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updated 9:21 AM UTC, Oct 17, 2017
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कांग्रेस से भी जहरीली है भाजपा हुकूमत- अन्ना हजारे

आंदोलन करने को कहकर बार-बार पलटी मारने वाले विख्यात समाजसेवी अन्ना हजारे एक बार फिर आंदोलन की हूंकार भर रहे हैं। कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करने वाले अन्ना आजकल उनसे खासे नाराज हैं। मोदी को उन्होंने अब सबसे नाकारा पीएम तक कह डाला है जिसकी मुख्य वजह अन्ना के खत का पीएम का जबाव न देना। लोकपाल के मुद्दे पर वह पीएम को लगातार खत लिख रहे हैं, पर प्रधानमंत्री उनके किसी खत का रिप्लाई नहीे दे रहे हैं। इसलिए अन्ना ने अब 2011 जैसे आंदोलन की फिर से चेतावनी दी। हालांकि इससे पहले भी वह कई बार आंदोलन करने की बात कह चुके हैं जो बाद में सिर्फ हवा-हवाई साबित हुईं। लेकिन इस बार उन्होंने महात्मा गांधी की समाधी पर जाकर वहां से कसम खाकर आंदोलन करने की बात कही। इस मौके पर उनसे नमामि भारत के एशोसिएट एडीटर रमेश ठाकुर ने उनसे विस्तृत बातचीत की पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश।

 

आंदोलन करूंगा, ये कहकर आप खलबली मचा देते हो, और चुपचाप शांत बैठ जाते हो। ऐसे तो लोगों में आपकी गंभीरता कम हो जाएगी। क्या इस बार पक्का आंदोलन करोगे?

शत् प्रतिशत होगा इस बार आंदोलन। मैं पलटी नहीं मारता था, नेता चालाकी से मुझे सभी मुद्दे पूरा करने को कहकर शांत करा देते थे। मुझे जनता में झूठा बनाने की ये उनकी सोची समझी तरकीब थी। जिस उम्मीद के साथ देश की जनता ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर चुना था। पर, किसी उम्मीद वह खरा नहीं उतर सके। मौजूदा अर्थव्यवस्था डामाडोल हो गई है। कामधंधे चैपट हो गए हैं। सरकारी कार्यालयों में बिना रिश्वत के काम नहीं होता। नोटबंदी के बाद मैंने सरकार के कई मंत्रियों से पूछा की इससे विदेशों में जमा कितना काला धन भारत आया। तो कोई जबाव नहीं देता। ऐसे कई गंभीर मुद्दे हैं जिनका मैं जवाब मांगता रहा हूं, लेकिन कोई जबाव देने को राजी नहीं। शायद प्रधानमंत्री ने मुझसे बात करने के लिए सभी को मना कर दिया है। पिछले 6-7 महीनों में कई बार मोदी को खत भेजे हैं किसी का उन्होंने जबाव देना उचित नहीं समझा। मैं पूछना चाहता हूं आखिर क्यों नहीं उत्तर देते हो। मैं अपने लिए थोड़ी न कुछ मांग रहा हूं। जीएसटी लगाने के बाद व्यापारियों को कितनी तखलीफी सहनी पड़ रही हैं इसका अंदाजा भी नहीं है प्रधानमंत्री को। रोजाना व्यापारी मुझसे मिलते हैं और कहते हैं कि हमारी आवाज बुलंद उठाओ। क्योंकि उनकी भी बात सरकार नहीं सुनती।

 

आंदोलन करने की कोई तारीख तय की है ?

 

इस साल दिसंबर के अंत में या शुरूआती साल के पहले महीने में मैं फिर से आपको रामलीला मैदान बैठा दिखाई दूंगा। और मुझे यह भी पता है इस बार आंदोलन को असफल बनाने के पूरे प्रयास किए जाएंगे। रामलीला में लोगों को पहुंचने से भी रोका जाएगा। मेरे पास इस तरह की खबरें आ रही हैं। मौजूदा सरकार कांग्रेस सरकार से जहरीली दिख रही है। कांग्रेस सरकार में कम से कम बात सुनी तो जाती थी, वह अलग बात है कि उस पर अमल नहीं होता था। लेकिन मोदी सरकारअपने घमंड में इतनी चूर हो गई है। किसी से बात करना भी उचित नहीं समझती।

2011 के आंदोलन में आपको अभूतपूर्व जनसमर्थन मिला था जिसमें भाजपा-आरएसएस का भी समर्थन शामिल था। आपको उम्मीद है आगे भी ऐसा ही समर्थन मिलेगा?

 

मैं आज भी पहले जैसा ही फकीर हूं। उस वक्त मेरे साथ जो लोग थे उनकी मंशा कुछ और थी। वे सभी आंदोलन की आड़ में अपना उल्लू सीधा करना चाहते थे, वैसा किया भी। मुझे दिखावे की भीड़ नहीं चाहिए। दूसरे आंदोलन के लिए मुझे निस्वार्थ आंदोलनकारियों की आवश्वकता होगी। और वह लोग मेरे साथ आज भी हैं। देश के भीतर जो समस्या 2011 में थी वह सभी ज्यों की त्यों हैं। कोई फर्क या सुधार नहीं हुआ। लोगों के भीतर फिर वैसी ही नाराजगी है। अब लोगों में मोदी के प्रति प्यार नहीं, बल्कि डर घुसा है। उनके मंत्रियों की भी कोई मजाल नहीं कि उनके फैसले पर उंगली उठा सके। जिसने ऐसा किया उसका हाल हम आप देख ही रहे हैं।

 

आपकी लोकपाल की मांग को सरकार ने तकरीब नकार दिया है। इसकी कोई विशेष वजह?

 

ठंडे बस्ते में पड़ा है लोकपाल का मसौदा। छह बार संसद के पटल आ चुका है लेकिन उसे लागू करने में सरकार के हाथ थर्रा रहे हैं। उनको पता है लोकपाल को लागू करने का मतलब उनके खुद के गले में फांसी का फंदा डालना होगा। सरकार के आधे मंत्री जेल में होंगे। बाकि दलों के नेताओं की तो बात ही न करो। लोकपाल के लिए 2012 में हमने जो मसौदा तैयार करके भेजा था, उसे पूरा बदल दिया गया है। अब जो है वह कूड़ा है। जिन राज्यों में लोकायुक्त

नियुक्त किए गए हैं वह सफेद हाथी के सिवाए कुछ नहीं हैं। मुझे कोई बताए कि मोदी के आने के बाद उन्होंने अपनी कार्रवाई से किसी नेता को जेल भेजा हो। सभी लोकायुक्त सरकारों के हिस्सा बन गए हैं।

 

आंदोलन पार्ट-2 में क्या आप केजरीवाल या उनके साथियों को शामिल करेंगे?

 

मुझसे होशियारी दिखाके उनको जो हासिल करना था, उन्होंने हासिल कर लिया। लोकपाल बनाने की पहली मांग अरविंद की थी, पर दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने के बाद वह पलटी मार गए। आज वह इस मुद्दे पर बात करना भी मुनासिब नहीं समझते। उनके दूसरे साथी जो राजनीति को कभी कीचड़ कहते थे, आज सभी उसी दलदल में समाए हुए हैं। दरअसल उन सबका मकसद राजनीति में ही जाना था जिसे मैं भांव नहीं पाया। लेकिन आगामी आंदोलन में उनको शामिल नहीं किया जाएगा। सबको दूर रखा जाएगा।

 

आप पर आंदोलन की सार्थकता को खत्म करने का आरोप लग चुकाहै, क्या कहेंगे?

 

मैं इस आरोप को काफी हद तक सही मानता हूं। दरअसल 2011 का आंदोलन हाईजैक हुआ था। जो लोग उस आंदोलन में जुड़े थे उन्होंने लोगों के विश्वास को तोड़ा है। अपने स्वार्थ के लिए लोगों की संवेदानाओं की भी हत्या कर दी। मैं मानता हूं लोगों का विश्वास आंदोलनों से कम हुआ है। मेरे आंदोलन का भी वही हश्र हुआ, जो कभी जेपी आंदोलन का हुआ था।

गांधी जयंती व अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस- ‘अहिंसा’ के विचार से ही ‘जय जगत’ की अवधारणा

(1) संयुक्त राष्ट्र संघ ने महात्मा गांधी के जन्मदिवस को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस

घोषित किया:-

अहिंसा की नीति के जरिये विश्व भर में शांति के संदेश को बढ़ावा देने के महात्मा गांधी के योगदान को स्वीकारने के लिए ही ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ ने महात्मा गांधी के जन्मदिवस 2 अक्टूबर को  विश्व भर में प्रतिवर्ष ‘अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय वर्ष 2007 में लिया गया। मौजूदा  विश्व -व्यवस्था में अहिंसा की सार्थकता को स्वीकार करते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा में भारत द्वारा रखे गये इस प्रस्ताव को बिना वोटिंग के ही सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया। इस प्रस्ताव को भारी संख्या में सदस्य देशों का समर्थन मिलना विश्व में आज भी गांधी जी के प्रति सम्मान और उनके  विश्वव्यापी विचारों और सिद्धांतों की नीति की प्रासंगिकता को दर्शाता है।

 

(2) आज मानव जाति को जय जगत के नारे को बुलंद करने की आवश्यकता है:-

15 अगस्त, 1947 को महात्मा गाँधी के नेतृत्व में देश 300 वर्षों की अग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ था। भारतवासियों के हृदय में देशभक्ति की भावना गांधी जी ने भरी और फिर अंग्रेजों को भारत छोड़ने को उन्होंने ही विवश किया। इसके साथ ही सरदार पटेल ने भारत के 552 देशी राज्यों को अत्यंत ही शांतिपूर्वक समाप्त कर भारत को एक सुदृढ़ तथा संगठित राष्ट्र बनाया। भारत की आजादी से प्रेरणा लेकर विश्व के 54 देश अंग्रेजी साम्राज्य की गुलामी से आजाद हो गये थे। गाँधी जी ने अपने शिष्य विनोबा भावे से भारत देश के आजाद होते ही कहा था कि अभी तक हमारा लक्ष्य अंग्रेजी साम्राज्य की गुलामी से देश को आजाद करने के लिए ‘जय हिन्द’ के नारे को बुलंद करना था। देश के आजाद होने के साथ ‘जय हिन्द’ का हमारा लक्ष्य पूरा हो गया है और अब हमें सारे विश्व को गरीबी, अन्याय, भूख, बीमारी, अशिक्षा तथा युद्धों से बचाने के लिए ‘जय जगत’ अर्थात ‘सारे विश्व की जय हो के’ नारे को बुलंद करने के लिए कार्य करना है।

 

(3) दो अरब तथा चालीस करोड़ बच्चों का भविष्य आज की समस्या:-

21वीं सदी के युग में व्याप्त विश्वव्यापी समस्याओं को समाप्त करने के लिए महात्मा गाँधी के विचारों को अमल में लाने की आवश्यकता है। महात्मा गाँधी भारत जैसे महान राष्ट्र को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के लिए उठ खड़े हुए थे और वह देश को आजादी दिलाने में सफल भी हुए। यदि महात्मा गाँधी इस युग में जीते होते तो वह हमारे ग्लोबल विलेज को गरीबी, अशिक्षा, आतंक, एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र को परमाणु शस्त्रों के प्रयोग की धमकियों तथा विश्व के दो अरब बच्चों के सुरक्षित भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए जुझ रहे होते। महात्मा गाँधी ने महापुरूषों से प्रेरणा ली किन्तु अपने सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए देश की गुलामी की समस्या को हल किया। तथापि विश्व के 54 देशों को गुलामी से मुक्त होने की ऊर्जा तथा विश्वास दिया।

