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updated 8:02 AM UTC, Feb 28, 2017
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आय समूह योजना से गरीबों के लिए याचिका दाखिल करना हुआ आसान

नयी दिल्ली, मध्‍यम और गरीब आय वर्ग के लोगों के लिए देश की कानूनी सहायता लेना आसान हो गया है। माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय ने मध्‍यम आय समूह योजना लागू की है। यह आत्‍म समर्थन देने वाली योजना है और इसके तहत 60,000 रूपये प्रति महीने और 7,50,000 रूपये वार्षिक आय से कम आय वाले लोगों के लिए कानूनी सहायता दी जाएगी।सोसायटी पंजीकरण अधिनियम 1860(2) के अन्‍तर्गत सोसायटी के प्रबंधन का दायित्‍व गवर्निंग बॉडी के सदस्‍यों को दिया गया है। गवर्निंग बॉडी में भारत के प्रधान न्‍यायाधीश संरक्षक होगे।  अटार्नी जनरल पदेन उपाध्‍यक्ष होंगे। सोलिसीटर जनरल ऑफ इंडिया मानद सदस्‍य होंगे और उच्‍चतम न्‍यायालय के अन्‍य वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता सदस्‍य होंगे। उच्‍चतम न्‍यायालयों के नियमों के अनुसार न्‍यायालय के समक्ष याचिका केवल एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड के जरिये दाखिल की जा सकती है।

 

सेवा शुल्‍क के रूप में उच्‍चतम न्‍यायालय मध्‍य आय समूह कानूनी सहायता सोसाइटी को 500 रूपये का भुगतान करना होगा। आवेदक को सचिव द्वारा बताई गई फीस जमा करानी होगी। यह योजना में संलग्‍न अनुसूची के आधार पर होगी। एमआईजी कानूनी सहायता के अंतर्गत सचिव याचिका दर्ज करेंगे और इसे पैनल में शामिल एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड/दलील पेश करने वाले वकील,वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता को भेजेगे।

 

यदि एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड इस बात से संतुष्‍ट हैं कि यह याचिका आगे की सुनवाई के लिए उचित है, तो सोसाइटी आवेदक के कानूनी सहायता अधिकार पर विचार करेगी। जहां तक योजना का लाभ प्राप्‍त करने के लिए आवेदक की पात्रता का प्रश्‍न है याचिका के बारे में एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड की राय अंतिम राय मानी जाएगी। योजना के अंतर्गत मध्‍यम वर्ग के वैसे लोग जो उच्‍चतम न्‍यायालय में मुकद्दमों का खर्च नहीं उठा सकते, वे कम राशि देकर सोसाइटी की सेवा ले सकते है। इस योजना के लाभ लेने के इच्‍छुक व्‍यक्ति को निर्धारित फार्म भरना होगा और इसमें शामिल सभी शर्तों को स्‍वीकार करना होगा।

 

 

योजना के अनुसार याचिका के संबंध आने वाले विभिन्‍न खर्चों को पूरा करने के लिए आकस्मिक निधि बनाई जाएगी। याचिका की स्‍वीकृति के स्‍तर तक आवेदक को इस आकस्मिक निधि‍ में से 750 रूपये जमा कराने होंगे। यह सोसाइटी में जमा किये गये शुल्‍क के अतिरिक्‍त होगा। यदि एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड यह समझते है कि याचिका आगे अपील की सुनवाई योग्‍य नहीं है, तो समिति द्वारा लिये गये न्‍यूनतम सेवा शुल्‍क 750 रूपये को घटाकर पूरी राशि चैक से आवेदक को लौटा दी जाएगी।

