिर बनने का मन बना लिया है? सवाल चौंकाने वाला है, लेकिन चर्चा यही चल रही है। कहा जा रहा है कि इसलिए कांग्रेस आक्रामक हो गई है। उसने कोई छह महीने से धूल खा रहे सहारा डायरी के कागजों को झाड़-पोंछ कर बाहर निकाल लिया है। नौ दिसंबर से पहले कांग्रेस को उन कागजों पर बात करना सही नहीं लगता था। लेकिन जैसे ही एसपी.त्यागी को सीबीआई गिरफ्तार करती है, वैसे ही सहारा डायरी के चंद टुकड़ों का महत्व कांग्रेस के लिए बढ़ जाता है। राजनीतिक गलियारों में बैठे लोगों का कहना है कि कांग्रेस उन टुकड़ों के जरिए सरकार को डराने की कोशिश कर रही है। क्या बात बनेगी? उन लोगों की माने तो सरकार कोशिश में है कि पूर्व वायुसेना प्रमुख मुखबिर बन जाएं। अगर ऐसा हो जाता है तो असली दोषी नहीं बच पाएगा। माना जा रहा है कि अगस्ता का मामला बोफोर्स से अलग है। वजह इसमें इटली कोर्ट का निर्णय भीबतौर सबूत पेश किया जा सकता है। उसमें ‘सिगनोरिया’, ‘एपी’ जैसे कई नामों का जिक्र है। उसे डी-कोड़ करने का प्रयास हो रहा है। सूत्रों की माने तो यदि त्यागी का सहयोग मिल जाए तो घोटाले के सूत्रधार तक पहुंचा जा सकता है। चर्चा है कि इसी वजह से कांग्रेसी खेमे में खलबली मची हुई है। कांग्रेस में इस तरह के हालात 2 मई, 2016 से बने हुए हैं। इसी दिन सीबीआई ने एसपी.त्यागी को तलब किया था। हालांकि ऐसा नहीं है कि उस दिन सीबीआई ने त्यागी को पहली बार बुलाया था। उससे पहले भीसीबीआई एसपी.त्यागी को कई बार बुला चुकी है। वे हर बार गए, लेकिन तब कांग्रेस में इस तरह की हलचल नहीं हुई थी। फिर दो मई को ऐसा क्या हो गया था कि दरबारी परेशान हो गए थे। उस दिन जहां एक ओर त्यागी सीबीआई के सवालों का जवाब दे रहे थे, वहीं दूसरी ओर कांग्रेसियों के पसीने छूट रहे थे। पार्टी के लोग हरकत में आ गए थे। सूत्रों की माने तो सब एसपी.त्यागी का बयान हासिल करने के जुगाड़ में लगे थे। खोजबीन चल रही थी कि किससे संपर्क किया जाए? अचानक सीबीआई के एक सेवानिवृत्त इंस्पेक्टर के बारे में जानकारी मिलती है।