(4) ‘जय जगत’ की भावना से ही पूरे विश्व में ‘एकता एवं शांति की स्थापना संभव:-

 

संत विनोबा भावे से किसी ने पूछा कि दो राष्ट्रों के बीच झगड़ा होने से कोई एक राष्ट्र हारेगा तथा कोई एक राष्ट्र जीतेगा। सारे जगत की जीत कैसे होगी? बच्चों के सुरक्षित भविष्य की खातिर यदि विश्व के सभी देश यह बात हृदय से स्वीकार कर लें कि आपस में युद्ध करना ठीक

नहीं है तो सारे विश्व में ‘जय जगत’ हो जायेगा। अर्थात यदि दो राष्ट्र मिलकर ‘जय जगत’ की भावना से आपसी परामर्श करें तो किसी एक की हार-जीत नहीं वरन् दोनों की जीत होगी। इस

प्रकार प्रत्येक राष्ट्र को सारे विश्व में ‘जय जगत’ की भावना के अनुरूप एकता एवं शांति की स्थापना के लिए अपने-अपने राष्ट्रीय हितों के साथ ही सारे विश्व के देशों के हितों को ध्यान में रखकर भी संयुक्त राष्ट्र संघ को शक्ति प्रदान कर विश्व संसद के रूप में विकसित करना होगा।

 

(5) महात्मा गांधी ने  विश्व में वास्तविक शांति की स्थापना के लिए बच्चों को सबसे

सशक्त माध्यम बताया:-

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का मानना था कि  विश्व में वास्तविक शांति लाने के लिए बच्चे ही सबसे सशक्त माध्यम हैं। उनका कहना था कि ‘‘यदि हम इस विश्व को वास्तविक शांति की सीख देना चाहते हैं और यदि हम युद्ध के विरूद्ध वास्तविक युद्ध छेड़ना चाहते हैं, तो इसकी शुरूआत हमें बच्चों से करनी होगी।’’ इस प्रकार महात्मा गाँधी के ‘जय जगत’ के सपने को साकार करने के लिए हमें प्रत्येक बच्चे को बाल्यावस्था से ही भौतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक तीनों की संतुलित शिक्षा के साथ ही सार्वभौमिक जीवन-मूल्यों की शिक्षा देकर उन्हें

‘विश्व नागरिक’ बनाना होगा।

 

(6) गांधी जी ने आधुनिक  विश्व की समस्याओं के लिए एक स्वतंत्र राष्ट्रों की महासंघ

की वकालत की:-

गांधी जी का कहना था कि भविष्य में शांति, सुरक्षा और निरन्तर प्रगति के लिए संसार के सभी

स्वतंत्र राष्ट्रों को एक महासंघ की आवश्यकता है, इसके अलावा आधुनिक विश्व की समस्याओं को हल करने का कोई अन्य माध्यम नहीं है। एक ऐसे ही विश्व महासंघ के द्वारा उसके घटक देशों की स्वतंत्रता, एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र पर किये जाने वाले आक्रमण एवं शोषण से बचाव, राष्ट्रीय मंत्रालयों की सुरक्षा, सभी पिछड़े क्षेत्रों एवं लोगों की उन्नति, विकास एवं सम्पूर्ण मानव जाति की भलाई के लिए विश्व भर के संसाधनों के एकत्रीकरण जैसे कार्य सुनिश्चित किये जाने चाहिए।

 

(7) सारा संसार एक नवीन विश्व-व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है:-

आज जब हम महात्मा गांधी के जीवन तथा शिक्षाओं को याद करते हैं तो हम उनके सत्यानुसंधान एवं विश्वव्यापी दृष्टिकोण के पीछे अपनी प्राचीन संस्कृति के मूलमंत्र ‘उदारचारितानाम्तु वसुधैव कुटुम्बकम्’ (अर्थात पृथ्वी एक देश है तथा हम सभी इसके नागरिक है) को पाते हैं। इन मानवीय मूल्यों के द्वारा ही सारा संसार एक नवीन विश्व सभ्यता की ओर बढ़ रहा है। गांधी जी ने भारत की संस्कृति के आदर्श उदारचरित्रानाम्तु वसुधैव कुटुम्बकम् को सरल शब्दों में ‘जय जगत’ (सारे विश्व की भलाई अर्थात जीत हो) के नारे के रूप में अपनाने की प्रेरणा अपने प्रिय शिष्य संत विनोबा भावे को दी जिन्होंने इस शब्द का व्यापक प्रयोग कर आम लोगों में यह विचार फैलाया।

 

(8) गांधी जी अपने युग की समस्याओं से जुड़े थे:-

यदि महात्मा गांधी इस युग में होते तो वह हमारे ग्लोबल विलेज का स्वरूप धारण कर चुके विश्व को गरीबी, अशिक्षा, आतंक, एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र को परमाणु शस्त्रों के प्रयोग की धमकियों तथा विश्व के 2.4 अरब बच्चों के साथ ही आगे जन्म लेने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए प्रयासरत् होते। महात्मा गांधी ने महापुरूषों से प्रेरणा ली किन्तु अपने सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए गुलामी की समस्या को हल किया। महात्मा गांधी की शिक्षाओं से प्रेरित विनोबा भावे उनके सच्चे शिष्य थे। विनोबा भावे ने जय जगत का नारा दिया। गांधी जी इस संसार के अकेले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अपने जीवन के आदर्श सत्य और अहिंसा की शिक्षाओं से अपने जीवन काल में ही करोड़ों लोगों को इतना प्रभावित किया कि उनकी सोच में व्यापक परिवर्तन हुआ। गांधी जी का मानना था कि स्वतंत्रता को सत्य और अहिंसा के माध्यम से प्राप्त करने से भारत का गौरव संसार में और अधिक बढ़ेगा और यह उदाहरण एक दिन सारे विश्व को एक नई दिशा देगा।

 

(9) सम्पूर्ण मानव जाति को सुन्दर एवं सुरक्षित भविष्य प्रदान करने के लिए अपना रास्ता स्वयं

चुने:-

गांधी जी का जीवन सत्यानुसंधान था। वह निरन्तर अध्ययनशील रहते हुए कड़े अनुशासन तथा खुले दिमाग से अपने प्रत्येक कार्य का विश्लेषण करते थे। वह अपने अहिंसा, सत्य, मानवता, क्षमा, धर्मो की एकता तथा आध्यात्मिकता के सिद्धान्तों के अनुरूप हर पल जीने का अभ्यास करते थे। वह समय की आवश्यकता के अनुसार इन सिद्धान्तों का सामाजिक जीवन में प्रयोग करते थे। वह कहते थे कि सभी महापुरूष अपने युग की समस्याओं को अनेक तरीकों से सुलझाते रहते थे। मैं भी उन महापुरूषों से प्रेरणा लूँगा किन्तु मैं उन तरीकों की नकल नहीं करूँगा वरन् भारत को स्वतंत्र कराने के लिए अपना मार्ग स्वयं निर्धारित करूँगा।

 

(10) महात्मा गांधी सभी धर्मों का समान आदर करते थे:-

गांधी जी एक सच्चे ईश्वर भक्त थे। वे सभी धर्मो की शिक्षाओं का एक समान आदर करते थे। गांधी जी का मानना था कि सभी महान अवतार एक ही ईश्वर की ओर से आये हंै, धर्म एक है तथा मानव जाति एक है, इसलिए हमें प्रत्येक धर्म का आदर करना चाहिए। सभी धर्म एवं सभी धर्मों के दैवीय शिक्षक एक ही परमपिता परमात्मा के द्वारा भेजे गये हैं। हम चाहे मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर या गुरूद्वारे किसी भी पूजा स्थल में प्रार्थना करें हमारी पूजा, इबादत तथा प्रार्थना एक ही ईश्वर तक पहुँचती हैं। गांधी जी निरन्तर अपने युग के प्रश्नों को हल करने का प्रयास अपने सत्यानुसंधान से करते रहे। गांधी जी ने अपनी युग की सबसे प्रमुख आवश्यकता के रुप में गुलामी को मिटाया तथा बाद में उनका मिशन इस विश्व को संगठित करके आध्यात्मिक साम्राज्य धरती पर स्थापित करना था।

(11)  विश्व  के सभी देश अपने संविधान में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 को

शामिल करें:-

अब सारे विश्व को सचमुच एक परिवार बनाने का समय आ चुका है। हम सबने इस विश्व को एक परिवार न बनाया तो यह सम्पूर्ण मानवजाति नष्ट हो जायेंगी। इसके लिए विश्व के सभी राष्ट्रों को भी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 के अनुरूप एक विश्व व्यवस्था बनाने की पहल करनी चाहिए। इस अनुच्छेद में परमात्मा की षिक्षाओं के अनुरूप संसार को सुन्दर एवं सुरक्षित बनाने के लिए ‘सहयोग’, ‘परामर्श’, ‘विचार-विमर्श’, ‘न्याय की स्थापना’, व ‘कानून के पालन’ आदि जैसी षिक्षाओं को सम्मिलित किया गया है।

 

(12) आज बापू की सत्य, अहिंसा एवं सादगी की षिक्षायें और भी अधिक प्रासंगिक हो गयी

है:-

महात्मा गांधी चाहते थे कि भारत केवल एषिया और अफ्रीका का ही नहीं अपितु सारे  विश्व  की मुक्ति का नेत्त्व करें। उनका कहना था कि ‘‘एक दिन आयेगा, जब शांति की खोज में विश्व के सभी देश भारत की ओर अपना रूख करेगें और विश्व को शांति की राह दिखाने के कारण भारत विश्व का प्रकाश बनेगा।’’ आज विश्व सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था पूरी तरह से बिगड़ चुकी है। अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद, भूख, बीमारी, हिंसा, तीसरे विश्व युद्ध की आशंका, 36,000 बमों का जखीरा तथा हैती व सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाएं मानव अस्तित्व को महाविनाश की ओर ले जा रही है। ऐसी विषम परिस्थितियों में बापू की सत्य, अहिंसा एवं सादगी की शिक्षायें और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है।

 

(13) आइये, महात्मा गांधी के ‘जय जगत’ के सपने को साकार करने की पहल करें:-

गांधी जी की शिक्षाओं पर चलकर हम सारे  विश्व को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद, भूख,

बीमारी, हिंसा, तीसरे विश्व युद्ध की आशंका आदि से होने वाले महाविनाश से बचा सकते है। अब समय आ गया है कि यदि हमें मानव जाति को महाविनाश से बचाते हुए सारे विष्व में शांति एवं एकता की स्थापना करनी है तो (1) परिवार, विद्यालय एवं समाज द्वारा प्रत्येक बच्चे को ‘जय जगत’ की शिक्षा देकर उन्हें  विश्व नागरिक बनाना होगा तथा (2) भारत सरकार को अपनी ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की महान संस्कृति, सभ्यता एवं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 के अनुरूप सारे विश्व में शांति एवं एकता की स्थापना के लिए विश्व के नेताओं की एक बैठक भारत में अतिषीघ्र बुलाने की पहल करनी चाहिए। मेरा प्रबल विश्वास है कि भारत ही विश्व में शांति स्थापित करेंगा। इस प्रकार विश्व में एकता एवं शांति की स्थापना के लिए प्रयास करके ही हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के ‘जय जगत’ अर्थात वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा को साकार करने की दिशा में आगे बढ़कर उन्हें अपनी सच्ची श्रद्धांजली दे सकते हैं।

क्या प्रधानमंत्री मोदी की छवि बन रही है जनता से कर वसूलने वाले कठोर शासक की ?