प्रकाशन विभाग और सस्‍ता साहित्‍य मंडल के बीच हुआ समझौता

दिल्ली, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन प्रकाशन विभाग और सस्‍ता साहित्‍य मंडल ने आज यहां एक समझौता-दस्‍तावेज पर हस्‍ताक्षर किये। समझौते के तहत दोनों संस्‍थान स्‍वतंत्रता संग्राम के महानायकों, सांस्‍कृतिक हस्तियों और राष्‍ट्र विकास में कार्य करने वाले अन्‍य प्रतिष्ठित व्‍यक्तियों के बारे में संयुक्‍त रूप से पुस्‍तकों का प्रकाशन करेंगे। यह समझौता दोनों संगठनों के बीच एक संयुक्‍त पहल है, जिसके तहत युवा पीढ़ी को भारत की समृद्ध और विविधतापूर्ण संस्‍कृति तथा इतिहास की जानकारी दी जायेगी। विभिन्‍न विषयों पर लोगों को बेहतर साहित्‍य उपलब्‍ध कराया जायेगा। इस अवसर पर सूचना एवं प्रसारण सचिव अजय मित्तल, सस्‍ता साहित्‍य मंडल के सचिव प्रोफेसर इंद्रनाथ चौधरी, प्रकाशन विभाग की एडीजी डॉ. साधना राउत और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के संयुक्‍त सचिव श्री मिहिर कुमार सिंह उपस्थित थे।

 

समझौते में 20 पुस्‍तकों के एक सेट का संयुक्‍त प्रकाशन किया जायेगा, जिनमें 10 पुस्‍तकों को दोनों संस्‍थान एक दूसरे के कैटलॉग से चुनेंगे। इसके अलावा स्‍वतंत्रता संग्राम, भारतीय संस्‍कृति और नैतिकता और आदर्शों पर 10 छोटी नई पुस्‍तकों के एक सेट का संयुक्‍त प्रकाशन भी किया जायेगा। इस समझौते से दोनों संगठनों को यह अवसर मिलेगा कि वे अपने एक-दूसरे द्वारा प्रकाशित पुस्‍तकों की प्रदर्शनी और ब्रिकी का आयोजन कर सकते हैं। यह समझौता हस्‍ताक्षर करने की तिथि से 3 वर्षों तक मान्‍य होगा जिसे आपसी रजामंदी के तहत बढ़ाया जा सकता है। महात्‍मा गांधी ने 1925 में न्‍यास के रूप में सस्‍ता साहित्‍य मंडल की स्‍थापना की थी, जिसका उद्देश्‍य उच्‍चस्‍तरीय हिंदी साहित्‍य को प्रोत्‍साहित, विकसित और प्रकाशित करना तथा जनता को सस्‍ती कीमतों पर उपलब्‍ध कराना था। अपनी स्‍थापना के समय से अब तक सस्‍ता साहित्‍य मंडल ने भारतीय संस्‍कृति, विरासत, भारतीय महाकाव्‍यों और कहानियों की 2500 से अधिक पुस्‍तकें प्रकाशित की हैं। संगठन ने बच्‍चों के लिए विशाल साहित्‍य का सृजन किया है ताकि उन्‍हें राष्‍ट्र और मानवता के प्रति प्रेम और जीवन के आदर्शों की शिक्षा दी जा सके।  

 

 

 

कच्‍चे कोयले का उत्‍पादन बढ़कर हुआ 391.10 मिलियन टन

2015 में हुई कोयला खदानों की नीलामी के अनुरूप अब तक आवंटित 83 कोयला खदानों की नीलामी,आवंटन से खदान की जीवन अवधि, पट्टे की अवधि में 3.95 लाख करोड़ रूपये से अधिक की प्राप्‍ति होने का अनुमान है। अक्‍टूबर, 2016 तक इन कोयला खदानों की वास्‍तविक राजस्‍व उगाही 2,779 करोड़ रूपये रही। 9 कोयला ब्‍लॉकों की विद्युत क्षेत्र को की गई नीलामी से उपभोक्‍ताओं को बिजली शुल्‍क में कमी के संदर्भ में लगभग 69,310.97 करोड़ रूपये के लाभ की संभावना है।

