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updated 4:51 PM UTC, Feb 19, 2018
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अकेलेपन की समस्या से जूझता समाज-ललित गर्ग

नई दिल्ली|संचार के बढ़ते साधनों के बीच अकेलापन आधुनिक जीवन की त्रासदी बनती जा रही है। विडम्बनापूर्ण एवं भयावह अकेलापन आधुनिक जीवन की एक बड़ी सच्चाई है। यह न केवल भारत की समस्या है बल्कि दुनियां भी इससे त्रस्त एवं पीड़ित है। समस्या इतनी बड़ी है कि इससे निपटने के लिए ब्रिटिश सरकार ने तो बाकायदा एक मंत्रालय ही गठित कर लिया है।

 

 

अकेलापन जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है और दुर्भाग्यवश ऐसे अभिशप्त लोगों की संख्या में दिन-प्रतिदिन बढ़ोत्तरी होती जा रही है। इसमें जीवन के हर जाति, आयु, वर्ग के स्त्री-पुरुष शामिल हैं। अकेलेपन की त्रासदी भोगने वाले इस समूह में सिर्फ वे लोग नहीं हैं जो किसी कारणवश अकेले रहने को मजबूर है।बल्कि वे लोग भी हैं जो परिवार के साथ रहते हुए, कार्यस्थल पर भरेपूरे माहौल में एवं भीड़ के बीच भी खुद को अलग-थलग और अकेला महसूस करते हैं एवं अपने को बेहद तन्हा पाते है।



अकेलेपन की समस्या विश्वव्यापी है। यह आधुनिक जीवन की देन है। जिसमें समाज ‘हम’ से ‘मैं’ पर आ गया है। व्यस्तताएं कुछ इस कदर बढ़ गई हैं कि मित्रों के लिए क्या, परिवार के सदस्यों के लिए भी क्या, अपनी जीवनसंगिनी के साथ जीवन में स्थान बना पाना कठिन हो गया है। आज जीवन की पूरी जद्दोजहद खुद के लिए है, शेष सारे रिश्तें एवं खुशियां गौण हो गई हैं।

 

इसी समस्या से जूझते ब्रिटिश में, इस समस्या को लेकर वहां की प्रधानमंत्री टरीजा बहुत गंभीर है। उनका का कहना है कि मैं अपने समाज के लिए इस समस्या का सामना करना चाहती हूं। अकेलेपन की समस्या कितनी भयावह है।इस ओर सांसद जो कॉक्स ने सम्पूर्ण ब्रिटेन का ध्यान खींचा था। उन्होंने एक कमिशन गठित किया था, जिसका मकसद इस समस्या का आकलन करना और इसे दूर करने के उपाय ढूंढना था।

 

इसी आयोग ने अकेलापन मंत्रालय गठित करने का सुझाव दिया था। दुर्भाग्य से 2016 में दक्षिणपंथी उग्रवादियों ने कॉक्स की हत्या कर दी। आंकड़ों के मुताबिक वहां हर दस में एक से ज्यादा लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं। 75 साल से ज्यादा उम्र के ज्यादातर लोग वहां अकेले रहते हैं और दो लाख की आबादी ऐसी है।जिसे किसी मित्र या रिश्तेदार से बात किए महीना गुजर जाता है।वहां ज्यादातर डॉक्टरों के पास रोजाना एक से पांच मरीज सिर्फ इसीलिए आते हैं क्योंकि वे अकेले होते हैं। यह स्थिति तकरीबन सभी विकसित देशों की है।

 

बात केवल ब्रिटेन की ही नहीं है, पूरी दुनिया और भारत भी इस समस्या से पीड़ित हैं। भारत में संयुक्त परिवारों के विघटन और एकल परिवारों के चलन ने इस समस्या को बढ़ावा दिया है। हम कहने को तो युवा देश हैं, लेकिन अपने यहां बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है।

 

अगर आंकड़ों की बात करें तो 60 से 70 आयु वर्ग के लोगों की संख्या इसमें सबसे ज्यादा है। हाल के वर्षों में 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की आबादी जनसंख्या वृद्धि की सामान्य दर के मुकाबले दोगुना तेजी से बढ़ी है। फिलहाल इस श्रेणी के लोगों की कुल संख्या 10 करोड़ बताई जाती है।

 

लेकिन अनुमान है कि 2050 तक कुल जनसंख्या का चैथाई हिस्सा बुजुर्ग लोगों का होगा। इनमें शहर और खासकर महानगरों में रहने वाले लोग ज्यादा हैं। इन शहरों में बच्चे मां-बाप को अपनी सुविधानुसार रहने के लिए तो बुला लेते हैं, पर उन्हें वक्त नहीं दे पाते। ऐसे बुजुर्ग प्रायः अपना अकेलापन दूर करने के लिए अत्यन्त लोकप्रिय हो रही सोशल नेटवर्किंग साइट का सहारा लेते हैं और उसी के इर्द-गिर्द अपनी दुनिया बसा लेते है।

 

ये बुजुर्ग देर रात तक अपने आप को इसमें व्यस्त रखते हैं। अकेलेपन से जूझते इन बुजुर्गों की तकलीफ समझने के लिए किसी आंकड़े की जरूरत नहीं है। अपने बाल-बच्चों की जिंदगी से दूर पड़े ये लोग गली-मुहल्लों में जानवरों पर प्यार लुटाते नजर आते हैं।हालांकि उनसे इनकी समस्या नहीं सुलझती, असुरक्षा नहीं दूर होती।

 

सबसे बड़ी बात यह है कि अपने देश में अकेलेपन की यह भीषण समस्या बुजुर्गों तक सीमित नहीं है, महिलाएं और युवक भी इसके शिकार हैं। करियर संवारने की कोशिश में अपने मां-बाप, भाई-बहन से दूर महानगरों में जाकर रहने वाले बहुतेरे युवा भी अकेलेपन से पीड़ित एवं परेशान हैं। इस तरह भारत भी अकेलेपन की समस्या से जूझ रहा है।

 

दुर्भाग्यवश हमारे देश में भी यह समस्या जिस तेजी से पांव पसार रही है,उसे देखते हुए कोई-न-कोई उपाय करना ही होगा। लेकिन हमारे यहां का नेतृत्व एवं सरकारें अभी इतनी संवेदनशील नहीं हुई है और उनके सामने दूसरी राजनीतिक लाभ वाली समस्याओं के अंबार भी है। फिर वे कैसे इंसान के अस्तित्व एवं अस्मिता से जुड़ी इस गंभीर समस्या के लिये सोचे?

 

 

बड़े होते शहरों ने परिवार के साथ-साथ समाज को भी बहुत छोटा और व्यक्ति को कहीं-न-कहीं अकेला कर दिया है। इसी का नतीजा समाज, परिवार एवं व्यक्ति के जीवन में पसरा अकेलापन है।अब तक लोगों के अकेलेपन से अवासदग्रस्त होने की सूचना आती थी। लगता था कि परिवार छोटा हो रहा है और अकेलापन लोगों को खा रहा है। हालत यह है कि बड़े अपार्टमेंटों और सोसायटियों में रहने वाले लोग यह नहीं जानते कि उनके बगल के फ्लैट में कौन रह रहा है। पढ़ा-लिखा और आधुनिक माना जाने वाला इंसान किस तरह केवल अपने परिवार से नहीं, अपने आप तक से कट रहा है।

 

यह अकेलापन अनेक विसंगतियों एवं विडम्बनाओं का कारण भी बन रहा है। अनेक हिंसक एवं अनहोनी घटनाएं इसकी निष्पत्ति के रूप में सामने आ रही है, जो डराती भी है और अनेक प्रश्न भी खड़े करती है। बड़ा प्रश्न तो यही है कि खाते-पीते लोगों को उनका अकेलापन कहां ले के जा रहा है? अकेलेपन के अपने बनाए दायरे ने परिवार के अंदर भी एक दीवार खड़ी कर दी है। इस तरह का एकाकीपन सभी सुविधाओं से संपन्न रिहाइशी इलाकों के बाशिंदों में ज्यादा दिख रहा है।

 

खाते-पीते तबकों में अपनों के साथ की कमी का भाव खुद के प्रति विद्रोह पैदा कर देता है।अपना ही अस्तित्व बेगाना लगने लगता है। सवाल है मन की ग्रंथियों में ये भाव कहां से घुसपैठ कर लेते हैं कि कोई अपने प्रति भी इतना बेहरम हो जाता है?