जीएसटी को लागू हुए पर्याप्त समय हो चुका है और इसके अच्छे-बुरे पक्ष देश के सामने आने लगे हैं। कर-चोरी करने वालों को कर देने के लिए बाध्य करना एक अच्छी सरकार की जिम्मेदारी है, इस दृष्टि से जीएसटी एक अच्छा कदम कहा जा सकता है किंतु टैक्सचोरों को घेरने के चक्कर में जब सरकार आम आदमी की रोजी-रोटी पर भी फंदा डाल दे तो उसे अच्छा कदम नहीं कहा जा सकता। जीएसटी की जटिलताएं आज भी देश के लाखों वकील और चार्टर्ड एकाउण्टेंट नहीं समझ पाए हैं, आम आदमी के लिए तो यह किसी मुसीबत से कम नहीं है। छोटे-छोटे कारोबरी आज भी जीएसटी में पंजीकरण कराने, मासिक-त्रैमासिक विवरणियां भरने और पैनल्टियों से बचने में अपने आप को फंसा हुआ पाते हैं और स्वयं को अपमानित एवं ठगा हुआ अनुभव कर रहे हैं। कुछ व्यापारी तो दम घुटने जैसी स्थिति में हैं। क्या किसी भी चुनी हुई सरकार के लिए जनता के बीच ऐसी स्थितियां पैदा कर देना समझदारी का काम कहा जा सकता है!

 

सरकार की एजेंसियों में यदि सत्य को सुनने, समझने और कहने की शक्ति है तो वे सोशल मीडिया में झांकें, चारों तरफ जीएसटी की जटिलताओं की चर्चा है, लोगों के काम-धंधे मंद पड़ने की चर्चा है और नवीन रोजगारों के अवसर घटने की चर्चा है। सरकार की एजेंसियों के लिए कुतर्क करने के लिए पर्याप्त अवकाश है कि जीएसटी के बाद लेखाकारों एवं वकीलों के लिए रोजगार के नए अवसर उत्पन्न हुए हैं किंतु उनके पास इस बात का जवाब नहीं है कि वकीलों और लेखाकारों को हर माह मोटी फीसें कौन चुकाएगा।

 

भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में से एक, पूर्व वित्तमंत्री एवं पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने जीएसटी और गिरती अर्थव्यवस्था को लेकर जो चिंता व्यक्त की है, उस चिंता को उनसे पूर्व भी सुब्रमण्यम स्वामी जैसे कई अनुभवी नेता, अर्थशास्त्री एवं समाजशास्त्री व्यक्त कर चुके हैं किंतु यह देखकर हैरानी होती है कि यशवंत सिन्हा की बात पर गंभीर मंथन करने के पश्चात् ही कोई उत्तर देने के स्थान पर राजनाथ सिंह जैसे अनुभवी नेताओं ने यह कहने में विलम्ब नहीं किया कि देश की अर्थव्यस्था तेजी से पटरी पर दौड़ रही है।

 

जिस प्रकार रेल मंत्री पीयूष गोयल ने सत्य को स्वीकार करके रेलवे में एक लाख रिक्त पदों पर कार्मिकों की भर्ती की घोषणा करने का साहस दिखाया है और दुरंतो तथा राजधानी गाड़ियों से फ्लैक्सी किराया पद्धति बंद करने की घोषणा करने का साहस दिखाया है, क्या वित्त मंत्री अरुण जेटली जीएसटी का सरल और कॉमनमैन फ्रैण्डली विकल्प देने का नैतिक साहस दिखा सकते हैं! क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिनकी छवि जनता से कर वसूलने वाले कठोर शासक की बनती जा रही है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने भाषणों में अपनी ही पीठ ठोकते नहीं थकते कि वे जनता के हित में कठोर फैसले ले रहे हैं किंतु कभी जनता के मुंह से सच्चाई सुनने की हिम्मत तो दिखाएं। ईमानदारी की बात यह है कि जनता अपनी बैंक जमाओं पर ब्याज दर घटने, जिन चीजों पर पहले कर नहीं लगता था, उन पर भी कर लगने, रेलवे और वायुयान के किराए बढ़ने, पैट्रोल-डीजल के भाव बढ़ने, महंगाई बढ़ने, जीएसटी की जटिलताओं के कारण काम-धंधे में नई कठिनाइयों के उत्पन्न होने से तंग है। कहीं ऐसा न हो कि प्रधानमंत्री अपनी तारीफ करते ही रह जाएं, उनके मंत्री उनकी हाँ में हाँ मिलाते रह जाएं और जनमत भारतीय जनता पार्टी के हाथ से खिसक कर किन्हीं और हाथों में चला जाए। यह ठीक वैसा ही होगा जैसा कि सोनिया गांधी और उनकी पार्टी चारों तरफ से हो रही आलोचनाओं की अनसुनी करके 2014 के चुनावों में कुर्सी से उतर कर धरती पर आ गईं और जनता ने उन्हें सच्चाई से अच्छी तरह परिचय करा दिया।

 

जीएसटी को लेकर देश में जो कुछ दिखाई दे रहा है, उसके परिप्रेक्ष्य में इस कहावत का स्मरण करना अनुचित नहीं होगा कि जब रोम जल रहा था, तब नीरो वीणा बजा रहा था। शेक्सपीयर के सुप्रसिद्ध नाटक जूलियस सीजर की एक पंक्ति है, यदि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने सुनी हो तो इस पर समय रहते अमल कर लें और न सुनी हो तो सुन कर अमल कर लें- जूलियस सीजर की पत्नी को पवित्र होना ही जरूरी नहीं है, उसे पवित्र दिखना भी जरूरी है। अर्थात् इतना कह देना भर पर्याप्त नहीं है कि देश की अर्थव्यस्था तेजी से दौड़ रही है, ऐसा होते हुए दिखना भी जरूरी है।

--डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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आस्था के बवंडर में धुंआ होते ज़रूरी सवाल

“भूखों के सामने रोटी किसी भगवान की तरह प्रकट होती है”।यह धारणा स्वामी विवेकानंद की थी। भूख से बिलबिलाये और दाने-दाने के लिए तिलमिलाये हुए लोगों से पूछिये तो वो इस धारणा की पुष्टि करते हैं।लेकिन सच तो यह भी है कि मोक्ष से बिलविलाये लोग भूख को ही अपना ज़रिया बनाकर संथारा करते हुए मौत को गले भी लगा लेते हैं। उल्लेखनीय है कि संथारा जैन धर्म की वह प्रक्रिया है,जिसमें मोक्ष की चाहत लिये कोई जैनधर्मावलंबी स्वयं को भूखा रखकर मृत्यु के हवाले हो जाता है। जैनों को संथारा करने वाला किसी संत की तरह दिखता है,उसकी वहां पूजा होती है,उसे श्रद्धा के रूप में देखा जाता है। मुहर्रम के मौक़े पर स्वयं को कष्ट देते लोग दिखते हैं।अपने ही बदन पर वो कोड़े चलाते हैं,कोड़े से लहुलुहान होता बदन अपनी व्यथा को मात देते हुए उनकी आस्था के परचम बन जाते हैं। राह चलते आपको कई ऐसे कई लोग मिल जायेंगे,जिनके माथे के ऊपरी हिस्से का एक छोटा सा भाग काला-स्याह पड़ा होता है। स्याह कपार लिये ऐसे लोगों को लेकर उनके धर्मावलंबियों के यह बीच धारणा है कि वो पक्के और सच्चे नमाज़ी हैं।

ये सभी क्रूर प्रतीक दरअस्ल ऐसी धार्मिक भावनात्मक आस्था के की चारदीवारी में क़ैद हैं,जिसके धार्मिक षडयंत्र के ताले में तर्क की नहीं अंधविश्वास की चाबी लगती है।इनके बीच अगर धोखे से भी तर्क चला आये,तो उसकी लानत मलानत धार्मिक आख़्यानों से निकले प्रतितर्क से कर दी जाती है। इस प्रतितर्क की वाहक अक्सर महिलायें होती हैं,क्योंकि आज भी समाज की पितृसत्तात्मकता की बड़ी मज़बूती है।यही कारण है कि धर्म में सैद्धांतिक रूप से पर्याप्त गुंज़ाइश होने के बावजूद तलाक़ देने की कुव्वत सिर्फ़ लगभग पुरुषों में है और महिलाओं के हिस्से में उसका दंड झेलना है।ठीक इसी तरह काशी और मथुरा जैसे तीर्थस्थलों में वैधव्य का थोपा गया सामाजिक-धार्मिक दंश झेलती और माथे पर सफेद रंग के त्रिपंड रचाये हर उम्र की महिलायें  यूं ही दिख जाती हैं। किसी भी तरह की पारिवारिक या सामाजिक गुंजाईश के अभाव में ये विधाव तीर्थस्थानों में आस्था के ज़रिये अपनी पीड़ा मुक्ति की तलाश करती हैं।इन तीर्थ स्थलों पर कभी भी विधुर यानी जिनकी पत्नियां मर चुकी हैं,उन्हें इस हालत में नहीं देखा जा सकता है। इस तरह,पुरुषवादी समाज में धर्म की वाहक आसानी से या तो महिलायें बन जाती हैं या उन्हें बना दिया जाता है। धर्म की आड़ में महिलाओं के शोषण की अनगिनत कहानियां हैं।इसे कभी इंदिरा गोस्वामी अपने उपन्यास के ज़रिये सुनाती हैं,तो कभी इस्मत चुग़ताई बताती हैं, कभी तहमीना दुर्रानी दिखाती हैं,तो कभी तसलीमा सरेआम होने के लिए छटपटाती उन कहानियों पर पड़े सामाजिक-धार्मिक पाखंड के पर्दे को सरका देती हैं।