देश में अप्रैल-नवंबर, 2016-17 के दौरान कच्‍चे कोयले का उत्‍पादन 391.10 मिलियन टन हुआ। पिछले वर्ष की इसी अवधि में कच्‍चे कोयले का उत्‍पादन 385.11 मिलियन टन हुआ था। अप्रैल-नवंबर ,2016 के दौरान कोयला उत्‍पादन में 1.6 प्रतिशत की समग्र वृद्धि दर्ज की गई। 30.11. 2016 को एनएलसीआईएल की लिग्‍नाइट खनन क्षमता 30.6 मिलियन टन वार्षिक रही। कंपनी ने अपनी विद्युत उत्‍पादन क्षमता 4275.50 मेगावाट से बढ़ाकर 4293.50 मेगावाट कर ली। इसमें 10 मेगावाट सौर विद्युत और 43.50 मेगावाट पवन विद्युत शामिल है।

कोयला मंत्रालय ने देश में कोयला आयात में कमी लाने पर विशेष बल दिया है। सरकार ने 2015-16 में 20,000 करोड़ रूपये और चालू वर्ष के पहले 4 वर्षों में 4,844 करोड़ रूपये की बचत की है। इस मोर्चे पर  किए जा रहे प्रयासों से  मार्च 2017 तक आयातित कोयले की 15.37 एमटी मात्रा कम हो जाएगी।

प्रधानमंत्री के डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के अनुरूप कोयला मंत्रालय ने अक्‍टूबर 2016 में ई-ऑफिस एप्‍लीकेशन को पूरी तरह लागू किया और अब मंत्रालय का फाइल कार्य इलेक्‍ट्रॉनिक तरीके से हो रहा है। डिजिटीकरण प्रक्रिया से मंत्रालय के कामकाज में पारदर्शिता और दक्षता आई है और इससे फाइलों की गति में तेजी आएगी और तेजी से निर्णय लिए जा सकेंगे। इससे फाइलों/रिकॉर्डों की तेजी से वापसी हो सकेगी और फाइलों और रिकॉर्डों के गुम या लापता होने की गुंजाइश कम रहेगी।

 

कोल इंडिया लिमिटेडके छोटे एवं मझौले क्षेत्र के उपभोक्‍ताओं के लिए कोयला आवंटन निगरानी प्रणाली तथा घरेलू कोयले के उपयोग में लचीलापन  लाने के लिए कोल मित्र वेब पोर्टल जैसे अनेक नए पोर्टल लांच किए गए ताकि छोटे तथा मझौले क्षेत्र के लिए कोयला वितरण में पारदर्शिता लाई जा सके और कारोबार सहज बनाया जा सके।

कृषि क्षेत्र का हो रहा है निरंतर विकास- राधा मोहन

केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा है कि दूसरी हरित क्रांति लाने के लिए कृषि में प्रशिक्षित छात्र-छात्राओं को आगे आना होगा और उन्हें अपना अर्जित ज्ञान और कौशल कृषि एवं किसान कल्याण को समर्पित करना होगा। सिंह ने यह बात आज नई दिल्ली के पूसा स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद- भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के 55वें दीक्षांत समारोह में कही।

 

केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि दिल्ली में पूसा संस्थान की उपस्थिति के कारण पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों में कृषि का निरंतर विकास हुआ है और यही कारण है कि देश में पूसा के अलावा 2 और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, झारखण्ड और असम में खोले जा चुके हैं, जिससे पूरे देश में कृषि का समग्र विकास हो रहा है। उन्होंने कहा कि इस संस्थान द्वारा विकसित प्रजातियों के प्रचलन में आने से देश की कृषि व्यवस्था में सार्थक एवं गुणात्मक परिवर्तन देखने को मिला है। जहाँ पहले खाद्यान्न के लिए दूसरे देशों के ऊपर निर्भर रहना पड़ता था वहीं आज हम खाद्यान्न आपूर्ति कर दूसरे देशों की मदद कर रहे हैं। कृषि मंत्री ने इस उपलब्धि के लिए देश के कृषि वैज्ञानिकों, विशेषकर इस संस्थान के वैज्ञानिकों को बधाई दी। 