विश्वस्त सूत्र के मुताबिक कांग्रेस के एक दिग्गज नेता उस अधिकारी के घर पहुंच गए। वे वहां दो घंटे तक रहे। उसे हर तरह से समझाने-बुझाने की कोशिश की गई। वे चाहते थे कि वह अधिकारी किसी तरह एसपी.त्यागी के बयान की कॉपी मुहैया करा दे। उसने सहजता से कहा कि यह मेरे बस की बात नहीं है। उसके इनकार करने के बाद भीउस कांग्रेसी ने हार नहीं मानी। वे उसे राजी करने में लगे रहे। लेकिन वह तैयार नहीं हुआ। उसी दौरान कांग्रेसी नेता के पास आलाकमान से फोन आता है। वह आलाकमान को यथास्थिति से अवगत कराता है। उसके फोन पर मौजूद एसपीजी सुरक्षाधारी ने सीबीआई के सेवानिवृत्त अधिकारी से बात की। उन्होंने उससे मिलने की इच्छा जाहिर की। सूत्रों के मुताबिक  सेवानिवृत्त अधिकारी ने मिलने से इनकार कर दिया। उसने कहा ‘‘आप एसपीजी सुरक्षाधारी हैं। आपके आने पर बिना वजह बखेड़ा खड़ा हो जाएगा। वैसे भीमैं आपका काम नहीं कर सकता।’’ अगले दिन सुबह उसके घर कांग्रेस के नजदीकी रहे सीबीआई के एक पूर्व निदेशक आए। उन्होंने भीमान-मुनव्वल की, पर बात नहीं बनी।  सवाल यह है कि एसपी.त्यागी ऐसा कौन सा राज जानते हंै? जिसके खुल जाने का डर कांग्रेसियों को सता रहा है। कहीं सत्ता के गलियारों में चल रही सुगबुगाहट सच तो नहीं है। क्या वाकई कांग्रेस आलाकमान अगस्ता घोटाले में शामिल हैं? यह ऐसा सवाल है जो हमेशा उठता है। कोई भीरक्षा घोटाला हो, संदेह के घेरे में कांग्रेस आलाकमान होता है। लेकिन गाज हमेशा प्यादों पर गिरती है। दिलचस्प बात यह है कि प्यादे हमेशा ‘आलाकमान’ के करीबी होते हैं। क्या यह महज इत्तेफाक है?

जो भीहो पूर्व राष्ट्रपति आर.वेंकटरमण ने अपनी आत्मकथा ‘माई प्रेसिडेंशियल इयर्स’ में बहुत सनसनीखेज खुलासा किया है। माना जाता है कि उस किताब में उन्होंने जो लिखा है उसके बाद दस जनपथ से उनका संबंध खराब हो गया था। वे लिखते हैं कि ‘‘एक दिन घनश्याम दास बिड़ला उनसे मिलने आए। उन्होंने आर. वेंकटरमण से पूछा आज कल कांग्रेसी हमसे चंदा नहीं मांगते। लगता है रक्षा सौदों से ही काम चल जा रहा है।’’  पूर्व वायुसेना प्रमुख एवाई.टिपनिस ने अपने एक लेख में उसी बात को आगे बढ़ाया है। उनके मुताबिक यह खुला रहस्य है कि रक्षा सौदे सत्ताधारी दल के लिए आय का बड़ा साधन होता है। जितने का सौदा होता है, उसका एक हिस्सा बतौर दलाली सत्ताधारी दल को मिलता है। एवाई.टिपनिस आगे लिखते है कि  यह काम राजनेता खुद नहीं करते। उसके लिए वे किसी और को चुनते हंै, ताकि ठगी के धंधे पर पर्दा डाला जा सके। अगर उनके दावे को सही माना जाए तो क्वात्रोची से लेकर अभिषेकवर्मा और एसपी.त्यागी तक महज मुखौटा हैं। संभवभीहै। इसकी वाजिब वजह है। बात चाहे बोफोर्स घोटाले के क्वात्रोची की हो या फिर अगस्ता घोटाले के आरोपी क्रिश्चियन मिशेल की, सब की पहुंच कांग्रेस आलाकमान तक थी। कमोवेश यही बात अभिषेकवर्मा पर भीलागू होती है। क्वात्रोची के बारे में काफी लिखा जा चुका है। कांग्रेस आलाकमान से उनकी नजदीकी की चर्चा भीखूब रही है। जहां तक बात अगस्ता घोटाले के आरोपी क्रिश्चियन मिशेल की है तो उसका भीसंबंध कांग्रेस के उस रसूखदार गलियारे में रहा है। क्रिश्चियन को यह संबंध विरासत में मिला था। इटालियन अखबार 'लेट्टेरा 43' की माने तो मिशेल के पिता बोल्फगैंग रिचर्ड मिशेल का भारतके रक्षा सौदों में दखल रहा है। यह सिलसिला 1980 के दशक से बना हुआ है। 1984 में जो वेस्टलैंड चॉपर सौदा हुआ था, उसमें रिचर्ड मिशेल ने मुख्य भूमिका निभाई थी। उस समय राजीव गांधी प्रधानमंत्री हुआ करते थे। कहा जाता है की ब्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री मारगेट थैचर की भीइस सौदे में दिलचस्पी थी। चॉपर खरीदी गई। उससे इतनी दुर्घटनाएं हुई कि पायलट उसमें बैठने से खौफ खाते थे। वे उसे उड़ाने से परहेज करते थे। बाद में उसे सेवा से हटा लिया गया था। उस दौर में रिचर्ड मिशेल ने कांग्रेस आलाकमान से जो संबंध बनाया था उसे क्रिश्चियन  मिशेल ने संजोए रखा। सूत्र बताते हैं कि आलाकमान जब लंदन जाती हैं तो मिशेल के आवास पर ही ठहरती हैं। खुफिया एजेंसी रॉ के पूर्व अधिकारी की माने तो आलाकमान का रक्षा दलालों के साथ पुराना संबंध है। लिहाजा जब कोई रक्षा सौदा होता है तो बिचौलियों को काफी सुविधा होती है। मिशेल भीएक बिचौलिया है। उसका भीअपने पिता रिचर्ड मिशेल की तरह भारतके रक्षा सौदे में हस्तक्षेप है। वह सिर्फ चॉपर समझौते में बिचौलिया नहीं था, बल्कि 2000 से लेकर 2014 तक जितने बड़े रक्षा समझौते हुए हैं, उसमें क्रिश्चियन मिशेल शामिल रहा है। 2000 में जो मिराज विमान समझौता फ्रांस के साथ हुआ था, उसमें भीइसकी मुख्य भूमिकाथी। यह बात 2004 में सामने आई। हुआ यह कि क्रिश्चियन  ने डसाल्ट कंपनी पर मुकदमा कर दिया। उसका दावा था कि उसने ही कंपनी के मिराज विमान का समझौता भारतसे कराया था। उसके बदले जो कमीशन बनता है, कंपनी ने नहीं दिया। हालांकि, अदालत ने क्रिश्चियन के मुकदमे को खारिज कर दिया था। बाद में दोनों ने कोर्ट के बाहर समझौता कर लिया। 'लेट्टेरा 43' ने राफेल सौदे में क्रिश्चियन  मिशेल की भूमिकाका जिक्र किया है। अखबार का दावा है कि दुनिया के सबसे बड़े रक्षा सौदे को क्रिश्चियन  मिशेल ने ही अंजाम तक पहुंचाया।