ऐसा होते ही धर्म और समाज की पितृसत्तात्मकता के पाखंड से आस्था का बवंडर उठ खड़ा होता है।इस बवंडर में कभी कोई जला दी जाती है,कभी झुलसा दी जाती है,अक्सर चरित्रहीन क़रार दी जाती है। आधी आबादी की सुरक्षा और स्वतंत्रता जितना धार्मिक ग्रन्थों में कभी कभी चाक चौबंद दिखती-दिखायी जाती है,उतना ही यह वास्तविकत धरातल पर अपने अस्तित्व की भीख मांगती हुई-सी दिखती हैं। क़ुरान कहता है कि एक पुरुष के बराबर दो महिलाओं की गवाही होती है। मनुस्मृति कहता है कि विशेष मौक़ों पर ही महिलाओं के सज़ने सवरने का अधिकार है,उन्हें पहले अपने पिता की निगरानी में फिर पति की और आख़िरकार बेटे की निगरानी में ही जीवन गुज़ार लेनी चाहिए। असल में दुनिया के तमाम ‘धर्मों’ का चरित्र  ही पुरुषवादी है।इन्हें पुरुषों ने ही बनाया है,पुरुषों ने ही आकार दिया है और पुरुषों ने ही सिद्धांतत: कसा भी है। ऐसे में धर्म में पुरुषवादी सत्ता की सुरक्षा का स्वत: आ जाना स्वाभाविक है। यही वह कारण है,इसकी निरंतरता आज भी आश्रमों और तीर्थस्थलों पर भी देखने को मिल जाती है। पुरुषवादी सोच और सत्ता की निरंतरता सभी धर्मों में है। महिलायें कहीं किसी मंदिर में रजस्वला सहित प्रवेश नहीं कर सकतीं,तो कहीं  किसी मज़ार पर मासिक धर्म के दौरान जाने की उन्हें  पूरी मनाही है। मंदिर की पुजारिन तो कहीं-कहीं देखने को मिल जाती हैं,लेकिन मस्जिद का मुअज़्जिन और इमाम कभी स्त्रियां होतीं ही नहीं । सड़कों के किनारे गाहे-बगाहे नमाज़ पढ़ते पुरुष दिख जाते हैं,लेकिन आज तक किसी स्त्री को किसी कोने में ही सही नमाज़ पढ़ते नहीं देखा जा सका है। बड़े-बड़े मठों और मंदिरों के पुरुष महंथ ही होते हैं,आजतक किसी महिला महंथ को किसी मठों-मंदिरों की गद्दियों पर विराजते नहीं देखा गया है। धार्मिक प्रतीकों को ओढ़ने-बिछाने का हक़ भी सिर्फ़ पुरुषों के पाले में है,कर्तव्य महिलाओं के हवाले है। चुटिया छोड़ते हुए मुंडन कराकर लाल त्रिपुण्ड लगाते हुए महिलाओं को कभी नहीं देखा गया,दिगंबर साधुओं की तरह निर्वस्त्र होकर किसी महिला दिगंबर को नहीं देखा गया और न ही सुन्नत माने जाने वाली गोली टोपी और टखने तक पैजामा पहने हुए किसी महिला ही नज़र आयी।धर्म और आस्था की मांग ही यही है कि उसका नेतृत्व पुरुष करेंगे,और उसका वाहक महिलायें होंगी। इन सवालों के बीच लिंगगत आधार पर जिन मनुष्यों को हम महिला की श्रेणी में रखते हैं,उनके ऊपर दायित्व लाद दी जाती है और हक-ओ-हुक़ूक़ छीन लिये जाते हैं।शायद इसीलिए आधुनिक दुनिया की महान नारीवादी और सेकेण्ड सेक्स की लेखिका सीमॉन महिलाओं को लेकर अपने ऐतिहासिक अध्ययन में तर्कों के साथ पुरज़ोर तरीक़े से कहती हैं; “औरतें पैदा नहीं होतीं,बनायी जाती हैं”। लेकिन शायद राम-रहीम को ये पता नहीं रहा होगा कि मनुष्य की श्रेणी से उतार दी गयीं वह औरत जिस दिन पुरुषों की बनायी गयी उस चौखट को सीमॉन की ऐतिहासिक समझ के हथौड़े से चोट मारती है,तो डेरा सच्चा सौदा का चालाकी से बना बनाया ऐश्वर्य वाला आस्था का महल भड़भड़ाकर गिर जाता है। “उत्तिष्ठ,जाग्रत,पाप्यवारान्नीबोधयत”(उठो,जागो और लक्ष्य को पाने तक कभी मत रुको)। मुश्किल से हासिल होने वाले लक्ष्य को पाने के लिए पीड़ितों,वंचितों से यह आह्वान विवेकानंद ने ही किया था।इस आह्वान की दिशा कट्टरता,अंधविश्वास और धार्मिक उन्माद झेलती महिलाओं के लिए ज़्यादा मुफ़ीद दिखती है।     

धर्म के कर्मकांडी ऐश्वर्य में जीते, मगर आर्थिक अभाव झेलते हिन्दू-मुसलमान दोनों के तंत्रवादी बाबाओं के बीच अलग-अलग थोथी व्याख्याओं के साथ नरबलि जैसी अनगिनत प्रैक्टिस है। इस प्रैक्टिस के व्यापार वाहन बदस्तूर रहे,इसके लिए हर धर्म के कट्टर मुल्ला-पंडित सरीखे ‘अध्यात्मवादियों’ ने अपने पोशाक को धर्म का पोस्टर बना रखा है।मगर हम भूल जाते हैं कि पोस्टर कारोबार के लिए होता है,अध्यात्मवाद या दर्शन के लिए नहीं। ऐतिहासिक संदर्भ हमें चीख़-चीख़कर आवाज़ देता है कोई भी दर्शन लोगों में इसलिए लोकप्रिय हुआ है,क्योंकि उस दर्शन ने युग विशेष में जीने की एक नयी,वैज्ञानिक और तार्किक राह दिखायी थी। मगर विचारों,अवधारणाओं और संकल्पनाओं की तर्किकता सत्ता को मंज़ूर नहीं होती और अक्सर ही यह देखा गया है कि सत्ता इन विचारों,अवधारणाओं में एक अतार्किक और डर के मनोविज्ञान से ओतप्रोत अनेक कर्मकांड घोल देती है। ऐसे में कोई भी दर्शन अपने कर्मकांडों की पैकेजिंग के साथ धर्म बन जाता है।धर्म का बने रहना सत्ता के लिए ख़तरनाक है।जब धर्म बन ही जाय,तो धर्म से कर्मकांड का अलग किये जाने का कोई भी प्रयास सत्ता के लिए चुनौती होती है।सत्ता के लिए यही ख़तरा और चुनौतियां असरल में किसी भी देश,समाज या समुदाय के लिए पुनर्जागरण भी होता है। शायद हम इस दौर में उसी पुनर्जागरण के वैचारिक मंथन के दौर से गुज़र रहे हैं। ज़ाहिर है मंठ,मंदिर,मस्जिद,मक़तब इन सबों के अधिकार पर सोच-समझ का हथौरा चलता दिखता है।संभव है आने वाले दिनों में इनसे जुड़े लोग हिंसक बने,बेक़ाबू हों।शुरुआत में सत्ता इनकी हिंसा और बेकाबू होने का समर्थन करे,मगर जब पुनर्जागरण से एक नये मनुष्य का जन्म होगा,तो उसकी मांग भी सत्ता के नये स्वभाव की होगी।ऐसे में सत्ता अपना स्वाभाव बदलने के लिए मजबूर होगी और सत्ता ख़ुद ही इस मजबूरी में उन्हीं हिंसक और बेकाबू होते लोगों पर नकेल कसेगी।अंतत: किसी भी तरह की सत्ता की प्रकृति उसके भीतर शासित होने वाले लोगों की चाहत से तय होती है।

 

 

आस्था के बवंडर में धुंआ होते ज़रूरी सवाल

“भूखों के सामने रोटी किसी भगवान की तरह प्रकट होती है”।यह धारणा स्वामी विवेकानंद की थी। भूख से बिलबिलाये और दाने-दाने के लिए तिलमिलाये हुए लोगों से पूछिये तो वो इस धारणा की पुष्टि करते हैं।लेकिन सच तो यह भी है कि मोक्ष से बिलविलाये लोग भूख को ही अपना ज़रिया बनाकर संथारा करते हुए मौत को गले भी लगा लेते हैं। उल्लेखनीय है कि संथारा जैन धर्म की वह प्रक्रिया है,जिसमें मोक्ष की चाहत लिये कोई जैनधर्मावलंबी स्वयं को भूखा रखकर मृत्यु के हवाले हो जाता है। जैनों को संथारा करने वाला किसी संत की तरह दिखता है,उसकी वहां पूजा होती है,उसे श्रद्धा के रूप में देखा जाता है। मुहर्रम के मौक़े पर स्वयं को कष्ट देते लोग दिखते हैं।अपने ही बदन पर वो कोड़े चलाते हैं,कोड़े से लहुलुहान होता बदन अपनी व्यथा को मात देते हुए उनकी आस्था के परचम बन जाते हैं। राह चलते आपको कई ऐसे कई लोग मिल जायेंगे,जिनके माथे के ऊपरी हिस्से का एक छोटा सा भाग काला-स्याह पड़ा होता है। स्याह कपार लिये ऐसे लोगों को लेकर उनके धर्मावलंबियों के यह बीच धारणा है कि वो पक्के और सच्चे नमाज़ी हैं।

ये सभी क्रूर प्रतीक दरअस्ल ऐसी धार्मिक भावनात्मक आस्था के की चारदीवारी में क़ैद हैं,जिसके धार्मिक षडयंत्र के ताले में तर्क की नहीं अंधविश्वास की चाबी लगती है।इनके बीच अगर धोखे से भी तर्क चला आये,तो उसकी लानत मलानत धार्मिक आख़्यानों से निकले प्रतितर्क से कर दी जाती है। इस प्रतितर्क की वाहक अक्सर महिलायें होती हैं,क्योंकि आज भी समाज की पितृसत्तात्मकता की बड़ी मज़बूती है।यही कारण है कि धर्म में सैद्धांतिक रूप से पर्याप्त गुंज़ाइश होने के बावजूद तलाक़ देने की कुव्वत सिर्फ़ लगभग पुरुषों में है और महिलाओं के हिस्से में उसका दंड झेलना है।ठीक इसी तरह काशी और मथुरा जैसे तीर्थस्थलों में वैधव्य का थोपा गया सामाजिक-धार्मिक दंश झेलती और माथे पर सफेद रंग के त्रिपंड रचाये हर उम्र की महिलायें  यूं ही दिख जाती हैं। किसी भी तरह की पारिवारिक या सामाजिक गुंजाईश के अभाव में ये विधाव तीर्थस्थानों में आस्था के ज़रिये अपनी पीड़ा मुक्ति की तलाश करती हैं।इन तीर्थ स्थलों पर कभी भी विधुर यानी जिनकी पत्नियां मर चुकी हैं,उन्हें इस हालत में नहीं देखा जा सकता है। इस तरह,पुरुषवादी समाज में धर्म की वाहक आसानी से या तो महिलायें बन जाती हैं या उन्हें बना दिया जाता है। धर्म की आड़ में महिलाओं के शोषण की अनगिनत कहानियां हैं।इसे कभी इंदिरा गोस्वामी अपने उपन्यास के ज़रिये सुनाती हैं,तो कभी इस्मत चुग़ताई बताती हैं, कभी तहमीना दुर्रानी दिखाती हैं,तो कभी तसलीमा सरेआम होने के लिए छटपटाती उन कहानियों पर पड़े सामाजिक-धार्मिक पाखंड के पर्दे को सरका देती हैं।