सिंह ने कहा कि भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित गेंहू की किस्मों को 10 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल में उगाकर, 50 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन किया जा रहा है। लगभग 1 लाख करोड़ रुपयों के कृषि निर्यात में बासमती चावल का योगदान लगभग 22 हजार करोड़ का है जिसमें पूसा संस्थान द्वारा विकसित किस्मों का योगदान लगभग 90 प्रतिशत है। वर्ष 2016 में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने चावल, गेहूँ, सरसों एवं दलहनी फसलों की कुल 11 प्रजातियों को विमोचित किया है। संस्थान द्वारा विकसित कनोला गुणवत्ता वाली सरसों की प्रजाति पूसा डबल जीरो सरसों 31, देश की पहली उच्च गुणवत्ता वाली किस्म है जिसमें तेल में पाये जाने वाले ईरुसिक अम्ल की मात्रा 2 प्रतिशत से कम तथा खली में पाये जाने वाली ग्लूकोसिनोलेट्रस की मात्रा 30 पी.पी.एम. से कम है जो कि मानव एवं पशु स्वास्थ्य के अनुकूल है| उन्होंने कहा कि भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने अत्याधुनिक 'फिनोमिक्स सुविधा' केन्द्र स्थापित किया है जो कि विभिन्न प्रकार के वातावरणीय तनावों के अध्ययन के लिए उपयोगी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस सुविधा का उपयोग नये तरह के उपयोगी पौधों के विकास में किया जाएगा जिनसे कम पानी एवं कम उर्वरकों के साथ अधिक उपज ली जा सकती है|

सब्सिडी प्राप्त करने के लिए आधार नंबर जरूरी

सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत सहायता प्राप्त खाद्यान्नों तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत खाद्य सब्सिडी के नकद अंतरण में भारत की संचित निधि से आवर्ती व्यय शामिल होता है, अतः केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने आधार अधिनियम के अंतर्गत दिनांक 08.02.2017 को एक अधिसूचना जारी की है, जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत राशन कार्ड धारक लाभार्थियों को एनएफएसए के अंतर्गत सब्सिडी प्राप्त करने के लिए आधार नंबर होने का प्रमाण प्रस्तुत कराना होगा। यह शर्त सभी नए लाभार्थियों पर भी लागू होगी। यह अधिसूचना असम, मेघालय और जम्मू-कश्मीर राज्य को छोड़कर सभी राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों में दिनांक 08.02.2017 से प्रभावी होगी।

 

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के लाभभोगी, जिनके पास आधार नंबर नहीं है अथवा उन्होने अभी आधार के लिए नामांकन नहीं कराया है, परंतु राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत सब्सिडी का लाभ उठाने के इच्छुक हैं, उन्हें 30 जून, 2017 तक आधार नामांकन के लिए आवेदन करना है और वे आधार के लिए नामांकन हेतु किसी भी आधार नामांकन केंद्र से सम्पर्क कर सकते हैं।

 

राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अधीन सब्‍सिडी प्राप्‍त करने वाले लाभार्थियों को आधार नंबर प्रदान किए जाने तक ऐसे व्‍यक्‍तियों को उनकी पात्रता का खाद्यान्न राशन कार्ड और आधार नामांकन आईडी पर्ची अथवा 8 दस्‍तावेजों में से किसी एक अर्थात मतदाता पहचान पत्र, पैन कार्ड, पासपोर्ट, ड्राईविंग लाइसेंस, सरकारी लेटर हेड पर राजपत्रित अधिकारी/तहसीलदार द्वारा जारी फोटो युक्त पहचान प्रमाण पत्र, डाक विभाग द्वारा जारी नाम और फोटो युक्त पता कार्ड, किसान फोटो पासबुक और राज्‍य सरकारों/संघ राज्‍य क्षेत्र प्रशासनों द्वारा निर्दिष्‍ट कोई अन्‍य दस्‍तावेज सहित आधार नामांकन के लिए राज्‍य सरकार को उनके द्वारा किए गए अनुरोध की प्रति प्रस्‍तुत करने पर जारी किया जाएगा।