कमोवेश यही बात चॉपर समझौते में देखने के मिल रही है। जांच एजेंसियों ने छानबीन में पाया है कि मिशेल मार्च.2005 में भारतआया था। यही वह समय था जब संप्रग सरकार अगस्ता वेस्टलैंड का पक्ष लेने के लिए नियम-कानून में बदलाव कर रही थी। संसद में मनोहर पर्रिकर ने कहा कि मार्च 2005 में वीवीआईपी हेलीकाप्टर को अगस्ता वेस्टलैंड के पक्ष में करने के लिए कई बदलाव किए गए। जांच एजेंसी की माने तो मिशेल की भारतमें कई बेनामी संपत्तियां हैं। चॉपर समझौते के लिए दी जाने वाली दलाली का कुछ हिस्सा मिशेल की कंपनियों के जरिए भीआया था। उन दो कंपनियां की जांच एजेंसी ने पहचान की है। इनमें एक का नाम ‘मीडिया एक्जिम प्राइवेट लिमिटेड’ है। इसे 2005 में मिशेल ने स्थापित किया। यह अगस्ता वेस्टलैंड के लिए दिल्ली, मुंबई और बंैगलुरु में मीडिया प्रबंधन करने का काम करती थी। दूसरी कंपनी सिंगापुर स्थित 'मूर बैंक ईस्ट इंडिया' है। इसका काम अगस्ता वेस्टलैंड को सलाह देना था, ताकि भारतके साथ समझौता हो सके। ये दोनों कंपनियां भारतमें मौजूद अन्य कंपनी के जरिए दलाली का पैसा बांटने का काम किया करती थी।  जांच एजेंसियों की माने तो अगस्ता समझौता कराने के लिए मिशेल सकैड़ों बार भारतआया था। लेकिन एक व्यक्ति ऐसा भीथा जो भारतमें है और तिहाड़ में उसकी खातिरदारी हो रही है। हालांकि वह तिहाड़ अगस्ता मामले में नहीं गया है, किन्तु अगस्ता वेस्टलैंड मामले से वह भीजुड़ा है। उसका नाम अभिषेकवर्मा है। उनके पिता श्रीकांत वर्मा इंदिरा गांधी के अच्छे मित्र हुआ करते थे। वे कांग्रेस के प्रवक्ता भीरह चुके हैं। उनकी पत्नी और अभिषेककी मां वीना वर्मा 14 साल कांग्रेस की सांसद रह चुकी है। खुद अभिषेकने भीपार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा। वह कांग्रेस के लिए प्रचार भीकर चुके हैं। मगर यह आधा परिचय नहीं है। उनका असल धंधा दलाली का है। उनकी गिनती बड़े रक्षा दलालों में होती है। फिलहाल वे ‘नेवी वॉर रूम लीक’ मामले में आरोपी हैं और तिहाड़ में बंद हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने नेवी से जुड़ी कई संवेदनशील जानकारी लीक की है। दावा यह भीकिया जाता है कि अभिषेकस्कॉर्पिन पनडुब्बी बनाने वाली थेल्स डिफेंस कंपनी से बतौर कांग्रेस के कार्यकर्ता मिले थे। इस सौदे में दलाली के रूप उन्हें 175 मिलियन डॉलर मिला था। यह आरोप किसी और ने नहीं बल्कि भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण अडवाणी ने लगाया था। 2012 में तो अभिषेकवर्मा के खिलाफ उनके ही सहयोगी सी.अडमांड एलेन ने 118 पेज का दस्तावेज जांच एजेसियों और संबंधित मंत्रालयों  को दिया था। उसी के आधार पर अभिषेकवर्मा को दोबारा गिफ्तार किया गया था। उसमें जो दस्तावेज लगे हैं उसे जांच एजंसियों ने सही माना था। उनमें जो लिखा है वह तत्कालीन सरकार और कांग्रेस आलाकमान को कटघरे में खड़ा करता है। उन दस्तावेजों से यही बात निकलती है कि अभिषेकवर्मा तत्कालीन सरकार में बैठे लोगों की तरफ से दलाली का धंधा चलाते थे।  शुरुआत ईसीआई टेलीकॉम लि. से करते हैं। दिसंबर 2010 में भारतसरकार ने इस पर 100 मिलियन डॉलर का जुर्माना ठोक दिया था। इसे लेकर ईसीआई टेलीकॉम लि. बेहद परेशान था। उसने गनटोन इंडिया प्राइवेट लि. से संपर्क किया। यह गनटोन प्राइवेट लि. की सब्सिडरी है। इस कंपनी के निदेशक सी. एडमांड एलेन हैं। माना जाता है कि यह कंपनी अभिषेकवर्मा की है, जिसमें एडमांड एलेन महज मुखौटा है। खैर, जो भीहो ईसीआई टेलीकॉम लि. ने गनटोन इंडिया से कहा कि अगर वह जुर्माने को समाप्त करा दे तो कंपनी को बतौर दलाली एक मिलियन डॉलर मिलेगा। इस बाबत दोनों कंपनियों के बीच समझौता हुआ। यह तब हुआ जब इजराइल सरकार की गुजारिश पर भीभारतसरकार ईसीआई टेलीकॉम लि. से जुर्माना हटाने के लिए तैयार नहीं हुई। मामले की जानकारी एडमांड ने तत्कालीन वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा को दी। लेकिन उन्होंने इस पर कोई कार्रवाई करना उचित नहीं समझा। वह तो हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे। यही काम ईमनादारी का ढोल पीटने वाले तत्कालीन रक्षा मंत्री एके.एंटनी ने भीकिया।