ऐसा होते ही धर्म और समाज की पितृसत्तात्मकता के पाखंड से आस्था का बवंडर उठ खड़ा होता है।इस बवंडर में कभी कोई जला दी जाती है,कभी झुलसा दी जाती है,अक्सर चरित्रहीन क़रार दी जाती है। आधी आबादी की सुरक्षा और स्वतंत्रता जितना धार्मिक ग्रन्थों में कभी कभी चाक चौबंद दिखती-दिखायी जाती है,उतना ही यह वास्तविकत धरातल पर अपने अस्तित्व की भीख मांगती हुई-सी दिखती हैं। क़ुरान कहता है कि एक पुरुष के बराबर दो महिलाओं की गवाही होती है। मनुस्मृति कहता है कि विशेष मौक़ों पर ही महिलाओं के सज़ने सवरने का अधिकार है,उन्हें पहले अपने पिता की निगरानी में फिर पति की और आख़िरकार बेटे की निगरानी में ही जीवन गुज़ार लेनी चाहिए। असल में दुनिया के तमाम ‘धर्मों’ का चरित्र  ही पुरुषवादी है।इन्हें पुरुषों ने ही बनाया है,पुरुषों ने ही आकार दिया है और पुरुषों ने ही सिद्धांतत: कसा भी है। ऐसे में धर्म में पुरुषवादी सत्ता की सुरक्षा का स्वत: आ जाना स्वाभाविक है। यही वह कारण है,इसकी निरंतरता आज भी आश्रमों और तीर्थस्थलों पर भी देखने को मिल जाती है। पुरुषवादी सोच और सत्ता की निरंतरता सभी धर्मों में है। महिलायें कहीं किसी मंदिर में रजस्वला सहित प्रवेश नहीं कर सकतीं,तो कहीं  किसी मज़ार पर मासिक धर्म के दौरान जाने की उन्हें  पूरी मनाही है। मंदिर की पुजारिन तो कहीं-कहीं देखने को मिल जाती हैं,लेकिन मस्जिद का मुअज़्जिन और इमाम कभी स्त्रियां होतीं ही नहीं । सड़कों के किनारे गाहे-बगाहे नमाज़ पढ़ते पुरुष दिख जाते हैं,लेकिन आज तक किसी स्त्री को किसी कोने में ही सही नमाज़ पढ़ते नहीं देखा जा सका है। बड़े-बड़े मठों और मंदिरों के पुरुष महंथ ही होते हैं,आजतक किसी महिला महंथ को किसी मठों-मंदिरों की गद्दियों पर विराजते नहीं देखा गया है। धार्मिक प्रतीकों को ओढ़ने-बिछाने का हक़ भी सिर्फ़ पुरुषों के पाले में है,कर्तव्य महिलाओं के हवाले है। चुटिया छोड़ते हुए मुंडन कराकर लाल त्रिपुण्ड लगाते हुए महिलाओं को कभी नहीं देखा गया,दिगंबर साधुओं की तरह निर्वस्त्र होकर किसी महिला दिगंबर को नहीं देखा गया और न ही सुन्नत माने जाने वाली गोली टोपी और टखने तक पैजामा पहने हुए किसी महिला ही नज़र आयी।धर्म और आस्था की मांग ही यही है कि उसका नेतृत्व पुरुष करेंगे,और उसका वाहक महिलायें होंगी। इन सवालों के बीच लिंगगत आधार पर जिन मनुष्यों को हम महिला की श्रेणी में रखते हैं,उनके ऊपर दायित्व लाद दी जाती है और हक-ओ-हुक़ूक़ छीन लिये जाते हैं।शायद इसीलिए आधुनिक दुनिया की महान नारीवादी और सेकेण्ड सेक्स की लेखिका सीमॉन महिलाओं को लेकर अपने ऐतिहासिक अध्ययन में तर्कों के साथ पुरज़ोर तरीक़े से कहती हैं; “औरतें पैदा नहीं होतीं,बनायी जाती हैं”। लेकिन शायद राम-रहीम को ये पता नहीं रहा होगा कि मनुष्य की श्रेणी से उतार दी गयीं वह औरत जिस दिन पुरुषों की बनायी गयी उस चौखट को सीमॉन की ऐतिहासिक समझ के हथौड़े से चोट मारती है,तो डेरा सच्चा सौदा का चालाकी से बना बनाया ऐश्वर्य वाला आस्था का महल भड़भड़ाकर गिर जाता है। “उत्तिष्ठ,जाग्रत,पाप्यवारान्नीबोधयत”(उठो,जागो और लक्ष्य को पाने तक कभी मत रुको)। मुश्किल से हासिल होने वाले लक्ष्य को पाने के लिए पीड़ितों,वंचितों से यह आह्वान विवेकानंद ने ही किया था।इस आह्वान की दिशा कट्टरता,अंधविश्वास और धार्मिक उन्माद झेलती महिलाओं के लिए ज़्यादा मुफ़ीद दिखती है।     

धर्म के कर्मकांडी ऐश्वर्य में जीते, मगर आर्थिक अभाव झेलते हिन्दू-मुसलमान दोनों के तंत्रवादी बाबाओं के बीच अलग-अलग थोथी व्याख्याओं के साथ नरबलि जैसी अनगिनत प्रैक्टिस है। इस प्रैक्टिस के व्यापार वाहन बदस्तूर रहे,इसके लिए हर धर्म के कट्टर मुल्ला-पंडित सरीखे ‘अध्यात्मवादियों’ ने अपने पोशाक को धर्म का पोस्टर बना रखा है।मगर हम भूल जाते हैं कि पोस्टर कारोबार के लिए होता है,अध्यात्मवाद या दर्शन के लिए नहीं। ऐतिहासिक संदर्भ हमें चीख़-चीख़कर आवाज़ देता है कोई भी दर्शन लोगों में इसलिए लोकप्रिय हुआ है,क्योंकि उस दर्शन ने युग विशेष में जीने की एक नयी,वैज्ञानिक और तार्किक राह दिखायी थी। मगर विचारों,अवधारणाओं और संकल्पनाओं की तर्किकता सत्ता को मंज़ूर नहीं होती और अक्सर ही यह देखा गया है कि सत्ता इन विचारों,अवधारणाओं में एक अतार्किक और डर के मनोविज्ञान से ओतप्रोत अनेक कर्मकांड घोल देती है। ऐसे में कोई भी दर्शन अपने कर्मकांडों की पैकेजिंग के साथ धर्म बन जाता है।धर्म का बने रहना सत्ता के लिए ख़तरनाक है।जब धर्म बन ही जाय,तो धर्म से कर्मकांड का अलग किये जाने का कोई भी प्रयास सत्ता के लिए चुनौती होती है।सत्ता के लिए यही ख़तरा और चुनौतियां असरल में किसी भी देश,समाज या समुदाय के लिए पुनर्जागरण भी होता है। शायद हम इस दौर में उसी पुनर्जागरण के वैचारिक मंथन के दौर से गुज़र रहे हैं। ज़ाहिर है मंठ,मंदिर,मस्जिद,मक़तब इन सबों के अधिकार पर सोच-समझ का हथौरा चलता दिखता है।संभव है आने वाले दिनों में इनसे जुड़े लोग हिंसक बने,बेक़ाबू हों।शुरुआत में सत्ता इनकी हिंसा और बेकाबू होने का समर्थन करे,मगर जब पुनर्जागरण से एक नये मनुष्य का जन्म होगा,तो उसकी मांग भी सत्ता के नये स्वभाव की होगी।ऐसे में सत्ता अपना स्वाभाव बदलने के लिए मजबूर होगी और सत्ता ख़ुद ही इस मजबूरी में उन्हीं हिंसक और बेकाबू होते लोगों पर नकेल कसेगी।अंतत: किसी भी तरह की सत्ता की प्रकृति उसके भीतर शासित होने वाले लोगों की चाहत से तय होती है।

 

 

AMU अक़लियती किरदार: एक मिथ, स्वांग या अर्द्ध सत्य !

दो वक़्त की सूखी रोटियों की बोली लगाकर, गहने-कपड़े बेचकर, दर-दर भीख माँगकर जब 30 लाख की रक़म जुटाई जा रही थी, अंग्रेज़ों के राज में जब ये शर्त जोड़ी गयी कि अगर मुसलमानों के लिए अलीगढ़ में यूनिवर्सिटी बनानी है 30 लाख रुपए का रिज़र्व फ़ण्ड क्रिएट करना होगा...कितना दुश्वार रहा होगा सर् सैय्यद और उनके दोस्तों के लिए, उस वक़्त MAO College के तलबा के लिए ये रक़म जुटाना---ये सब बातें भ्रामक नशे, सतही हेकड़ी, खोखले टशन, बेमतलब की तुनक-मिज़ाजी में चूर आज के एएमयू के तालिब-इल्म के लिए एक कपोल-कल्पना से कम नहीं! आज की घड़ी में इस 30 लाख की क़ीमत क़रीब 300 करोड़ से ज़्यादा बैठेगी...अब आप अंदाज़ा लगाइए कि एएमयू को बनाने में आख़िर किसका ख़ून-पसीना लगा, सर् सैय्यद की क़यादत में जिन लोगों ने अपनी ज़मीनें दीं, पाई-पाई जोड़ा वो लोग कौन थे?

 

...ये बातें ढाबों पर धुएँ के छल्ले उड़ाता वो स्टूडेंट क्या जाने जो आज वाशरूम में हल्का होकर संडास का फ्लश दबाने तक में काहिली महसूस करता है! हर हॉल में मस्जिद होने का डंका पीटने वाला शायद ये भूल जाता है कि ढाबे पर अपने ही भाई की ग़ीबत करना अपने सगे भाई का गोश्त खाना हुआ...

 

माइनॉरिटी इंस्टिट्यूट का नाम आते ही अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जामिया मिल्लिया इस्लामिया का नाम ही खट से ज़ेहन में आता है...जबकि भारत में मज़हब, ज़ुबान, बोलचाल, तहज़ीब के ऐतबार से 13 हज़ार अक़लियती इदारे हैं जो मुस्लिम, ईसाई, सिख, पारसी, बौद्ध और जैन मज़हब के मानने वालों के हैं। इससे साफ़ हो जाता है अल्पसंख्यक के नाम पर सिर्फ़ एएमयू और जामिया का बार-बार नाम उछालना जायज़ नहीं है।

 

मैं ख़ुद लखनऊ किश्चियन कॉलेज से वाक़फ़ियत रखता हूँ...यहां ईसाइयों को दाख़िले में रिज़र्वेशन है और यहाँ एक चर्च भी है...यहां 11वीं से तालीम दी जाती है और इस शिक्षण-संस्थान का प्रिंसिपल क्रिश्चियन ही रहेगा...इसी तरह पंजाब में जैन धर्म के, सिखों के, आर्य समाज के इदारे हैं और यहां बाज़ाब्ता जैन धर्मावलंबियों के मंदिर और गुरूद्वारे भी हैं।

 

पंजाब में सिखों के जितने भी इदारे हैं चाहे वो गुरूनानक मेडिकल कॉलेज हो---वहाँ डंके की चोट पर सिख अनुयायियों के लिए कोटा सुरक्षित है और इन संस्थानों के अंदर गुरूद्वारे भी हैं जहां तलबा अपने धार्मिक अनुष्ठान का पालन करने के लिए पूरी तरह से आज़ाद है।

 

इसी तरह अखिल भारत में ईसाई मज़हब के सैंकड़ों इदारे हैं और इनके कैंपस में ही चर्च भी बने हुए मिल जाएंगे जहां स्टूडेंट्स आज़ादाना तौर पर अपने मज़हब के मुताबिक़ पोषित होता है।

 

आख़िर, सारी दिक़्क़त एएमयू और जामिया को लेकर ही क्यों है? क्या इसलिए कि देश में यही दो ऐसे इदारे हैं जहां से तालीम हासिल कर स्टूडेंट्स बेरून मुमालिक में अपनी हनक का लोहा मनवा रहे हैं!? एक आँकड़े के मुताबिक़ अकेले अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से आला सतही तालीम हासिल कर क़रीब 100 मुल्कों में तलबा अलग-अलग शोबों में अपनी ख़िदमात अंजाम दे रहे हैं। शायद दिक़्क़त और सोच यही है कि एएमयू के अक़लियती किरदार छिनने से मुस्लिम अल्पसंख्यकों की एक बड़ी खेप देश की मुख्यधारा से कट जाए और मुम्बई-चेन्नई-दिल्ली में मज़दूरी करे, ठेला चलाए, ढकेल लगाए, खोमचा बेचे, मिस्त्रिगिरी का काम करे, रिंच-पैना चलाए, पंक्चर जोड़े, कबाड़ का धंधा करे, मुर्ग़ी और बकरियां पाले-चराए। सरकार को तकलीफ़ है क्या कि भारत भूमि पर विदेशी कमाई से एक मुस्लिम ज़िम्मेदार शख़्स अपने परिवार का भरण-पोषण करे तो पर पढ़कर विदेश में प्रोफ़ेसर बनकर, डॉक्टर-सर्जन, इंजीनियर बनकर नहीं एक कामगार मज़दूर बनकर!