 

 

अनधिकृत वेबसाइटों और एजेंसियों के खिलाफ यूआईडीएआई ने कसी कमर

जनता से पैसा ऐंठकर आधार संबंधी सेवाएं प्रदान करने का दावा करने वाली अनधिकृत वेबसाइटों और एजेंसियों के खिलाफ यूआईडीएआई ने कमर कस ली है। ये फर्जी एजेंसियां मोबाइल एप्लिकेशन के जरिये आधार कार्ड से संबंधित सेवाएं प्रदान करने का दावा करती हैं। यूआईडीएआई ने सख्त कार्रवाई करते हुए गूगल प्लेस्टोर पर उपलब्ध 12 वेबसाइटों और 12 मोबाइल एप्लिकेशन को बंद करवा दिया है और आदेश जारी किया है कि ऐसी 26 और फर्जी वेबसाइटों को फौरन बंद किया जाए।

 

यूआईडीएआई के संज्ञान में यह बात आई है कि गूगल प्लेस्टोर के जरिये फर्जी वेबसाइट और मोबाइल एप्लिकेशन ऑनलाइन आधार कार्ड को डाउनलोड करने, आधार कार्ड बनवाने, पीवीसी आधार कार्ड इत्यादि सेवाएं दे रहे हैं। इस तरह वे लोगों से गैर कानूनी तौर पर आधार नम्बर और लोगों का ब्यौरा हासिल करते हैं।

 

यूआईडीएआई के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. अजय भूषण पांडे ने बताया है कि यूआईडीएआई ने मोबाइल एप्लिकेशन या वेबसाइट के मालिकों को आधार कार्ड से संबंधित किसी भी सेवा के लिए अधिकृत नहीं किया है। उन्होंने कहा कि आधार संबंधित हर प्रकार की सूचना केवल आधार अधिनियम 2016 के प्रावधानों के तहत प्राप्त की जा सकती है। इसका उल्लंघन करने पर आधार अधिनियम की धारा 38 और खंड 7 के तहत दंड का प्रावधान किया गया है। उन्होंने बताया कि अधिनियम में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसे प्राधिकरण ने अधिकृत नहीं किया है, अगर वह जानबूझ कर केंद्रीय पहचान आंकड़ों को प्राप्त करने की अनधिकृत चेष्टा करता है तो वह दंड का भागी होगा।

 

डॉ. पांडे ने कहा कि अनधिकृत वेबसाइटों और मोबाइल एप्लिकेशन प्रदाता गैर कानूनी रूप से आधार का ‘लोगो’ इस्तेमाल कर रहे हैं जो आधार अधिनियम और कापीराइट अधिनियम का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि इन वेबसाइटों और मोबाइल एप्लिकेशन प्रदाताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने पर विचार किया जा रहा है। उन्होंने लोगों को सावधान किया कि वे इन वेबसाइटों के झांसे में न आएं और किसी को भी अपनी जानकारी न दें।

 

आधार संबंधी समस्त सेवाएं केवल यूआईडीएआई की वेबसाइट www.uidai.gov.in पर ही उपलब्ध हैं। इसके अलावा आधार नाम से संबंधित कोई भी वेबसाइटों और मोबाइल एप्लिकेशन फर्जी है। यूआईडीएआई ने सुझाव दिया है कि अगर किसी व्यक्ति का आधार कार्ड खो जाता है तो वह उसे यूआईडीएआई की अधिकृत वेबसाइट से निशुल्क डाउनलोड कर सकता है।  