 

दरअसल, महानगरों में बच्चों के पालन-पोषण के जो तरीके अपनाए जा रहे हैं, उनमें हैसियत का तत्त्व सबसे ऊपर होता है। लेकिन उसमें जो आभिजात्य फार्मूले अंगीकार किए जाते हैं। किसी बच्चे के एकांगी और अकेले होने की बुनियाद वहीं पड़ जाती है। आज यह वक्त और समाज की एक बड़ी और अनिवार्य जरूरत मान ली गई है कि एक आदमी एक ही बच्चा रखे।

 

एकल परिवार के दंपत्ति इस बात को लेकर बेपरवाह रहते हैं कि वे अपने छोटे परिवार के दायरे से निकल कर बच्चों को अपना समाज बनाने की सीख दें। काम के बोझ से दबे-कुचले माता-पिता डेढ़ साल के बच्चे को ‘कार्टून नेटवर्क’ की रूपहली दुनिया के बाशिंदे बना देते हैं या आया के भरोसे या फिर क्रेच के हवाले कर देते हैं।

 

बच्चे के पीछे ऊर्जा खर्च नहीं करनी पड़े, इसलिए उसके भीतर कोई सामूहिक आकर्षण पैदा करने के बजाय उसकी ऊर्जा को टीवी सेट में झोंक देते हैं। इसी टीवी में बड़ी हुई पीढ़ी कैसी बहकी-बहकी कहानियां गढ़ती है?

 

वह ऐसा क्यों नहीं होगा? उसकी दुनिया को समेटते हुए क्या हमें इस बात का भान भी हो पाता है कि हमने उसे इस दुनिया से कैसे काट दिया। होश संभालते ही जिस बच्चे को अपने साथी के रूप में ‘टॉम-जेरी’ और ‘डोरेमॉन’ मिला हो, वह क्यों नहीं आगे जाकर अपने मां-बाप से भी कट जाएगा? हम तथाकथित आधुनिक मां-बाप बच्चे को पूरे समाज से काटते हुए बड़ा बनाते हैं।

 

उसके पास अपना कहने के लिए सिवा अपने मां-बाप के अलावा और कोई नहीं होता। और जब वही मां-बाप साथ छोड़ देते हैं तो वह अपने को निहायत बेसहारा महसूस करने लगता है।अपने घर की चारदीवारी को ही अपनी जीवन की सीमा का अंत मान लेता है।

 

यह अकेलापन इंसान को जीते-जी मार देता है। बर्नार्ड शाॅ के मुताबिक ‘लोग मरते तो बहुत पहले हैं, लेकिन दफनाए बहुत बाद में जाते हैं। मरने और दफनाते के बीच का यह फासला ही अकेलापन की त्रासदी हैं, जिसमें आदमी घूट-घूट कर मरता हैं।

 

अकेलेपन का कारण मन है। लेखिका जेम्स एलेन ने लिखा है कि व्यक्ति का मानस एक बगीचे की तरह होता है, जिसे चाहें तो आप अपनी सूझबूझ से संवारें या उसे जंगली बन जाने दें। हमारा मन भी नकारात्मक विचारों से भर जाता है तब बीमार हो जाता है, तब अकेला हो जाता है।

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आईएएस अनिल गर्ग ने बढ़ाया यूपी का गौरव, राष्ट्रपति करेंगे सम्मान

मनोज श्रीवास्तव/लखनऊ। यूपी काॅडर के वरिष्ठ आईएएस अनिल गर्ग ने भारत निर्वाचन आयोग से उत्तर प्रदेश को राष्ट्रीय पुरस्कार दिला दिया। केंद्रीय निर्वाचन आयोग ने वर्ष 2017 में उत्कृष्ट चुनावी प्रक्रियाओं के लिए राष्ट्रीय पुरस्कारों की घोषणा कर दी है। इसमें विधानसभा चुनाव के दौरान बेहतर सुरक्षा प्रबंधों पर राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए उत्तर प्रदेश को चुना गया है। चुनाव के दौरान श्री गर्ग प्रदेश के अपर मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पद पर तैनात थे। वर्तमान में वह लखनऊ के मंडलायुक्त हैं।

 

आयोग ने देश के सभी मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को पत्र भेजकर इन पुरस्कारों की घोषणा की जानकारी दी है। पुरस्कार वितरण समारोह राष्ट्रीय मतदाता दिवस के मौके पर 24 जनवरी को नई दिल्ली में दिल्ली कैंट स्थित मॉनेकशा सेंटर के जोरावर सभागार में आयोजित किया जाएगा। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद सभी विजेताओं को पुरस्कार प्रदान करेंगे। बेहतर सुरक्षा प्रबंधों के लिए यूपी को राष्ट्रीय पुरस्कार इस कारण दिया गया है क्योंकि वर्ष 2017 के विधासभा चुनाव में कहीं भी हिंसा नहीं हुई थी और पुनर्मतदान की नौबत नहीं आई थी।

 

चुनाव के दौरान सुरक्षा प्रबंधों की जिम्मेदारी तत्कालीन अपर मुख्य निर्वाचन अधिकारी अनिल गर्ग ही संभाल रहे थे। चुनाव के दौरान उन्होंने नई तकनीकी का प्रयोग करके पूरी चुनाव प्रक्रिया की आॅनलाइन निगरानी का भी प्रबंध किया था। इसके अलावा उन्होंने मतदाता सूची में अपना नाम तलाशकर मतदाता पर्ची निकालने में मदद करने वाला नया साफ्टवेयर भी तैयार कराया था। श्री गर्ग इस समय लखनऊ के मंडलायुक्त हैं।

 

इसके अलावा तत्कालीन एडीजी कानून-व्यवस्था दलजीत चौधरी, आईजी कानून-व्यवस्था हरीराम शर्मा और डीजीपी मुख्यालय की ओर से आयोग से संबद्ध किए गए तत्कालीन डीआईजी और अब आईजी रेंज इलाहाबाद रमित शर्मा भी चुनाव में सुरक्षा प्रबंधों से सीधे तौर पर जुड़े हुए थे। आयोग ने चुनाव में नए प्रयोगों के लिए कानपुर नगर के तत्कालीन डीएम कौशल राज शर्मा और मतदाता जागरूकता के लिए व्यक्तिगत श्रेणी में आजमगढ़ की तत्कालीन डीडीसी रितु सुहास को राष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए चुना है।