 

मरकज़ी हुकूमत एएमयू-जामिया को फ़ण्ड करती है, इन इदारों को संसद के एक्ट से क़ायम किया गया है; लेकिन ये भी तो कहीं दर्ज नहीं है कि अगर ये इदारे केंद्र सरकार से फ़ण्ड लेंगे तो इनका अक़लियती किरदार छिन जाएगा? जिस तरह मोहम्मडन एंग्लो ओरिएण्टल (MAO) कॉलेज को यूनिवर्सिटी बनाने को लेकर 30 लाख का चंदा किया गया था, अंग्रेज़ों के एक्ट से एएमयू का क़याम हुआ और बाद में देश की संसद ने ये माना कि एएमयू का गठन मुल्क के बदहाल मुसलमानों की तालीमी पसमांदगी दूर करने के लिए किया गया है...तब बार-बार एएमयू के इस कैरेक्टर को लील जाने की मुनज़्ज़म प्लाॅनिंग हजम नहीं होती है।

 

क्या BHU में बहुसंख्यक तौर पर हिंदू समाज के छात्र नहीं पढ़ते हैं? यही बात अगर AMU पर लागू हो कि यहां बहुसंख्यक तौर पर मुस्लिम समाज के तलबा तालीम हासिल करें तो इसमें ग़लत क्या है?! एक दौर ऐसा भी था जब देश की आज़ादी से पहले BHU माइनॉरिटी इंस्टिट्यूट था क्योंकि तब सत्ता की चाभी अंग्रेज़ों के हाथों में थी और हिन्दू समाज ने अपने बच्चों के मुस्तक़बिल को महफ़ूज़ करने के लिए बहुसंख्यक होते हुए भी BHU में हिंदू स्टूडेंट्स के लिए दाख़िले में आरक्षण लागू किया था...आज यही तस्वीर मुस्लिमों के सामने है कि वो अल्पसंख्यक हैं और सत्ता हिन्दू समाज के पास है...ऐसे में एएमयू में मुस्लिम समाज के बच्चों को आरक्षण मिलना एक तार्किक मौज़ूं है और ऐसा हर हाल में होना भी चाहिए!

 

एक मज़बूत लोकतंत्र में जब तक ये बुनियादी सोच नहीं पनपती है कि अल्पसंख्यकों के उत्थान के बिना, इनकी तालीमी बेदारी के बिना, इनकी आर्थिक उन्नति के बिना एक मुल्क का सपना अधूरा है तब तक हम ख़ालिस भाषणों में ही देश के संविधान की दुहाई देते रहेंगे...देश का संविधान हमें अपनी अंतरात्मा में आत्मसात करना होगा तभी सर्वसमाज का उत्थान सुनिश्चित हो पाएगा!

 

भारत सरकार सुप्रीम कोर्ट में क्या अपना ये मुवक़्क़ुफ़ साफ़ नहीं करेगी कि अगर वो एएमयू और जामिया के मुस्लिम अल्पसंख्यकों का 'तालीमी चीरहरण' करना चाहती है तो देश के सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध के 13 हज़ार शिक्षण-संस्थानों का क्या होगा जो इसी बुनियाद कर क़ायम हैं और चल रहे हैं जिस तरह से एमयू और जामिया?!

 

क्या 20 करोड़ मुस्लिम, 3 करोड़ ईसाई, 2 करोड़ सिख और अन्य बौद्ध-पारसी-जैन अल्पसंख्यक समाज के बच्चों की तालीमी बेदारी के लिए और भी शिक्षण-संस्थान नहीं खुलने चाहिए? क्या एएमयू अकेला करोड़ों मुस्लिम बच्चों की तालीमी ज़रूरतों को पूरी कर सकता है? जब सरकार को देश में अल्पसंख्यकों-पिछड़ों-दलितों-आदिवासियों के शैक्षणिक -उत्थान के लिए नए तालीमी इदारे खोलने चाहिए वो एएमयू और जामिया पर पिली पड़ी है।

 

ये सब एक तंदुरुस्त जम्हूरियत के लिए मुनासिब नहीं। अगर सरकार अपने संविधान-प्रदत्त अधिकारों का अनुचित दोहन करती है तो इससे किसी भी धर्म-सम्प्रदाय का भला होने से रहा...देश में धर्म के चश्मे से तालीमी असहिष्णुता का बीज रोपकर बीजेपी हुकूमत वोट तो ले सकती है, लेकिन इससे अन्ततोगत्वा समाज का ही अहित होगा...

पवित्र ‘‘गीता’’ सभी को कर्तव्य एवं न्याय के मार्ग पर चलने की सीख देती है

(1) पवित्र ‘‘गीता’’ हमें कर्तव्य एवं न्याय के मार्ग पर चलने की सीख देती है:-

श्रावण कृष्ण अष्टमी पर जन्माष्टमी का पावन त्यौहार बड़ी ही श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा की जेल में हुआ था। कर्षति आकर्षति इति कृष्णः। अर्थात श्रीकृष्ण वह है जो अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। श्रीकृष्ण सबको अपनी ओर आकर्षित कर सबके मन, बुद्धि व अहंकार का नाश करते हैं। भारतवर्ष में इस महान पर्व का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक दोनों तरह का विशिष्ट महत्व है। यह त्योहार हमें आध्यात्मिक एवं लौकिक संदेश देता है। आस्थावान लोग इस दिन घर तथा पूजा स्थलों की साफ-सफाई, बाल कृष्ण की मनमोहक झांकियों का प्रदर्शन तथा सजावट करके बड़े ही प्रेम व श्रद्धा से आधी रात के समय तक व्रत रखते हैं। श्रीकृष्ण के आधी रात्रि में जन्म के समय पवित्र गीता का गुणगान तथा स्तुति करके अपना व्रत खोलते हैं तथा पवित्र गीता की शिक्षाआंे पर चलने का संकल्प करते हैं। साथ ही यह पर्व हर वर्ष नई प्रेरणा, नए उत्साह और नए-नए संकल्पों के लिए हमारा मार्ग प्रशस्त करता है। हमारा कर्तव्य है कि हम जन्माष्टमी के पवित्र दिन श्रीकृष्ण के चारित्रिक गुणों को तथा पवित्र गीता की शिक्षाओं को ग्रहण करने का व्रत लें और अपने जीवन को सार्थक बनाएँं। यह पर्व हमें अपनी नौकरी या व्यवसाय को समाज हित की पवित्र भावना के साथ अपने निर्धारित कर्तव्यों-दायित्वों का पालन करने तथा न्यायपूर्ण जीवन जीते हुए न्यायपूर्ण समाज के निर्माण की सीख देता है।

(2) ‘कृष्ण’ को कोई भी शक्ति प्रभु का कार्य करने से रोक नहीं सकी:-

कृष्ण के जन्म के पहले ही उनके मामा कंस ने उनके माता-पिता को जेल में डाल दिया था। राजा कंस ने उनके सात भाईयों को पैदा होते ही मार दिया। कंस के घोर अन्याय का कृष्ण को बचपन से ही सामना करना पड़ा। कृष्ण ने बचपन में ही ईश्वर को पहचान लिया और उनमें अपार ईश्वरीय ज्ञान व ईश्वरीय शक्ति आ गई और उन्होंने बाल्यावस्था में ही कंस का अंत किया। इसके साथ ही उन्होंने कौरवों के अन्याय को खत्म करके धरती पर न्याय की स्थापना के लिए महाभारत के युद्ध की रचना की। बचपन से लेकर ही कृष्ण का सारा जीवन संघर्षमय रहा किन्तु धरती और आकाश की कोई भी शक्ति उन्हें प्रभु के कार्य के रूप में न्याय आधारित साम्राज्य धरती पर स्थापित करने से नहीं रोक सकी। परमात्मा ने कृष्ण के मुँह का उपयोग करके न्याय का सन्देश पवित्र गीता के द्वारा सारी मानव जाति को दिया। परमात्मा ने स्वयं कृष्ण की आत्मा में पवित्र गीता का ज्ञान अर्जुन के अज्ञान को दूर करने के लिए भेजा। इसलिए पवित्र गीता को कृष्णोवाच नहीं भगवानोवाच अर्थात कृष्ण की वाणी नहीं वरन् भगवान की वाणी कहा जाता है। हमें भी कृष्ण की तरह अपनी इच्छा नहीं वरन् प्रभु की इच्छा और प्रभु की आज्ञा का पालन करते हुए प्रभु का कार्य करना चाहिए।   

(3) परमात्मा सज्जनों का कल्याण तथा दुष्टों का विनाश करते हैं:-

महाभारत में परमात्मा की ओर से वचन दिया गया है कि ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत,

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्, धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे।।’ अर्थात धर्म की रक्षा के लिए मैं युग-युग में अपने को सृजित करता हूँ। सज्जनों का कल्याण करता हूँ तथा दुष्टों का विनाश करता हूँं। धर्म की संस्थापना करता हूँ। अर्थात एक बार स्थापित धर्म की शिक्षाओं को पुनः तरोताजा करता हूँ। अर्थात जब से यह सृष्टि बनी है तब से धर्म की स्थापना एक बार हुई है। धर्म की स्थापना बार-बार नहीं होती है। (अ) परमात्मा ने अपने धर्म (या कत्र्तव्य) को स्पष्ट करते हुए अपने सभी पवित्र शास्त्रों में एक ही बात कही है जैसे पवित्र गीता में कहा है कि मेरा धर्म है, ‘‘परित्राणांय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्’’ अर्थात परमात्मा की आज्ञाओं को जानकर उन पर चलने वाले सज्जनों (अर्थात जो अपनी नौकरी या व्यवसाय समाज के हित को ध्यान में रखकर करते हैं) का कल्याण करना तथा मेरे द्वारा निर्मित समाज का अहित करने वालों का विनाश करना।

(ब) परमात्मा ने आदि काल से ही मनुष्य का धर्म (कत्र्तव्य) यह निर्धारित किया है कि वह केवल अपने सृजनहार परमात्मा की इच्छाओं एवं आज्ञाओं को शुद्ध एवं पवित्र मन से पवित्र ग्रन्थों को गहराई से पढ़कर जाने एवं उन शिक्षाओं पर चलकर बिना किसी भेदभाव के सारी सृष्टि के मानवजाति की भलाई के लिए काम करें। मनुष्य के जीवन का उद्देश्य है कि प्रभु की शिक्षाओं को जानना तथा पूजा के मायने है उनकी शिक्षाआंे पर दृढ़तापूर्वक चलना। मात्र भगवान श्रीकृष्ण के शरीर की पूजा, भोग लगाने तथा आरती उतारने से कोई लाभ नहीं होगा।