“जिम्मेदार स्वास्थ्य देखभाल”  विजन के साथ 11 फरवरी से होगा फॉर्मा कुंभ आयोजन

रसायन एवं उवर्रक मंत्रालय का फॉर्मास्यूटिकल्स विभाग उद्योग चैंबर फिक्की के सहयोग से बंगलूरू में 11 से 13 फरवरी 2017 तक “जिम्मेदार स्वास्थ्य देखभाल” के विजन के साथ “इंडिया फॉर्मा एवं इंडिया मेडिकल डिवाइस 2017”का आयोजन कर रहा है जो फॉर्मास्यूटिकल एवं चिकित्सा उपकरण क्षेत्र पर द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी एवं सम्मेलन है।

 

बंगलुरू में इस समारोह के पूर्वानुलोकन के दौरान मीडिया को संबोधित करते हुए केंद्रीय रसायन एवं उवर्रक तथा संसदीय मामले मंत्री अनंत कुमार ने जानकारी दी कि यह अंतर्राष्ट्रीय समारोह न केवल भारतीय फॉर्मास्यूटिकल एवं चिकित्सा उपकरण क्षेत्र हेतु वैश्विक क्षमता के दोहन के लिए एक मंच उपलब्ध कराएगा बल्कि यह भारत को इस क्षेत्र के लिए एक आकर्षक निवेश गंतव्य के रूप में खुद को प्रदर्शित करने का एक अवसर उपलब्ध कराएगा एवं भारतीय विनिर्माताओं के साथ संयुक्त उद्यमों को बढ़ावा देने के द्वारा अनुसंधान एवं विकासों, नैदानिक परीक्षणों जैसे नए क्षेत्रों में विदेशी निवेश भी लाएगा। साथ ही, यह दुनिया भर से इस क्षेत्र में व्याप्त सर्वश्रेष्ठ पद्धतियों को भी देश में लाएगा।

 

इस वर्ष “इंडिया फॉर्मा एवं इंडिया मेडिकल डिवाइस 2017” सम्मेलन : चिकित्सा उपकरण – “भविष्य को आकार देना – सही चयन करना” एवं फॉर्मा – “भारतीय फॉर्मा के भविष्य को आकार देना”विषयों के ईर्द-गिर्द आधारित है। यह सम्मेलन वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी बनने में भारतीय फॉर्मा एवं चिकित्सा उपकरण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए एक मंच साबित होगा। यह अंतर्राष्ट्रीय दवा नियामकों, अंतर्राष्ट्रीय क्रेताओं, निवेशकों एवं वैश्विक फॉर्मा एवं चिकित्सा उपकरण क्षेत्र के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के लिए एक मिलन बिंदु की भूमिका निभाएगा जो भाग लेने वाले हितधारकों को नेटवर्क करने तथा आपस में ही सीखने के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराएगा। कुमार ने कहा कि यह सम्मेलन एक फॉर्मा कुंभ होगा और इसकी विशेषता अंतर्राष्ट्रीय दवा नियामकों की बैठक होगी।

 

एक्टिव फॉर्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट्स (एपीआई) एवं चिकित्सीय उपकरणों के स्वदेशी निर्माण पर विशेष जोर के साथ बल्क ड्रग फॉर्मुलेशन में भारत की बड़ी हिस्सेदारी की जरूरत पर बल दिया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में अधिक शोधकर्ताओं की जरूरत है और इसलिए सरकार देश भर में राष्ट्रीय फॉर्मास्यूटिकल शिक्षा एवं अनुसंधान (एनआईपीईआर) की स्थापना के द्वारा इस दिशा में नियमित रूप से कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि इसके अतिरिक्त फॉर्मा एवं चिकित्सा उपकरण के क्षेत्र में उद्योग के साथ सहयोग बढ़ाने की भी आवश्यकता है। इस दिशा में फॉर्मास्यूटिकल विभाग विभिन्न राज्यों में फॉर्मा उद्यानों एवं कलस्टरों की स्थापना करने की एक योजना पर काम कर रहा है जिससे उत्पादन लागत में उल्लेखनीय रूप से कमी लाने में मदद मिलेगी।