अल्पसंख्यक मंत्रालय ‘ट्रिपल ई’ के संकल्प के साथ कर रहा है काम-नकवी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के विधानसभा स्थित तिलक हाल में अल्पसंख्यक हितों को लेकर गुरुवार को व्यापक चर्चा हुयी, मौका था एक दिवसीय अल्पसंख्यक विकास समन्वय बैठक का। बैठक में नौ राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के अल्पसंख्यक कार्यों व समाज कल्याण विभाग के मंत्री और अधिकारी, केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार मुख़्तार अब्बास नकवी के नेतृत्व में यहां इकट्ठा हुए। बैठक के बाद पत्रकारों से बात करते हुए केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने बताया कि आज बैठक में अनेक विषयों पर सकारात्मक चर्चा की गयी जिसमे मुख्य मुद्दा शिक्षा का रहा। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार में पूरे देश के अंदर बगैर किसी तुष्टिकरण के अल्पसंख्यकों का सशक्तिकरण हो रहा है। पिछले तीन वर्षों में समाज के अन्य वर्गों की तरह अल्पसंख्यक तबका भी विकास के क्षेत्र में बराबर का भागीदार बन रहा है। केंद्र सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों के लिए चलाई जा रही योजनाओं को जमीनी स्तर पर लागू करने में अधिकांश राज्य अच्छा काम कर रहे हैं।

 

    मंत्री ने कहा कि पहले के चले आ रहे तुष्टिकरण के तमाशे और वोट के सौदे को खत्म कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले तीन साल में विकास के मसौदे को अपना संकल्प बनाकर काम किया। परिणाम स्वरुप आज समाज के अन्य वर्ग की तरह अल्पसंख्यक तबका भी विकास की राह पर चल पड़ा है। उन्होंने बताया कि अल्पसंख्यक समुदायों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक सशक्तिकरण के लिए अल्पसंख्यक मंत्रालय ‘तीन ई’ यानी एजूकेशन, एम्प्लायमेंट और एम्पावरमेंट के संकल्प के साथ काम कर रहा है। बताया कि अल्पसंख्यकों के शैक्षिक सशक्तिकरण के लिए देश भर में गुरुकुल प्रकार के 27 आवासीय विद्यालय खोले गये हैं। पिछले तीन वर्षों में 15 डिग्री कालेज, 169 आईटीआई, 48 पाॅलीटेक्निक, 248 बहुउद्देशीय सद्भाव मंडप, 1064 हास्टल, 32 हजार अतिरिक्त क्लास रुम और 1817 स्कूल की इमारतों का निर्माण किया गया है। उन्होंने आगे बताया कि अल्पसंख्यकों को विश्वस्तरीय आधुनिक शिक्षा मुहैया कराने के लिए देश भर में अल्पसंख्यक मंत्रालय द्वारा पांच विश्वस्तरीय शैक्षणिक संस्थान खोले जा रहे हैं। साथ ही नवोदय विद्यालयों की तरह 100 स्कूलों की स्थापना होगी।

 

 

   मंत्री ने बताया कि पिछले तीन वर्षों में अल्पसंख्यक समुदाय के लगभग दो करोड़ 42 लाख छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति दी गयी। इस वर्ष छात्रवृत्तियों के लिए रिकार्ड एक करोड़ 50 लाख से ज्यादा आवेदन अल्पसंख्यक मंत्रालय को मिल चुके हैं। देश भर के 100 जिलों में गरीब नवाज कौशल विकास केंद्र की स्थापना की गयी है, जहां अल्पसंख्यक समुदाय के युवाओं को रोजगारपरक विभिन्न कोर्स करवाये जा रहे हैं। इन कोर्सों में जीएसटी फेसीलिटेटर और संनेटरी सुपरवाइजर के कोर्स भी शामिल हैं, जो बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक समुदाय के युवाओं को रोजगार मुहैया करा रहे हैं। बताया कि मंत्रालय द्वारा प्रारम्भ की गयी हुनर हाट, सीखो और कमाओ, नई मंजिल और नई रौशनी जैसी योजनाओं के माध्यम से पिछले तीन वर्षों में साढ़े आठ लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिला। अकेले हुनर हाट योजना से पिछले एक वर्ष में करीब तीन लाख कारीगरों, दस्तकारों, शिल्पकारों, खानसामों व इनसे जुड़े लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त हुए। बैठक में राज्यमंत्री वक्फ़ एवं हज मोहसिन रज़ा सहित अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय भारत सरकार के अधिकारीयों के अलावां उप्र, उत्तराखण्ड, हरियाणा, बिेहार, दिल्ली, पंजाब, जम्मू एवं कश्मीर, चण्डीगढ़ तथा हिमाचल प्रदेश से समाज कल्याण एवं अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री तथा इन राज्यों के अधिकारी मौजूद रहे।  

जब शाहिद अफरीदी ने दी सचिन सहवाग आैर डेविड शेफर्ड काे गाली

रवि उपाध्याय\दिल्लीःविश्व क्रिकेट का एक विख्यात नाम ‘डेविड शेफर्ड’ जिन्हाेंने 92 टेस्ट मैच में अम्पायरिंग की लेकिन यह बात अलग है कि उन्हाेंने एक भी टेस्ट मैच नहीं खेला।आज ही दिन 27 दिसंबर 1940 के दिन पैदा हुए।आज क्रिकेट जगत का यह नाम दुनियां में नहीं है लेकिन उनसे जुड़ी यादें हमेशा ताजा रहेंगी।इस इंग्लिश अंपायर ने कैंसर से लड़ते हुए 68 साल की उम्र में दुनियां काे अलविदा कह दिया था।

 

2003 क्रिकेट वर्ल्ड कप का वह वाक्या जिससे सन्न था विश्व क्रिकेट

 

डेविड शेफर्ड की जिंदगी से जुड़े वैसे ताे कई किस्से है जाे आज भी स्मृति का हिस्सा है लेकिन 2003 वर्ल्ड के किस्से से पूरा क्रिकेट जगत सन्न रह गया था।सेंचुरियन में भारत पाकिस्तान के बीच खेले जा रहे मैच के दाैरान पाकिस्तान के आलरांउडर खिलाडी शाहिद अफरीदी ने सचिन सहवाग के अलावा अंपायरिंग कर रहे डेविड शेफर्ड काे गाली दे डाली,दरअसल भारत पाकिस्तान व्दारा दिये गये 274 रनाें का पीछा कर रहा था।भारतीय सलामी बल्लेबाजाें सचिन सहवाग ने 32 गेंदाें में 50 रन ठाेककर तूफानी शुरूआत दे डाली।

 

तूफानी शुरूआत से बाैखलाये अफरीदी  

 

तूफानी शुरूआत काे देख बाैखलाये पाकिस्तानी आलरांउडर शाहिद अफरीदी ने मुंह से गालियां निकाली.इतना ही नहीं अंपायरिंग कर रहे डेविड शेफर्ड काे अपशब्द कह डाले।हालांकि अफरीदी काे इसका बड़ खामियाजा भी भुगतना पड़ा था।इसके लिए अफरीदी ने मैच फीस का 50 प्रतिशत गवाना पड़ा था आैर एक मैच का प्रतिबंध भी झेलना पड़ा था।सचिन के द्वारा खेली गयी 98 रनाें की पारी ने भारत की जीत में अहम भूमिका निभायी थी।

 

 

 

 

क्रिकेट इतिहास का वाे काला दिन,जब 18 गेंदाें के बाद रद्द कर दिया था मैच

दिल्ली नितिन उपाध्यायः25 दिसंबर काे पूरी दुनियां क्रिसमस डे या बड़े दिन के रूप में मनाती है.लेकिन इंदाैर क्रिकेट के लिहाज से इसे काला दिवस के रूप में मनाया जाता है।

 

25दिसंबर 1997 काे यानी 20 साल पहले भारत आैर श्रीलंका के बीच खेले जाने वाले एकदिवसीय अन्तराष्ट्रीय मैच काे महज 18 गेंदाें के बाद ही निरस्त कर दिया गया था।क्रिकेट की दुनिया में खराब पिच की वजह से निरस्त हाेने वाला यह पहला अन्तराष्ट्रीय मैच था।