(4) सारी सृष्टि की भलाई ही हमारा धर्म है:-

भगवान श्रीकृष्ण से उनके शिष्य अर्जुन ने पूछा कि प्रभु! आपका धर्म क्या है? भगवान श्रीकृष्ण ने अपने शिष्य अर्जुन को बताया कि मैं सारी सृष्टि का सृजनहार हूँ। इसलिए मैं सारी सृष्टि से एवं सृष्टि के सभी प्राणी मात्र से बिना किसी भेदभाव के प्रेम करता हूँ। इस प्रकार मेरा धर्म अर्थात कर्तव्य सारी सृष्टि तथा इसमें रहने वाली मानव जाति की भलाई करना है। इसके बाद अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि भगवन् मेरा धर्म क्या है? भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि तुम मेरी आत्मा के पुत्र हो। इसलिए मेरा जो धर्म अर्थात कर्तव्य है वही तुम्हारा धर्म अर्थात कर्तव्य है। अतः सारी मानव जाति की भलाई करना ही तुम्हारा भी धर्म अर्थात् कर्तव्य है। भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि इस प्रकार तेरा और मेरा दोनों का धर्म अर्थात् कर्तव्य सारी सृष्टि की भलाई करना ही है। यह सारी धरती अपनी है तथा इसमें रहने वाली समस्त मानव जाति एक विश्व परिवार है। इस प्रकार यह सृष्टि पूरी की पूरी अपनी है परायी नहीं है।

(5) ‘अर्जुन’ के मोह का नाश प्रभु की इच्छा और आज्ञा को पहचान लेने से हुआ:-

कृष्ण के मुँह से निकले परमात्मा के पवित्र गीता के सन्देश से महाभारत युद्ध से पलायन कर रहे अर्जुन को ज्ञान हुआ कि कर्तव्य ही धर्म है। न्याय के लिए युद्ध करना ही उसका परम कर्तव्य है। उस समय राजा ही जनता के दुःख-दर्द को सुनकर न्याय करते थे। कोई कोर्ट या कचहरी उस समय नहीं थी। जब राजा स्वयं ही अन्याय करने लगे तब न्याय कौन करेगा? न्याय की स्थापना के लिए युद्ध के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं बचा था। भगवानोवाच पवित्र गीता के ज्ञान को एकाग्रता से सुनने के बाद अर्जुन हाथ जोड़कर बोला प्रभु अब मेरे मोह का नाश हो गया है और मुझे ईश्वरीय ज्ञान एवं मार्गदर्शन मिल गया है। अब मैं निश्चित भाव से युद्ध करुँगा। अर्जुन ने विचार किया कि जो परमात्मा की बनायी सृष्टि को कमजोर करेंगे वे मेरे अपने कैसे हो सकते हैं? पवित्र गीता के ज्ञान को जानकर उसने निर्णय लिया कि न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दण्ड देना चाहिए। फिर अर्जुन ने अन्याय के पक्ष में खड़े अपने ही कुल के सभी अन्यायी यौद्धाओं तथा 11 अक्षौहणी सेना का महाभारत का युद्ध करके विनाश किया। इस प्रकार अर्जुन ने धरती पर प्रभु का कार्य करते हुए धरती पर न्याय के साम्राज्य की स्थापना की।

(6) ‘माता देवकी’ ने प्रभु की इच्छा और आज्ञा को पहचान लिया:-

कृष्ण की माता देवकी ने प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा को पहचान लिया और वह एक महान नारी बन गईं तथा उनका सगा भाई कंस ईश्वर को न पहचानने के कारण महापापी बना। देवकी ने अपनी आंखों के सामने एक-एक करके अपने सात नवजात शिशुओं की हत्या अपने सगे भाई कंस के हाथों होते देखी और अपनी इस हृदयविदारक पीड़ा को प्रभु कृपा की आस में चुपचाप सहन करती रही। देवकी ने अत्यन्त धैर्यपूर्वक अपने आंठवे पुत्र कृष्ण के अपनी कोख से उत्पन्न होने की प्रतीक्षा की ताकि मानव उद्धारक कृष्ण का इस धरती पर अवतरण हो सके तथा वह धरती को अपने भाई कंस जैसे महापापी के आतंक से मुक्त करा सके तथा धरती पर न्याय आधारित ईश्वरीय साम्राज्य की स्थापना हो।

(7) परमात्मा का वास मनुष्य के पवित्र हृदय में होता है:-

परमात्मा ने कहा कि मैं केवल आत्म तत्व हूँ और मैं मनुष्य की सूक्ष्म आत्मा में ही रहता हूँ। वहीं से इस सृष्टि का संचालन करता हूँ। ‘जबकि मेरी रचना- अर्थात मनुष्य’ के हृदय में (1) आत्मतत्व होने के साथ ही साथ उसके पास (2) शरीर तत्व या भौतिक तत्व भी होता है। यह सारी सृष्टि और सृष्टि की सभी भौतिक वस्तुएं मैंने मनुष्य के लिए बनायी हैं। बस मनुष्य का हृदय और आत्मा मैंने अपने रहने के लिए बनायी है। ऐसा न हो कि कहीं हमारे हृदय में उत्पन्न स्वार्थ का भेड़िया हमारी आत्मा को ही न नष्ट कर डाले। ‘गीता’ का सन्देश है कि न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दण्ड देना चाहिए। हमारे ऋषि-मुनियों का चारों वेदों के ज्ञान का एक लाइन में सार है कि उदारचरितानाम्तु वसुधैव कुटुम्बकम् अर्थात उदार चरित्र वाले के लिए यह वसुधा कुटुम्ब के समान है। गीता का एक लाइन में सार है - सर्वभूत हिते रतः अर्थात समस्त प्राणी मात्र केे हित में रत हो जाये।    

(8) विद्यालय है सब धर्मों का एक ही तीरथ-धाम:-

 

विद्यालय एक ऐसा स्थान है जहाँ सभी धर्मों के बच्चे तथा सभी धर्मों के टीचर्स एक स्थान पर एक साथ मिलकर एक प्रभु की प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना का यह ही सही तरीका है। सारी सृष्टि को बनाने वाला और संसार के सभी प्राणियों को जन्म देने वाला परमात्मा एक ही है। सभी अवतारों एवं पवित्र ग्रंथों का स्रोत एक ही परमात्मा है। हम प्रार्थना कहीं भी करें, किसी भी भाषा में करें, उनको सुनने वाला परमात्मा एक ही है। अतः परिवार तथा समाज में भी स्कूल की तरह ही सभी लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ मिलकर एक प्रभु की प्रार्थना करें तो सबमें आपसी प्रेम भाव भी बढ़ जायेगा और संसार में सुख, एकता, शान्ति, न्याय एवं अभूतपूर्व भौतिक एवं आध्यात्मिक समृद्धि आ जायेगी। विद्यालय है सब धर्मों का एक ही तीरथ धाम - क्लास रूम शिक्षा का मंदिर, बच्चे देव समान।

लेखक - डाॅ. जगदीश गांधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक,

सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

 

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रचनाकारों के तानाशाही दुनिया बन रही सोशल मीडिया...!

फेसबुक का प्रयोग लोग घृणा फैलाने के लिए कर रहे हैं । जो लोग इसे फैलाने की कोशिश कर रहें हैं उनकी हिम्मत बहुत बढ़ी हुई है । वे स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी अल्ल बल्ल बक रहे हैं । वे जो बोल रहे हैं जो फैला रहे हैं वो मार्केट की रेशनल्टी को क्रॉस नहीं कर पा रहा है पर इसकी डैमेज कॉस्ट भोले मस्तिष्क पर बहुत ज्यादा है । सरकार को सोशल मीडिया को ध्यान में रख कर एक कानून बनाने की ज़रूरत है । जिसका दायरा बहुत व्यापक हो । वो कानून ऐसा हो कम्युनेशन के खिलाड़ियों के खेल को समझ सके उन्हें दंडित कर सके ।

 

फेसबुक और ट्विटर अपने कानूनों से चलने वाली चीजें हैं । पर देश मे इस संदर्भ में लॉ ऑफ लैंड की ज़रूरत है जो फेसबुक और ट्विटर के ऊपर हो । जब एक्सप्रेशन को रिस्ट्रिक्शन के कानून भारत मे साठवें दशक से सत्तर के दशक तक आते आते स्थाई हो गए थे । वे कानून प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए ठीक हैं पर सोशल मीडिया के लिए नाकाफी हैं । रयूमर और घृणा के फैलने के तरीके बहुत तेज़ हो चुके हैं । क्या बुरा है कि फेसबुक और ट्विटर आई डी आधार से लिंक हों । जो हो आइडेंटिटी के साथ हो । अगर आप इतने ही ईमानदार हैं तो अभव्यक्ति के खतरे उठाएंगे । आप शूट एंड स्कूट न करना चाहेंगे न ही करेंगे । जान पहचान के मुहल्ले में और बिना जान पहचान के शहर में व्यवहार के पैटर्न बिल्कुल अलग होते हैं ।

 

बहुत से अपराध शहर में इसलिए होते हैं क्यो कि अडेन्टिटी छुपी रहती है पर जान पहचान के मुहल्लों में ऐसा नहीं होता । क्यों डिस्कोथीक में बत्तियाँ चकमक चकमक करती हैं क्यो फ़्यूम उड़ाया जाता है क्यो नाचने से पहले नकाब लगाए जाते हैं इन सबके पीछे छुपा है आइडेंटिटी का छुपाव । आइडेंटिटी के छुपते ही गैर जिम्मेदार अवचेतन सामने आ जाता है । फेसबुक में जो होती है वो कई बार अवचेतन की लड़ाइयाँ ही होती है । ऐसा अवचेतन जिसे सभयता और कानून के बंधनों ने दबाया और कमजोर किया है । ऐसा अवचेतन जो किसी भी सभ्यता के निर्माण में बाधक है।जंगल पर अवचेतन हावी रहता है और महान संस्कृतियों पर सक्रिय चेतन ।

 

जर्मनी ने सोशल मीडिया के लिए कठोर कानून बने हैं । दुनिया तानाशाहों की थी तब रचनाकारों को स्वतंत्रता की ज़रूरत थी पर सोशल मीडिया रचनाकारों के तानाशाही की दुनिया है । किसी को घसीटना और मारना बहुत आसान है । ये गैंग्स ऑफ वासेपुर की दुनिया है । यहाँ तक पुलिस नहीं पहुँच पाती । जो सोंच रहे हैं कि आज रामाधीर सिंह हावी है वे नहीं जानते कि रामाधीर सिंह की कोख में सरदार खान पैदा ले चुका है । धृणा के दो हिस्से होते हैं और बिना मूठ की तलवार होती है । वो जिसके हाँथ में होती है उनसे भी काटती है जिसे लगती है उसे भी । मानता हूँ कि  सोशल मीडिया इस जनतंत्र की सेल्फी विद आउट मेकअप है फिर भी इसे सेल्फी विदाउट ड्रेस नहीं होने दिया जा सकता ।

Exclusive Report -झारखंड में आदिवासियों की हालत बदतर कुपोषण ,मलेरिया के शिकार हैं हज़ारों बच्चे

झारखंड के कोल्हान क्षेत्र अंतर्गत सारंडा एवं आसपास के क्षेत्रों में आदिवासियों की हालत चिंताजनक है. आदिवासियों की स्थिति को नजदीक से जानने - समझने के लिए झारखंड के विनोबा भावे विश्वविद्यालय के एलएलबी के छात्र संजय मेहता इन दिनों नक्सल प्रभावित सारंडा वन क्षेत्र में हैं.

 

वे गाँव - गाँव जाकर , आदिवासियों के बीच समय बिताकर उनकी स्थितियों का अध्ययन कर रहे हैं. संजय मेहता का यह प्रयास एक व्यक्तिगत प्रयास है.आदिवासियों  से आत्मीय जुड़ाव के कारण वे व्यक्तिगत तौर पर इस कार्य को अंजाम दे रहे हैं.पिछले माह की 21 जून से लगातार वे गाँवों का दौरा कर आदिवासियों से मिल रहे हैं.उनके दर्द को बांट रहे हैं.