फिल्म कंडीशन एसेस्मेंट से होगी फिल्मी धरोहर की सुरक्षा

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में सचिव अजय मित्तल ने कहा है कि “सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय देश की फिल्मी एवं गैर फिल्मी धरोहर की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और वैश्विक मानकों के अनुरूप भावी पीढ़ी के लिए फिल्मों एवं गैर फिल्मी सामग्रियों के परिरक्षण के लिए सभी संभव कदम उठा रहा है।” वह आज यहाँ पुणे में फिल्म कंडीशन एसेस्मेंट के लॉन्च के अवसर पर बोल रहे थे जो राष्ट्रीय फिल्म धरोहर मिशन, एनएफएचएम के कार्यान्वयन का पहला चरण है।

 

इसे और अधिक स्पष्ट करते हुए मित्तल ने कहा “यह दुनिया में अपनी तरह की पहली परियोजना है जिसमें सरकार फिल्म संरक्षण के पहलू की दिशा में भारी धनराशि खर्च कर रही है जिससे कि समृद्ध फिल्मी धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए उपलब्ध कराए जा सके। एनएफएआई में लगभग 1,32,000 फिल्मों के रीलों की स्थिति का आकलन किया जाएगा और इन रीलों के जीवन को विस्तारित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। प्रथम चरण के दौरान, प्रत्येक फिल्म की रील को ट्रैक किया जाएगा और आरएफआईडी टैगिंग के द्वारा उनकी निगरानी की जाएगी”

 

इस अवसर पर मित्तल ने गैर फिल्मी सामग्री के डिजिटाइजेशन की एनएफएआई की पहल की भी शुरूआत की। सचिव महोदय ने कहा “सरकार की डिजिटल इंडिया पहल की दिशा में यह एक कदम है जिसमें देश की गैर-फिल्मी धरोहर को डिजिटाइज किया जाएगा, उनका पुनः स्थापन किया जाएगा तथा व्यापक स्तर पर उसे लोगों को उपलब्ध कराया जाएगा।”एनएफएआई बड़ी संख्या में पोस्टरों, तस्वीरों, गीत पुस्तिकाओं, इश्तेहारों, प्रेस क्लिपिंग, स्लाइड ट्रांसपेरेंसी, ग्लास  निगेटिव्स आदि जैसी फिल्म सहायक सामग्रियों का परिरक्षक रहा है जिन्हें इस प्रक्रिया के दौरान डिजिटाइज किया जाएगा तथा उनका पुनः स्थापन किया जाएगा।

 

पीएमजीएसवाई के तहत 31 मार्च तक बनेगीं 48,812 किलोमीटर सड़क

ग्रामीण विकास मंत्रालय की प्रमुख योजना प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत 31 मार्च, 2017 तक 48,812 किलोमीटर के वार्षिक लक्ष्य को प्राप्त कर लिया जाएगा क्योंकि हर साल जनवरी से मई माह के बीच निर्माण कार्य गति पकड़ता है. 27 जनवरी, 2017 तक  32,963 किमी लंबी सड़कों का निर्माण किया जा चुका है जो कि वार्षिक लक्ष्य का 67.53 फीसदी है। इसका मतलब ये है कि रोजाना करीब 111 किमी. सड़कें बनाई जा रही हैं। वार्षिक लक्ष्य (48,812 किमी.) के मुताबिक रोजाना 133 किमी. सड़क का निर्माण किया जाना चाहिए। यह समझना जरूरी है कि सितंबर से दिसंबर तक का वक्त सड़क निर्माण की दृष्टि से काफी कमजोर होता है जबकि जनवरी से मई माह तक का वक्त निर्माण कार्य के लिए काफी बेहतर होता है। अप्रैल से अगस्त, 2016 की समयावधि के तहत पीएमजीएसवाई के अंतर्गत प्रतिदिन औसतन 139 किमी. सड़क का निर्माण हुआ। ऐसे में 31 मार्च, 2017 तक इस योजना के वार्षिक 48,812 किमी. लंबाई के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया जाएगा।