 

साल 1997 में भारत आैर श्रीलंका की क्रिकेट टीम आमने सामने थी आैर तीन वनडे मैचाें की सीरीज का दूसरा अंतराष्ट्रीय मैच इंदाैर के नेहरू स्टेडियम में खेला जा रहा था।

 

मैच की पहली ही गेंद से पिच पर बहुत ज्यादा असामान्य उछाल था.पिच पर बल्लेबाजी करना माैत काे दावत देने के बराबर हाे रहा था.आैर इस मैच काे दाेनाें कप्तानाें की सहमति से रद्द कर दिया गया। उन दिनाें श्रीलंका क्रिकेट टीम के कप्तान अर्जुन रणतुंगा आैर भारतीय टीम के कप्तान सचिन तेंदुलकर थे।

 

क्या हुआ 25 दिसंबर 1997 काे

 

25 दिसंबर 1997 की सुबह सर्द आैर बल्लेबाजी के लिए माैसम बिल्कुल अनुकूल था.श्रीलंका के कप्तान अर्जुन रणतुंगा ने टाॅस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का निर्णय लिया।मैच की चाैथी ही गेंद पर श्रीनाथ ने कालूविर्थना काे बाेल्ड कर दिया.वह खाता भी नहीं खाेल पाये थे।

 

तीन अाेवर बाद नाबाद बल्लेबाज सनथ जयसूर्या आैर राेशन महानामा काे बल्लेबाजी करना नामुमकिन लगने लगा आैर चाेटिल हाेने का खतरा मंडराने लगा।पिच से प्राप्त उछाल से दाेनाें श्रीलंका के बल्लेबाज कतराने लगे।

 

ड्रेसिंग रूम से मैदान पर पहुंचे रणतुंगा

 

श्रीलंका के कप्तान रणतुंगा ड्रेसिंग रूम से पिच के मिजाज काे देखते हुए मैदान पर आ पहुंचे.भारतीय कप्तान सचिन तेंदुलकर आैर अंपायराें से लंबी बातचीत के बाद मैच काे रद्द घाेषित कर दिया गया।स्टेडियम में दर्शकाें के लिए यह दिल ताेड़ने वाला सदमे से कम नहीं था।हालांकि आईसीसी ने इस पर कड़ा रूख अपनाते हुए नेहरू स्टेडियम पर दाे साल का बैन लगा दिया।इस घटना से भारतीय क्रिकेट काे पूरे विश्व के सामने लज्जित हाेना पड़ा था।इस घटना से लाखाें भारतीय क्रिकेट के दीवानाें का दिल टूट गया था।

बाबा पर हाईकाेर्ट का शिकंजा-मांगी सभी आश्रमाें की लिस्ट

दिल्ली हाईकाेर्ट ने शुक्रवार काे दिल्ली अध्यात्मिक विश्वविधालय सहित सभी 8 आश्रमाें की लिस्ट मांगी है।अध्यात्मिक गुरू वीरेन्द्र दीक्षित काे 4 दनवरी तक काेर्ट में पेश हाेने के लिए कहा है।आपकाे बता दे कि राेहिणी स्थित अध्यात्मिक विश्वविधालय में सैंकड़ाें लड़कियाें के बंधक हाेने की खबर ने सनसनी फैला दी है।दिल्ली पुलिस ने मंगलवार देर रात काे हाईकाेर्ट के आदेश पर आश्रम में छापेमारी की थी तथा काेर्ट की आेर से नियुक्त एक समिति ने भी छापा मारा था।

 

हाईकाेर्ट ने आश्रम के दावे पर संदेह जताया है कहा कि यदि वे लड़कियां बंधक नहीं थी ताे फिर उन्हें बंध दरवाजे के पीछे क्याें रखा गया था।काेर्ट के कार्यवाहक न्यायधीश गीता मित्तल आैर मुख्य न्यीयमूर्ति सी हरि शंकर ने पूछा यदि आश्रम के संस्थापक तथा प्रमुख सच्चे है ताे वह पेश क्याें नहीं हाे रहे है।

 

वह आश्रम जहां कथित ताैर पर महिलाआें तथा लडकियाें काे बंधक बनाकर रखा गया है सीबीआई की जांच के दाैरान आश्रम के संस्थापक यदि पेश नही हाे रहे है ताे आस पर संदेह पैदा हाेता ही है ।आ8म के अधिवक्ता ने पीठ काे बताया कि संस्थापक दिल्ली में नहीं उन्हाेंने किसी आेर के जरिए उन तक संदेश पहुंचा दिया है।अधिवक्ता की इस बात से नाराज अदालत ने कहा कि आखिर वीरेन्द्र दिक्षीत है कहां।

 

अदालत ने अधिवक्ता से कहा वह कल तक दीक्षित क् बारे में जानकारी दें आैर बताए कि आश्रम के संचालन के लिए पैसा कहां से आता है।

मुंबई में दुकान में अाग लगने से ईमारत ढ़ही 12 लाेगाें की जान गयी

साेमवार काे सुबह मुंबई में साकी नाका इलाके में खैरानी राेड़ पर स्थित एक दुकान में अाग लगने से 12 लाेगाें की माैत हाे गयी। फायर बिग्रेड के मुख्य अधिकारी के द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार दुकान में अाग सुबह तड़के करीब 4ः15 पर भड़की । उस समय दुकान में काम करने वाले 15 कारीगर दुकान के अंदर साे रहे थे। दुकान के अंदर लगे बिजली के ताराें से अाग धीरे- धीरे दुकान में पड़ी लकड़ी तथा खाने के सामान में भी फैल गयी।

 

भड़की आग काे देखकर दुकान में साे रहे कारीगर जान बचाने काे बाहर भागे. जिसमें 3 कारीगर दुकान की पहली मंजिल में बने गल्ले में जाकर घुस गये ।समय से नहीं भाग पाने के कारण अाग की चपेट में आ गये। अग्निशमन के अधिकारीयाें ने उन्हें गल्ले से निकाला आैर पास के अस्पताल रकादवाड़ी पहुंचाया जहां ड़ाक्टराें ने उन्हें मृत घाेषित कर दिया।अाग की चपेट में अाकर दुकान का एक बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त हाेकर गिर गया।  

सुपर ह्यूमेन अॅचीवमेंट है रामसेतू-साइंस की लगी मुहर,जानिए मनमोहन सरकार ने क्या कहा था..