एलमांड एलेन ने 28 मार्च 2012 को एंटनी के पास शिकायत भेजीथी। उसमें उसने सनसनीखेज खुलासा किया था। उसमें दावा किया गया था कि सेना के लिए जिस कंपनी से बंदूक खरीदी जा रही है उस कंपनी ने कांटैक्ट हासिल करने के लिए गनटोन लि. को 10 प्रतिशत की दलाली दी थी। बावजूद इसके सभीखामोश रहे। हद तो तब हो गई जब गनटोन लि. से अगस्ता वेस्टलैंड ने चॉपर का कांटैक्ट दिलाने के लिए संपर्क किया। दोनों के बीच समझौता हुआ। दलाली की रकम तय हुई। सवाल यह है कि अगस्ता ने गनटोन लि. से संपर्क क्यों किया? ऐसे बहुत से सवाल हैं, जिनका जवाब जांच पूरी होने के बाद सामने आए। लेकिन इस बीच अगस्ता घोटाले के आरोपी पूर्व वायुसेना प्रमुख एसपी.त्यागी ने सीबीआई से जो सवाल किया है उसने सभीको चौका दिया है। उन्होंने सीबीआई से पूछा है कि मुझे तीन साल बाद क्यों गिरफ्तार किया गया? मेरे खिलाफ एफआईआर 2013 में ही दर्ज किया गया था। तब से सीबीआई क्या कर रही थी? कानून को जाने-समझने वाले कहते हैं कि पूर्व वायुसेना प्रमुख ने ठीक सवाल पूछा है। उन लोगों की माने तो सीबीआई किसी भीमामले में पहले प्राथमिकी दर्ज करती है। फिर आरोपों की गहन जांच-पड़ताल करती है। जब उसे आरोपी के खिलाफ पुख्ता सबूत मिलते हैं तब एजेंसी एफआईआर करती है।