पढ़िए सारंडा के बीहड़ों से संजय मेहता की यह रिपोर्ट......

 

झारखंड की राजधानी राँची से चाईबासा की दूरी 136 किमी है. वहीं सारंडा लगभग 200 किमी दूर है. चाईबासा झारखंड के कोल्हान प्रमंडल का मुख्यालय है . इस क्षेत्र को पश्चिमी सिंहभूम एवं लोहांचल के नाम से जाना जाता है. इन क्षेत्रों में आदिवासियों की हालत जानवरों से भी बदतर है . आदिवासी जीविका के लिए तरस रहे हैं .

 

आदिवासी गाँव के लगभग हर बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. बच्चों को शिशुकाल में पोषण नहीं मिल रहा है. बच्चों की हालत चिंताजनक है. गर्भवती महिलाओं को भयंकर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. लौह अयस्क क्षेत्र होने के कारण लोगों को पीने के पानी की भी समस्या है.

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अपनी माँ के साथ कुपोषित बच्चा

 

21 जून से लगातार मैं इस क्षेत्र के तमाम गाँवों में वक्त गुजार कर इनकी स्थितियों का पड़ताल कर रहा हूँ.हर तरफ निराशा और बेबसी है. ऐसा प्रतीत होता है जैसे इन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया गया है. आदिवासियों की जो हालत इस क्षेत्र में है वह रोंगटे खड़ी करती है. काफी निराशाजनक स्थिति है. क्षेत्र के किरीबुरू ,  मेघाहातुबुरु , बदजामदा , गुवा , कोटगढ़ , जेटेया , बड़ापसिया , लोकसाई , बालिझरण , दिरीबुरु , बराईबुरु , टाटीबा , पेटेता, पोखरपी , कादजामदा , महुदी , नोवामुंडी समेत कई अन्य गाँवों में आदिवासी जिंदगी से जद्दोजहद कर रहे हैं.

 

सरकार - सिस्टम पूरी तरह फेल

 

आदिवासी परिवारों की हालत देखकर यह कहा जा सकता है कि सरकार और सिस्टम इस क्षेत्र में पूरी तरह फेल है . अस्पतालों में डॉक्टर नहीं , स्कूलों में शिक्षक नहीं , गाँव का हर बच्चा कुपोषण का शिकार . जीविका के लिए प्रकृति पर निर्भरता.  शासन व्यवस्था से कटे इन गाँवों की हालत  सरकार एवं नौकरशाही के कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़ी करती है.

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बड़ापासिया पंचायत क्षेत्र में दूषित पानी के कारण आदिवासियों के नाखूनों में हुआ संक्रमण

 

यूनिसेफ और राज्य सरकार के रिपोर्ट में हो चुकी है कुपोषण की पुष्टि

 

फरवरी 2017 में राज्य सरकार एवं यूनिसेफ की एक रिपोर्ट जारी की गई थी जिसमे कहा गया था कि सारंडा क्षेत्र के 20 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं.

इस रिपोर्ट में सही आंकड़ा नहीं पेश किया गया. सच्चाई को छुपा दिया गया. क्षेत्र की जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है. 20 प्रतिशत से कहीं अधिक लगभग बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. लगभग हर आदिवासी बच्चा कुपोषण का शिकार है. बच्चे हड़िया पीकर जीवित हैं. बच्चों के पेट फुले हुए हैं. कई बच्चे बीमारी से मर भी जाते हैं .लेकिन किसी को कुछ पता भी नहीं चल पाता.

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बड़ानंदा पंचायत के सर्बिल गाँव में अपनी 19 माह की कुपोषित बहन को हड़िया पिलाती एक छोटी बच्ची

 

सुदूर गाँवों में सुविधाएं मयस्सर नहीं

 

इस क्षेत्र के सुदूर गाँवों में सरकारी सुविधाओं का बुरा हाल है. ग्रामीणों के सामने पीने के पानी के लाले हैं. बेरोजगारी चरम सीमा पर है. कई गांवों में बिजली भी नहीं पहुँची है. कई क्षेत्रों में सड़कों की हालत जर्जर है. कुछ गाँवों में सड़कें बनी हैं.

 

पंचायती चुनाव से चुनकर आए जनप्रतिनिधि भी खनन क्षेत्र होने के कारण विकास योजनाओं को जनता तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं. किरीबुरू पंचायत की मुखिया पार्वती कीड़ो ने बताया कि सेल लीज क्षेत्र होने के कारण विकास की राशि वापस चली जाती है. सेल अनापत्ति प्रमाण पत्र प्रदान नहीं करती है क्योंकि सेल का अपना सीएसआर का कार्य होता है. उन्होंने कहा कि इस ओर कई बार पदाधिकारियों का ध्यान आकृष्ठ कराया गया लेकिन कुछ नहीं हुआ.

 

क्या कहते हैं ग्रामीण

 

क्षेत्र के कोटगढ़ पंचायत के काठिकोडा गाँव के संतोष लागुरी कहते हैं कि हम गरीब लोग हैं. सरकार हमारे ऊपर ध्यान नहीं दे रही है. गाँव के बच्चे मलेरिया - कुपोषण से पीड़ित हैं. हमलोग तंग आ चुके हैं.

 

किरीबुरू के जोलजेल बिरुआ दुर्दशा  बताते हुए कहते हैं कि सरकार की हर योजना फेल है. हमलोग को कुछ सुविधा कहीं से नहीं मिल रहा है. बडाजामदा के प्रफुल्लो नाकुड़ ने कहा कि हमारे क्षेत्र में विकास का काम भगवान भरोसे है. बच्चे बीमार रहते हैं.अस्पताल में डॉक्टर नहीं आते हैं.हमलोग करे भी तो क्या करें ?

 

गुवा के जुदा बोदरा ने कहा कि एक तो हमलोग बेरोजगार है. ऊपर से सरकार मदद नहीं करती. बच्चों को बीमारी हो जा रही है.मलेरिया का प्रकोप है. कुछ सुविधा नहीं मिलती.हमलोग बहुत मुश्किल में हैं.

 

बड़ापासिया गाँव के घनश्याम बोबोंगा कहते हैं  कि आदिवासियों की हालत बहुत खराब है. हमलोग निम्न स्तर की जिंदगी जीने को मजबूर हैं. सरकार की सुविधा हमलोगों को नसीब नहीं है. कोई अधिकारी भी इधर कभी नहीं आते हैं.

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कोलई (मेफ्लाई) कीड़े को बेचती आदिवासी महिला

 

ग्रामीणों ने बताया कि खराब पानी के कारण हम सबों के पैरों एवं नाखूनों में अलग तरीके का संक्रमण हो गया है. नोवामुंडी की आदिवासी महिलाओं ने कहा कि हम कोलई नाम के कीड़े को भूनकर खाते हैं. इस कीड़े को भूनकर बेचते भी हैं . अभी के मौसम में यह हमारे भोजन और जीविका का मुख्य साधन है. कई अन्य गाँवों के ग्रामीणों ने भी अपना दुख व्यक्त किया.

 

 

सारंडा एक्शन प्लान छलावा: ग्रामीण

 

ग्रामीण कहते हैं झारखंड बनने के बाद आदिवासियों के विकास की बात कही गयी . कई वादे किए गए . करोड़ों रुपये खर्च किये गए . केंद्र सरकार ने भी पहल की लेकिन तस्वीर नहीं बदली. पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने भी इस क्षेत्र में कई दौरा किया था. फिर भी तमाम दावों के बावजूद आदिवासियों की हालत नहीं बदली.

 

आदिवासी जानवरों की जिंदगी जीने को मजबूर हैं. लोगों की निराशा आक्रोश का रूप धारण कर रही है. व्यवस्था के प्रति इनलोगों में गुस्सा बढ़ा है. पूरे क्षेत्र के हालात खुद बयां करते हैं कि सारंडा एक्शन प्लान एक छलावा बनकर रह गया. आदिवासी आज भी वहीं हैं.

 

 

भूतपूर्व सैनिकों को राह दिखाती एक संस्था -"वाॅरियर्स क्लब"

नयी दिल्ली। जो सैनिक पूरी जवानी देश के दुर्गम इलाकों,बर्फ और पहाड़ो में काटता है और हर तरह के कठिन परिस्थितियों में देश की सेवा में अपनी प्राणों की आहूति देने को तैयार रहता है वही सैनिक जब अपनी ड्यूडी पूरी कर रिटायर्ड होते है तो उन्हें सामने फिर एक नई परिस्थिती आ जाती है जिसमें वास्तविक जीवन में उसको कई कठिनाईयों का सामना करना पडता है। नई नौकरी ढूंढने से लेकर, बच्चों की शिक्षा,मकान से लेकर हर तरह की समस्या उसके सामने खडी हो जाती है। जो सैनिक रात भर जागकर हमे चैन की नींद सोने देता है उसी का शोषण शुरु हो जाता है। इन्हीं सब चीजों को ध्यान में रखकर दो भूतपूर्व सैनिकों ने मिलकर Warrior 's Club की स्थापना की है।

 

Warrior 's Club  सन 2016 में भूतपूर्व सैनिक प्रदीप शर्मा द्वारा स्थापित किया गया तथा Warrior 's Club भूतपूर्व सैनिकों (NCOs / JCOs ) के लिए लगातार कार्यरत है। इसके संस्थापक प्रदीप शर्मा का मानना है की हमारे देश की सेना में सैनिकों को कई क्षेत्रों (जैसे सुरक्षा, प्रशासन एवं सप्लाई चेन आदि) में उत्तम दर्जे का प्रशिक्षण प्राप्त होता है, हालाँकि सेना से बाहर कल्चरल डिफरेंस की वजह से सैनिकों को नौकरी ढूंढने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इसके अलावा, भूतपूर्व सैनिक सेना से बाहर कम वेतन मिलने की वजह से कई सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं।

 

इन सभी बातों को मध्य नज़र रखते हुए प्रदीप शर्मा ने अपने सहयोगी सतीश कुमार के साथ मिल कर Warrior 's Club की स्थापना की, जिसके माध्यम से वे भूतपूर्व सैनिकों को विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं, जिसमे सबसे महत्वपूर्ण, Orientation प्रोग्राम (डिफेन्स टू कॉर्पोरेट) एवं भूतपूर्व सैनिकों को नौकरी दिलवाने में मदद करना है।  इसके अतिरिक्त भी Warrior 's Club , अपने मेंबर्स को कई विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध करवाता है। पिछले एक वर्ष में Warrior 's Club अपने कई मेंबर्स को अच्छी नौकरी दिलवाने में मदद की है।

 

Warrior 's Club भूतपूर्व सैनिकों के परिवार के लोगों का भी ध्यान रखता है और सैनिकों के बच्चों की हाॅयर एजुकेशन के लिए काउंसिलिंग तथा सरकारी नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में भी मदद करता है। साथ ही भूतपूर्व सैनिकों के परिवार वालों के लिए इनके द्वारा स्थापित अन्य शहरों के Warrior 's Club में रहने खाने की सुविधा भी दी जाती है।

 

 

Warrior 's Club के इन प्रयासों की कई इंडस्ट्री लीडर्स एवं संस्थाओं ने सराहना की है एवं इसे भूतपूर्व सैनिकों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। वारियॅर क्लब की लक्ष्य भूतपूर्व सैनिकों में नई चेतना का संचार करना तथा राज्य की नीति से हटकर भूतपूर्व सैनिको को सहयोग प्रदान करते रहना है जिससे बदलते नए परिवेश में सैनिक अपने को समाज में स्थापित कर सकें।

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