झूठ सौ ताले तोड़ कर सामने आजाता है उसी तरह सच्चाई पर जितने मर्जी लौह आवरण चढ़ा लें एक दिन सबके सामने आती ही है। रामसेतु पर यही कुछ हुआ है, बुद्धिजीवियों का झूठ और रामसेतु के बहाने रामायण की एतिहासिक प्रमाणिकता वैज्ञानिक रूप से भी साबित होती दिख रही है। रामायण में जिस रामसेतु का वर्णन है उस पर अमेरिकी वैज्ञानिकों ने प्रमाणिकता की मोहर लगा दी है। अमेरिका के साइंस चैनल ने भू-गर्भ वैज्ञानिकों, पुरातत्वविदों की अध्ययन रिपोर्ट के आधार पर कहा है कि भारत और श्रीलंका के बीच रामसेतु के जो संकेत मिलते हैं वो मानव निर्मित हैं। उपग्रह से प्राप्त चित्रों के अध्ययन के बाद कहा गया है कि भारत-श्रीलंका के बीच 30 मील के क्षेत्र में बालू की चट्टानें पूरी तरह से प्राकृतिक हैं, लेकिन उन पर रखे गए पत्थर कहीं और से लाए गए प्रतीत होते हैं। पुरातत्वविद चेल्सी रोज और वैज्ञानिक ऐलन लेस्टर का दावा है कि यह करीब सात हजार वर्ष पुरानी हैं जबकि इन पर मौजूद पत्थर करीब चार-पांच हजार वर्ष पुराने हैं।

 

रामायण के मुताबिक भारत के दक्षिणपूर्व में रामेश्वरम और श्रीलंका के पूर्वोत्तर में मन्नार द्वीप के बीच उथली चट्टानों की एक शृंखला है। इस इलाके में समुद्र बेहद उथला है। समुद्र में इन चट्टानों की गहराई सिर्फ 3 फुट से लेकर 30 फुट के बीच है। इसे भारत में पहले नलसेतु बाद में रामसेतु व दुनिया में आदम सेतु के नाम से जाना जाता है। इसकी लंबाई लगभग 48 किलोमीटर है। ब्रिटिश सरकार के 132 वर्ष पुराने दस्तावेज (मैनुअल आफ दी एडमिनिस्ट्रेशन आफ दी मद्रास प्रेसीडेंसी-संस्करण 2 के पृष्ठ क्रमांक 158) के विवरण बताते हैं कि कुछ साल पहले तक समुद्र का यह हिस्सा उथला था और लोग इसे पैदल चल कर ही पार कर लिया करते थे। जब इसका निर्माण किया गया होगा तो यह समुद्र के ऊपर ही रहा होगा और जैसे-जैसे मौसम में परिवर्तन होता गया और समुद्रतल बढ़ा तो रामसेतु के बहुत बड़े हिस्से भी इसमें डूब गए। वैसे रामसेतु की प्रमाणिकता का यह कोई पहला उदाहरण नहीं है। भगवान श्रीराम के समकालीन रहे महर्षि वाल्मीकि जी अपनी अमर रचना रामायण में लिखते हैं कि रामसेतु का निर्माण वानर सेना में मौजूद नल और नील ने किया था। गोस्वामी तुलसीदास श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड में लिखते हैं -

 

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाईं रिषि आसिष पाई।।

तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।

 

अर्थात:- राम के क्रोध से भयभीत समुद्र ने कहा हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई हैंं। उन्होंने लड़कपन में ऋषि से आशीर्वाद पाया था कि उनके स्पर्श कर लेने से ही भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैर जाएँगे। नल और नील के पिता भी सेतु बांधने की कला में परांगत थे। नल और नील की मदद से पहले दिन 14 योजन पुल बांधा गया, दूसरे दिन 20 योजन, तीसरे दिन 21 योजन चौथे दिन 22 योजन और पांचवें दिन 23 योजन पुल बांध दिया गया। वाल्मीकि रामायण में ये भी लिखा है कि ये पुल 10 योजन चौड़ा था। वाल्मीकि रामायण के अलावा कवि कालीदास की रचना रघुवंश पुराणों में स्कंद पुराण, विष्णु पुराण, अग्नि पुराण और ब्रह्म पुराण में भी श्रीराम के सेतु का वर्णन किया गया है। लेकिन इतने प्रमाण होने के बावजूद भी नकारवादी बार-बार रामसेतु के बहाने रामायण व श्रीराम की एतिहासिकता के बारे में भ्रम फैलाते रहे।

 

अंग्रेजों के समय भारत और श्रीलंका के बीच व्यापारिक मार्ग को छोटा करने के लिए सेतु समुद्रम योजना बनाई गई, लेकिन बिना राम सेतु को तोड़े इस योजना को पूरा करना मुश्किल था। वर्ष 1860 के आसपास एक ब्रिटिश नौसैनिक कमांडर ने ये प्रस्ताव रखा था, लेकिन इस पर पहली बार गंभीरता से विचार हुआ वर्ष 1955 में लेकिन ये परियोजना लटकती रही। वर्ष 2004 में जब संयुक्त प्रगतिशील मोर्चा की सरकार बनी तो इस योजना को फिर फाईलों से बाहर निकाला गया। ज्ञातव्य हो कि सप्रंग में शामिल बहुत से दलों का चरित्र सदैव बहुसंख्यकों के प्रति संदिग्ध रहा है। कांग्रेस पार्टी तुष्टिकरण के चलते तो धर्म को अफीम मानने वाले वामपंथी नास्तिक होने के चलते बहुसंख्यकों की भावनाओं का कम ही सम्मान करते रहे हैं। अंग्रेजों द्वारा बांटो और राज करो की नियत से तैयार किया गया आर्य-द्रविड़ नामक कपोलकल्पित सिद्धांत द्रविड़ मुनेत्रम कडग़म (डीेएमके) का राजनीतिक एजेंडा रहा है। अंग्रेजों ने यह विभाजनकारी सिद्धांत इसलिए तैयार किया ताकि द्रविड़ों को भारत का मूलनिवासी बता कर आर्यों को आक्रमणकारी साबित किया जा सके, इससे अंग्रेजों को यहां शासन करना इस आधार पर निर्बाध हो जाए कि जब आर्य (हिंदू) बाहर से आकर भारत पर शासन कर सकते हैं तो बर्तानिया के लोग क्यों नहीं ? मनमोनहन सिंह की सरकार के दौरान जब बहुसंख्यक विरोध की तिकड़ी एकसाथ सत्ता पर काबिज हुई तो इसका कोप रामसेतु पर टूटना स्वभाविक ही था। वर्ष 2005 में इस परियोजना को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हरी झंडी दी, लेकिन भाजपा ने इस परियोजना का यह कहते हुए विरोध किया रामसेतु को छेड़े बिना परियोजना के वैकल्पिक मार्गों पर विचार होना चाहिए। भाजपा ने इस विरोध के पीछे केवल करोड़ों नागरिकों की धार्मिक भावनाएं ही नहीं बल्कि सामरिक, पर्यावरण, स्थानीय मछुआरों की रोजी-रोटी व आर्थिक कारण भी गिनवाए।

 

भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने इसके खिलाफ मद्रास उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की। बाद में ये मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा। इस पर तत्कालीन मनमोहन सिंह की सरकार ने वर्ष 2007 में सुप्रीम कोर्ट में एक शपथपत्र दाखिल किया जिसमें लिखा गया कि यह एक मानव निर्मित ढांचा नहीं है। विरोध होने पर संशोधित शपथपत्र पेश किया गया जिसमें लगभग इसी तरह की बात कही गई कि इसके कोई प्रमाण नहीं है कि राम कोई एतिहासिक पात्र थे और यह ढांचा प्रकृतिक रूप से बना हुआ है। लेकिन अब अमेरिकी चैनल ने वैज्ञानिक रूप से यह साबित कर दिया है कि रामसेतु मानव निर्मित है अर्थात इस खोज से कहीं न कहीं रामायण की एतिहासिकता पर मुहर लग गई है।

 