2016-17 में बस्तियों से जोड़े जाने का वार्षिक लक्ष्य 15000 बस्तियां था, जबकि 27.01.2017 तक 6,473 बस्तियों से जोड़ा जा चुका है। 31 मार्च, 2017 तक पीएमजीएसवाई के अंतर्गत बस्तियों से जोड़े जाने का लक्ष्य भी पूरा कर लिया जाएगा।

पीएमजीएसवाई के तहत सड़कों के निर्माण में ''हरित प्रौद्योगिकी और गैर-परंपरागत सामग्री के इस्तेमाल पर ध्यान केंद्रित किया गया क्योंकि यह स्थानीय रूप से उपलब्ध थी। यह कम लागत वाली, गैर-प्रदूषण, श्रम के अनुकूल और तेजी से निर्माण करने वाली प्रौद्योगिकियां, सामग्री हैं। पीएमजीएसवाई के पहले 14 वर्षों के दौरान इन प्रौद्योगिकी,सामग्री के इस्तेमाल से सिर्फ 806.93 किमी. सड़कें बनाई गईं। पिछले दो वर्षों के दौरान पीएमजीएसवाई के तहत इन प्रौद्योगिकी, सामग्री के इस्तेमाल से 2,634.02 किमी. सड़कें बनाई गईं। मौजूदा वर्ष में 27.01.2017 तक इन प्रौद्योगिकी, सामग्री के इस्तेमाल से 3,000 किमी. सड़कें बनाई गईं।

बांध सुरक्षा परियोजनाओं के लिए दो प्रमुख संस्थानों के साथ करार

 

 

जल संसाधन नदी विकास, गंगा संरक्षण मंत्रालय के अधीन केंद्रीय जल आयोग ने आज देश के दो प्रमुख संस्‍थानों के साथ बांधों की सुरक्षा को और अधिक उन्‍नत बनाने के लिए करार किया है। यह समझौता राष्‍ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्‍थान मद्रास एवं भारतीय विज्ञान संस्‍थान बंगलूरू के साथ किया गया है। इन करारों से आयोग को उन्‍नत एवं विशेष उपकरण एवं सॉफ्टवेयर की खरीद में मदद मिलेगी जो बांध पुनर्वास एवं सुधार परियोजनाओं के लिए मददगार साबित होगा।

      जल संसाधन नदी विकास, गंगा संरक्षण मंत्रालय ने विश्‍व बैंक द्वारा सहायता प्राप्‍त बांध पुनर्वास और सुधार परियोजना में सहायता के लिए देश के चुनिंदा शैक्षिणक एवं शोध संस्‍थानों का चयन किया है। इससे जांच प्रयोगशालाओं के सुदृढि़करण और उनकी विश्‍लेषणात्‍मक क्षमता में वृद्धि को मदद मिलेगी। इससे बांध सुरक्षा की चिंताओं से इन संस्‍थाओं के विशेषज्ञों को मौके पर परिचित कराने का अवसर भी प्राप्‍त होगा।

      बांध पुनर्वास और सुधार परियोजना योजना के तहत उन 250 बांधों के पुनर्वासों में मदद की जा रही है, जिन्‍हें इसकी आवश्‍यकता है। इस तरह के बांधों को पुनर्वास के लिए तकनीकी सहायता की बहुत आवश्‍यकता है। भारत सरकार ने तय किया है कि देश के चुनिंदा संस्‍थानों का बांध सुरक्षा के क्षेत्र में क्षमता संवर्धन किया जाएगा ताकि वे बांध सुरक्षा से संबंधित प्रशिक्षण एवं सलाहकार सेवाएं उपलबध करा सकें।  

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