सवाल यह है कि अगर अगस्ता जांच में भीसीबीआई ने उसी प्रक्रिया का पालन किया तो उस समय एसपी.त्यागी को हिरासत में क्यों नहीं लिया गया? कहीं ऐसा तो नहीं कि अगस्ता घोटाले की आंच से कांग्रेस आलाकमान को बचाने के लिए संप्रग सरकार ने एसपी.त्यागी को फंसा दिया हो। पूर्व वायुसेना प्रमुख एवाई.टिपनिस का तो यही दावा है। वे लिखते है- ‘‘एसपी.त्यागी को साजिश के तहत फंसाया गया है। अगर ऐसा नहीं होता तो तत्कालीन रक्षा सचिव, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार और प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव को पूछताछ के लिए बुलाया जाता है।’’ लेकिन ऐसा नहीं किया गया। वह भीतब जबकि एसपी.त्यागी ने अपने बयान में कहा है कि वीवीआईपी चॉपर की निविदा में तकनीकी बदलाव करने का आदेश प्रधानमंत्री कार्यालय से आया था।

 

पूर्व वायुसेना प्रमुख एवाई.टिपनिस के मुताबिक जिसे भीसरकारी कामकाज के बारे में थोड़ी सी जानकारी होगी उसे मालूम होगा कि किसी भीतरह का बदलाव रक्षा मंत्रालय की अनुमति के बिना संभवनहीं है। कोई भीसेना प्रमुख अपनी अनुशंसा मंत्रालय को भेज सकता है। उसे मानना या न मानना मंत्रालय का अधिकार है। एवाई.टिपनिस कहते हंै कि अगर वीवीआईपी चॉपर की खरीद में किसी भीतरह की गड़बड़ी हुई है तो उसके लिए वायुसेना प्रमुख और रक्षा मंत्रालय दोनों जिम्मेदार है।