अब वामपंथी नेता डी.राजा ने अमेरिकी चैनल की इस ताजा रिपोर्ट को खारिज करते हुए इसे विज्ञान का आत्मसमर्पण बताया है। डी. राजा न तो देश के बड़े प्रभावशाली नेता हैं, न ही भू-गर्भशास्त्री और न ही वैज्ञानिक इसलिए उनका विरोध उतना ही महत्त्वहीन है जितना कि पूरी दुनिया में वामपंथ हो चुका है। देश जानता है कि 1990 के दशक में जब रामानंद सागर के दूरदर्शन धारावाहिक रामायण ने राम को एक बार फिर घर-घर स्थापित कर दिया तो इसका प्रभाव कम करने के लिए वामपंथी लेखक एके रामानुजन के नेतृत्व में यूनिवर्सिटी आफ कैलेफोर्निया में 'थ्री हंड्रेड रामायन्स' का शोधपत्र तैयार करवाया जिसे यूपीए सरकार सत्तारूढ़ होने के बाद आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रेस से प्रकाशित भी किया गया। इसमें रामायण व रामायण के पात्रों को लेकर जो-जो अपमानजनक व तथ्यहीन बातें लिखी गई उनका जिक्र करना भी अशोभनीय है। इस तरह के वामपंथियों का अमेरिका की नई शोध पर सवाल उठाना स्वभाविक ही है जो उनके शोध व आजतक के ज्ञान को झूठा साबित करता है।

 

प्रश्न पैदा होता है कि अब आगे क्या हो और कैसे इस एतिहासिक धरोहर को संरक्षित व संवद्र्धित किया जाए। सरकार को चाहिए कि सबसे पहले इसे सांस्कृतिक व एतिहासिक धरोहर सिद्ध करे। सरकार सेतु समुद्रम् परियोजना को वैकल्पिक मार्ग से जल्द पूरा करे ताकि भविष्य में कोई सरकार इस परियोजना के नाम पर दोबारा से रामसेतु की ओर बुरी नजर से देखने का बहाना न बना सके। देश में जब पर्यटन को बढ़ाने के लिए राम सर्किट परियोजना विचाराधीन है तो रामसेतु को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए। इससे देश में जहां धार्मिक पर्यटन बढ़ेगा वहीं सांस्कृतिक एकता का भी संचार होगा। जब रामायणकालीन स्थलों को पर्यटन केंद्रों में विकसित कर हमारा पड़ौसी देश श्रीलंका अरबों डालर प्रतिपर्ष कमा सकता है तो हम क्यों नहीं?

 





सफलता की एकमात्र कुंजी निरन्तर अभ्यास,अभ्यास और अभ्यास ही है-डा0 जगदीश गांधी

किसी ने सही ही कहा है कि ‘करत-करत अभ्यास से जड़मत होत सुजान, रसरी आवत जात है सिल पर पड़त निशान’ अर्थात् जिस प्रकार एक मामूली सी रस्सी कुएँ के पत्थर पर प्रतिदिन के अभ्यास से निशान बना देती है उसी प्रकार अभ्यास जीवन का वह आयाम है जो कठिन रास्तों को भी आसान कर देता है। इसलिए अभ्यास से कठिन से कठिन विषयों को भी याद किया जा सकता है। इस प्रकार सफलता की एकमात्र कुंजी निरन्तर अभ्यास, अभ्यास और अभ्यास ही है। विशेषकर गणित तथा विज्ञान विषयों में यदि आप अपना वैज्ञानिक एवं तार्किक दृष्टिकोण विकसित नहीं कर पाये तो आप सफलता को गवां सकते हैं। इसलिए इन विषयों के सूत्रों को अच्छी तरह से याद करने के लिए इन्हें बार-बार दोहराना चाहिए और लगातार इनका अभ्यास भी करते रहना चाहिए। दीर्घ उत्तरीय पाठ/प्रश्नों को एक साथ याद न करके इन्हें कई खण्डों में याद करना चाहिए। बार-बार अभ्यास करने से जीवन की कठिन से कठिन बातें भी याद रखी जा सकती हैं।

 

(2) बोर्ड परीक्षाओं का तनाव लेने के बजाय छात्र खुद पर रखें विश्वास:- प्रायः यह देखा जाता है कि बोर्ड की परीक्षाओं के नजदीक आते ही छात्र-छात्रायें एक्जामिनेशन फीवर के शिकार हो जाते हैं। ऐसे में शिक्षकों एवं अभिभावकों के द्वारा बच्चों के मन-मस्तिष्क में बैठे हुए इस डर को भगाना अति आवश्यक है। वास्तव में बच्चों की परीक्षा के समय में अभिभावकों की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। एक शोध के अनुसार बच्चों के मन-मस्तिष्क पर उनके अभिभावकों के व्यवहार का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। ऐसी स्थिति में अभिभावकों को बच्चों के साथ दोस्तों की तरह व्यवहार करना चाहिए ताकि उनमें सुरक्षा की भावना और आत्मविश्वास बढ़ें। इस प्रकार बच्चों का मन-मस्तिष्क जितना अधिक दबाव मुक्त रहेगा उतना ही बेहतर उनका रिजल्ट आयेगा और सफलता उनके कदम चूमेगी। इसलिए छात्र-छात्राओं को बोर्ड परीक्षााओं का तनाव लेने के बजाय खुद पर विश्वास रखकर‘मन के हारे हार है मन के जीते जीत’ कहावत पर चलना चाहिए और अपने कठोर परिश्रम पर विश्वास रखना चाहिए।

 

(3) स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है:-

किसी ने बिलकुल सही कहा है कि एक स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों एवं डाक्टरों के अनुसार प्रतिदिन लगभग 7 घण्टे बिना किसी बाधा के चिंतारहित गहरी नींद लेना सम्पूर्ण नींद की श्रेणी में आता है। एक ताजे तथा प्रसन्नचित्त मस्तिष्क से लिये गये निर्णय, कार्य एवं व्यवहार अच्छे एवं सुखद परिणाम देते हैं। थके तथा चिंता से भरे मस्तिष्क से किया गया कार्य, निर्णय एवं व्यवहार सफलता को हमसे दूर ले जाता है। परीक्षाओं के दिनों में संतुलित एवं हल्का भोजन लेना लाभदायक होता है। इन दिनों अधिक से अधिक ताजे तथा सूखे फलों, हरी सब्जियों तथा तरल पदार्थो को भोजन में शामिल करें।

 

(4) अपने लक्ष्य का निर्धारण स्वयं करें और देर रात तक पढ़ने से बचें:-

एक बार यदि हमें अपना लक्ष्य ज्ञात हो गया तो हम उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देंगे। यदि हमारा लक्ष्य परीक्षा में 100 प्रतिशत अंक लाना है तो पाठ्यक्रम में

दिये गये निर्धारित विषयों के ज्ञान को पूरी तरह से समझकर आत्मसात करना होगा। इसके साथ ही रात में देर तक पढ़ने की आदत बच्चों को नुकसान पहुँचा सकती है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार प्रातःकाल का समय अध्ययन के लिए ज्यादा अच्छा माना जाता है। सुबह के समय की गई पढ़ाई का असर बच्चों के मन-मस्तिष्क पर देर तक रहता है। इसलिए बच्चों को सुबह के समय में अधिक से अधिक पढ़ाई करनी चाहिए। रात में 6-7 घंटे की नींद के बाद सुबह के समय बच्चे सबसे ज्यादा शांतिमय, तनाव रहित और तरोताजा महसूस करते हैं।

 

(5) अपने मस्तिष्क की असीम क्षमता का सदुपयोग करें व लिखकर याद करने की आदत डालेंः-

प्रत्येक मनुष्य की स्मरण शक्ति असीमित है। आइस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक तथा एक साधारण व्यक्ति के मस्तिष्क की संरचना एक समान होती है। केवल फर्क यह है कि हम अपने मस्तिष्क की असीम क्षमताओं की कितनी मात्रा का निरन्तर प्रयास द्वारा सदुपयोग कर पाते हैं। इसलिए छात्रों को अपने पढ़े पाठों का रिवीजन पूरी एकाग्रता तथा मनोयोगपूर्वक करके अपनी स्मरण शक्ति को बढ़ाना चाहिए। एक बात अक्सर छात्र-छात्राओं के सामने आती है कि वो जो कुछ याद करते हंै वे उसे भूल जाते हैं। इसका कारण यह है कि छात्र मौखिक रूप से तो उत्तर को याद कर लेते हैं लेकिन उसे याद करने के बाद लिखते नहीं है। कहावत है एक बार लिखा हुआ हजार बार मौखिक रूप से याद करने से बेहतर होता है। ऐसे में विद्यार्थी को अपने प्रश्नों के उत्तरों को लिखकर याद करने की आदत डालनी चाहिए।