 

--जितेन्द्र चतुर्वेदी (यथाावत से साभार)

देश की सीमाओं पर मोदी सरकार बनाएगी भारतमाला

दिल्ली
अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वर्णिम चतुर्भुज बनाने का कदम बढ़ाया था। नरेंद्र मोदी भारतमाला बनाना चाहते हैं। भारतमाला मोदी सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना का नाम है। इसके तहत भारत के पूरब से पश्चिम तक यानी मिजोरम से गुजरात तक सीमावर्ती इलाकों में सड़क बनाई जाएगी। इस पर करीब 14,000 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इस सड़क को महाराष्ट्र से पश्चिम बंगाल तक तटीय राज्यों में एक रोड नेटवर्क से जोड़ा जाएगा।

केंद्रीय सड़क सचिव विजय छिब्बर ने ईटी को बताया, 'हमारी योजना अपनी सीमाओं, खासतौर से उत्तरी सीमाओं पर सड़कें बनाने की है। हमने इसे भारतमाला नाम दिया है।' छिब्बर ने बताया कि सभी जरूरी मंजूरियां मिल जाने पर इस साल काम शुरू हो सकता है।

मोदी का इस प्रोजेक्ट पर खास जोर है, लिहाजा मिनिस्ट्री को उम्मीद है कि अगले कुछ महीनों में एक विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार कर ली जाएगी। अधिकारियों ने बताया कि सरकार को पूरब से पश्चिम तक भारत की पूरी सीमा को कवर करने के लिए लगभग 5,300 किमी़ की नई सड़कें बनानी होंगी और इस पर 12,000-14,000 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। सरकार को पांच साल में यह प्रोजेक्ट पूरा करने की उम्मीद है।


प्रोजेक्ट पर काम गुजरात और राजस्थान से शुरू होगा। फिर पंजाब और जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड का नंबर आएगा। इसके बाद उत्तर प्रदेश और बिहार के तराई क्षेत्र में काम पूरा करने के बाद सिक्किम, असम, अरुणाचल प्रदेश से होते हुए मणिपुर और मिजोरम में भारत-म्यांमार बॉर्डर तक सड़कें बनाई जाएंगी।

भारतमाला प्लान में रणनीतिक पहलू भी है। इससे सीमावर्ती इलाकों से बेहतर कनेक्टिविटी संभव होगी, जिनके एक बड़े हिस्से के उस पर चीन का शानदार रोड इंफ्रास्ट्रक्चर है। सड़कें बेहतर होने पर मिलिट्री ट्रांसपोर्ट बेहतर हो सकेगा। अधिकारियों ने कहा कि ये सड़कें बन जाने पर बॉर्डर ट्रेड भी बढ़ेगा।

साथ ही, कई राज्यों में बेहतर सड़कों से आर्थिक गतिविधियों में तेजी आएगी। इस योजना में सड़कों का ज्यादातर हिस्सा पहाड़ी राज्यों में बनेगा, जहां कनेक्टिविटी और इकनॉमिक ऐक्टिविटी का मामला कमजोर है।

रोड्स डिपार्टमेंट का कहना है कि इसमें फंडिंग की दिक्कत नहीं आएगी क्योंकि उसे हर साल कम से कम एक लाख करोड़ रुपये खर्च करने का अधिकार दिया गया है। विभाग का हालांकि मानना है कि लैंड एक्विजिशन और पर्यावरण से जुड़ी मंजूरियां हासिल करना चुनौती भरा होगा।

रोड सेक्रेटरी ने कहा कि भारतमाला एक तरह से एक और बड़े प्रोजेक्ट सागरमाला को कनेक्ट करेगा। सागरमाला के तहत बंदरगाहों और तटीय इलाकों को रेल और रोड नेटवर्क के जरिये देश के भीतरी क्षेत्रों से जोड़ने का प्लान है

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