 

(6) सम्पूर्ण पाठ्यक्रम का अध्ययन जरूरी है:-

सिर्फ महत्वपूर्ण विषयों या प्रश्नों की तैयारी करने की प्रवृत्ति आजकल छात्र वर्ग में देखने को मिल रही है जबकि छात्रों को अपने पाठ्यक्रम का पूरा अध्ययन करना चाहिए और इसे अधिक से अधिक बार दोहराना चाहिए। अगर छात्रों का लक्ष्य 100 प्रतिशत अंक अर्जित करना है तो परीक्षा में आने वाले सम्भावित प्रश्नों के उत्तरों की तैयारी तक ही अपना अध्ययन सीमित न रखकर सम्पूर्ण पाठ्यक्रम का अध्ययन करना चाहिए। जो छात्र पाठ्यक्रम के कुछ भागों को छोड़ देते हैं वे परीक्षा में असफलता का मुँह देख सकते हंै।

 

(7) उच्च कोटि की सफलता के लिए समय प्रबन्धन जरूरी:-

परीक्षा में प्रश्न पत्र हाथ में आते ही सबसे पहले छात्र को सरल प्रश्नों को छांट लेना चाहिए। इन सरल प्रश्नों को हल करने में पूरी एकाग्रता के साथ अपनी ऊर्जा को लगाना चाहिए। छात्र को प्रश्न पत्र के कठिन प्रश्नों के लिए भी कुछ समय बचाकर रखने का ध्यान रखना चाहिए। चरम एकाग्रता की स्थिति में कठिन प्रश्नों के उत्तरों का आंशिक अनुमान लग जाने की सम्भावना रहती है। प्रायः देखा जाता है कि अधिकांश छात्र अपना सारा समय उन प्रश्नों में लगा देते हैं जिनके उत्तर उन्हें अच्छी तरह से आते हैं। तथापि बाद मेंवे शेष प्रश्नों के लिए समय नहीं दे पाते। समय के अभाव में वे जल्दबाजी करते प्रायः देखे जाते हैं और अपने अंकों को गॅवा बैठते हैं। परीक्षाओं में इस तरह की गलती न हो इसके लिए माॅडल पेपर के एक-एक प्रश्न को निर्धारित समय के अंदर हल करने का निरन्तर अभ्यास करते रहना चाहिए।

 

(8) सुन्दर लिखावट, सही स्पेलिंग तथा विराम चिन्हों का प्रयोग:-

आपकी उत्तर पुस्तिका को जांचने करने वाले परीक्षक पर सबसे पहला अच्छा या बुरा प्रभाव आपकी लिखावट का पड़ता है। परीक्षक के ऊपर सुन्दर तथा स्पष्ट लिखावट का बहुतअच्छा प्रभाव पड़ता है। परीक्षक के पास अस्पष्ट लिखावट को पढ़ने का समय नही होता है। अतः परीक्षा में उच्च कोटि की सफलता के लिए अच्छी लिखावट एक अनिवार्य शर्त है। सही स्पेलिंग तथा विराम चिन्हों का सही उपयोग का ज्ञान होना हमारे लेखन को प्रभावशाली एवं स्पष्ट अभिव्यक्ति प्रदान करता है। भाषा का सही प्रस्तुतीकरण छात्रों को अच्छे अंक दिलाता है। विशेषकर भाषा प्रश्न पत्रों में सही स्पेलिंग अति आवश्यक है। इसी प्रकार विराम चिन्हों का सही उपयोग भी अच्छे अंक अर्जित करने के लिए जरूरी है।

 

(9) प्रवेश पत्र के साथ ही परीक्षा के लिए उचित सामान सुरक्षित रखें:-

बोर्ड परीक्षाओं के छात्रों को रोजाना घर से परीक्षा केन्द्र जाने के पूर्व अपने प्रवेश पत्र को सावधानीपूर्वक रखने की बात को जांच लेना चाहिए। बोर्ड तथा प्रतियोगी परीक्षाआंे आदि के लिए प्रवेश पत्र सबसे जरूरी कागजात हंै। हमें यह बात भली प्रकार स्मरण रखनी चाहिए कि प्रवेश पत्र के खो जाने से परीक्षा कक्ष में प्रवेश करने से हम वंचित हो सकते हंै। परीक्षा के समय अच्छे पेन, पेन्सिल, स्केल, रबर, कलाई घड़ी आदि का अत्यन्त महत्व है। परीक्षा में उपयोग होने वाली सभी जरूरी सामग्रियाँ अच्छी क्वालिटी की हमारे पास अतिरिक्त मात्रा में होना जरूरी है। किसी प्रकार की अपत्तिजनक वस्तु के आसपास पड़े होने की स्थिति में हमें उसकी सूचना कक्ष निरीक्षक को तुरन्त देनी चाहिए।

 

(10) प्रश्न पत्र के निर्देशों को भली-भांति समझ लें और उत्तर पुस्तिका को जमा

करने के पूर्व उसे चेक अवश्य करें:-

छात्रों को प्रश्न पत्र हल करने के पहले उसमें दिये गये निर्देशों को भली भाँति पढ़ लेना चाहिए। ऐसी वृत्ति हमें गलतियों की संभावनाओं को कम करके परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने की सम्भावना को बढ़ा देती है। इसलिए हमें प्रश्न पत्र के हल करने के निर्देशों को एक बार ही नहीं वरन् जब तक भली प्रकार निर्देश समझ न आये तब तक बार-बार पढ़ना चाहिए। छात्रों को उत्तर पुस्तिका जमा करने के पूर्व 10 या 15 मिनट अपने उत्तरों को भली-भांति पढ़ने के लिए बचाकर रखना चाहिए। अगर आपने प्रश्न पत्र के निर्देशों का ठीक प्रकार से पालन किया है तथा सभी खण्डों के प्रत्येक प्रश्नों का उत्तर दिये हैं तो यह अच्छे अंक लाने में आपकी मदद करेगा।

 

(11) मैं यह कर सकता हूँ, इसलिए मुझे करना है:-

माता-पिता अगर अपने बच्चों पर विश्वास जताएंगे और उनका सही मार्गदर्शन करेंगे तो छात्र तनाव से निजात पाकर परीक्षा दे सकेंगे और वे सर्वश्रेष्ठ अंकों से अपनी परीक्षा को पास कर सकेंगे। छात्रों को भी अपने आत्मविश्वास को जगाने के लिए इस वाक्य को प्रतिदिन अधिक से अधिक बार दोहराना चाहिए कि ‘मैं यह कर सकता हूँ, इसलिए मुझे यह करना है’ यह छात्र जीवन में उच्च कोटि की सफलता प्राप्त करने का एक अचूक मंत्र हो सकता है। परीक्षाओं के समय यह वाक्य हमारी सुनिश्चित सफलता की सोच को विकसित करता है। यह मंत्र जीवन में पूरी तरह तभी सफल होगा जब हम अपने अंदर एकाग्रता, निरन्तर प्रयास, आत्मानुशासन तथा आत्म-नियंत्रण के गुणों को भी विकसित करेंगे।

 

सरदार पटेल- जिन्होंने भारत को एकता के सूत्र में पिरोया

एक ब्रिटिश भारतीय लोक सेवक सर जॉन स्ट्रैचे अपने प्रशिक्षु लोक सेवकों को संबोधित करते हुए कहा करते थे कि “भारत के बारे में प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण बात यह जानने की है कि वहां कोई भारतीय नहीं है और कभी कोई भारतीय नहीं था।” इतिहासकार डेविड लड्डन ने अपनी पुस्तक ‘कंटेस्टिंग द नेशनः रिलीजन, कॉम्युनिटी एंड पॉलिटिक्स ऑफ डेमोक्रेसी इन इंडिया’ ने लिखा है कि जिस क्षेत्र को हम भारतीय सभ्यता के भू-परिदृश्य के रूप में वर्णित करते हैं, उसे यह परिभाषा ब्रिटिश साम्राज्य ने प्रदान की। भारत जो आज दिखाई देता है, वह 1947 से पहले भौगोलिक, जन-सांख्यिकीय या सांस्कृतिक अर्थ में वैसा नहीं था। विंस्टन चर्चिल जैसे अनेक आलोचकों ने भविष्यवाणी की थी कि स्वतंत्रता के बाद भारत बिखर जाएगा और फिर से मध्य काल में चला जाएगा।

 

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत को भारी चुनौतियों को सामना करना पड़ा। उस समय के नेताओं के सामने सबसे बड़ी अग्नि परीक्षा यह थी कि राष्ट्र की सीमा रेखांकित की जाए, जिसके लोग सदियों से बिखरे पड़े थे। डाइना एल ऐक ने अपनी पुस्तक, इंडिया-ए सेक्रेड जियोग्राफी में लिखा कि भारत भूमि कई सदियों तक तीर्थ यात्रियों के केंद्र के रूप में जानी जाती रहीं। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लिखा था कि भारत की यह एकता एक भावनात्मक अनुभव थी। डिस्कवरी ऑफ इंडिया में उन्होंने अपने उन अनुभवों को स्पष्ट किया है कि किस तरह भारत के किसानों के मन में एकत्व की भावना भरने की कवायद की गई, “मैंने उन्हें भारत को समग्र रूप में समझाने का प्रयास किया .... ये कार्य आसान नहीं थाः फिर भी इतना कठिन नहीं था। चूंकि मैंने कल्पना की थी कि हमारे प्राचीन महाकाव्य, मिथक और आख्यान के बारे में सभी जानते थे। उन्हीं की बदौलत उन्हें राष्ट्र की अवधारणा से अवगत कराया गया।”

 

प्रादेशिक और भावनात्मक रूप में भारत के पुनर्निर्माण का कार्य अत्यंत कठिन था। समूचा राष्ट्र एक अफरा-तफरी से गुजर रहा था। कुछ ताकतें भारत को विभाजित करना चाहती थीं। महात्मा गांधी जैसे नेताओं के लिए विभाजन के समय सबसे बड़ा सवाल यह था कि अंग्रेजों के जाने के बाद दो राष्ट्र होंगे या फिर 565 अलग-अलग राष्ट्र। ऐसे समय में भारत के पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी लौह पुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल को सौंपी गई।

 

गिरते हुए स्वास्थ्य के बावजूद सरदार पटेल ने भारत को एक करने के बृहत प्रयोजन के प्रति कोई कोताही नहीं बरती। इस कार्य में सरदार पटेल की सहायता करने वाले वी.पी. मेनन ने अपनी पुस्तक ‘द स्टोरी ऑफ दी इंटीग्रेशन ऑफ इंडियन स्टेट्स’ में लिखा है कि “भारत एक भौगोलिक इकाई है, फिर भी अपने पूरे इतिहास में वह राजनीतिक दृष्टि से कभी एकरूपता हासिल नहीं कर सका।.... आज देश के इतिहास में पहली दफा एकल केंद्र सरकार की रिट कैलाश से कन्याकुमारी और काठियावाड़ से कामरूप (असम का पुराना नाम) तक पूरे देश को संचालित करती है। इस भारत के निर्माण में सरदार पटेल ने रचनात्मक भूमिका अदा की।”

सरदार पटेल जानते थे कि ‘यदि आप एक बेहतरीन अखिल भारतीय सेवा नहीं रखेंगे तो आप भारत को एकजुट नहीं कर पाएंगे।‘ इसलिए राज्यों के पुनर्गठन का काम प्रारंभ करने से पहले उन्होंने उन्होंने ‘स्टील फ्रेम’ या भारतीय सिविल सेवा में विश्वास व्यक्त किया। सरदार पटेल ने शाही रजवाड़ों के साथ सहमति के जरिए एकीकरण के लिए अथक रूप से कार्य किया। परंतु उन्होंने साम, दाम, दंड और भेद की नीति अपनाने में भी कोई संकोच नहीं किया। सरदार पटेल और उनके सहयोगी वी.पी. मेनन ने ‘यथास्थिति समझौतों और विलय के विलेखों’ के प्रारूप तैयार किए, जिनमें विभिन्न शासकों से अनुरोधों और मांगों को शामिल किया गया।

 

सरदार पटेल इस तथ्य से अवगत थे कि भारत भूमि का मात्र राजनीतिक पुनर्गठन पर्याप्त नहीं है। उनका यह मानना था कि भारत की घायल सभ्यता को दासता और दयनीयता से उभारने की आवश्यकता थी। उन्होंने भारत के लोगों में ऐसी प्रतिबद्धता पैदा की, ताकि वे विविध संस्कृतियों के साथ एक साझा लक्ष्य का अनुपालन करें। 13 नवंबर, 1947 को भारत के तत्कालीन उपप्रधानमंत्री के रूप में सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करने का संकल्प व्यक्त किया। कई बार बनाए और नष्ट किए गए सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का लक्ष्य भारत का पुनर्जागरण करना था। तत्कालीन भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने मंदिर के उद्घाटन समारोह में कहा था कि “मेरा यह मानना है कि सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य उस दिन पूरा होगा, जब इसकी बुनियाद पर न केवल एक शानदार भवन खड़ा होगा बल्कि भारत की उस समृद्धि का एक महल भी बनेगा, जिसका प्राचीन सोमनाथ मंदिर एक प्रतीक था।”

 

सरदार पटेल ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति के पुनर्निर्माण में नायक की भूमिका अदा की। आज जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘नये भारत’ के निर्माण का आह्वान किया है तो ऐसे में सरदार पटेल के वे शब्द अत्यंत प्रासंगिक लगते हैं, जो उन्होंने शाही रजवाड़ों को लिखे पत्र में इस्तेमाल किए थे। उन्होंने लिखा था कि “हम इतिहास के एक महत्वपूर्ण चरण में हैं। हम सब मिलकर देश को नई ऊंचाईयों पर ले जा सकते हैं। दूसरी ओर एकता के अभाव में हम अप्रत्याशित आपदाओं का शिकार हो सकते हैं। मुझे उम्मीद है कि भारतीय राज्य पूरी तरह महसूस करेंगे कि अगर हम सहयोग नहीं करते हैं और सामान्य हित में काम नहीं करते हैं तो अराजकता और अव्यवस्था हमें बर्बाद कर देंगे।..... यह हम सबका परम दायित्व है कि हम आपसी लाभप्रद संबंधों की एक विरासत छोड़ें, जो इस पवित्र भूमि को विश्व के राष्ट्रों में उचित स्थान दिला सके और इसे शांति तथा समृद्धि के स्थल में परिवर्तित कर सकें।”

 

-।लेखक वर्तमान में इंडियन फाउंडेशन में वरिष्ठ अनुसंधान फेलो हैं।

 

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