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updated 5:35 PM UTC, Apr 26, 2017
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चंपारण में सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष में गांधी और गांव पर चर्चा

देश भर में मनाए जा रहे चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष के दौरान अनोखा कार्यक्रम बिहार के चंपारण में ही आयोजित हुआ। 15 अप्रैल को पूर्वी चंपारण के एक छोटे से गांव फुलवरिया में लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन किया गया। किसी गांव में लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन अपने-आप में बेहद खास बात थी। फुलवरिया गांव जिले के सुगौली प्रखंड में है और आज़ादी की लड़ाई में इस गांव के लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। शायद यही वजह है कि गांव में आयोजित इस कार्यक्रम में कई नामचीन हस्तियों ने शिरकत की।

 

कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे यूपी के पूर्व डीजीपी और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पूर्व वीसी विभूति नारायण राय ने इस कार्यक्रम को बापू के सपनों का कार्यक्रम बताया। राय ने कहा कि बापू ने गांवों को समृद्ध बनाने के जो रास्ते सुझाए ये कार्यक्रम उसी रास्ते पर एक यात्रा है। श्री राय देश के जाने-माने स्तंभकार और लेखक भी हैं। गांव के लोगों के बीच पहुंचे देश के बड़े लेखक-पत्रकारों में अरविंद मोहन भी शामिल थे। इस मौक़े पर अरविंद मोहन की लिखी तीन किताबों का विमोचन भी हुआ। तीनों किताबें चंपारण सत्याग्रह पर लिखी गईं हैं।

 

चम्पारण सत्याग्रह के सहयोगी और चम्पारण सत्याग्रह की कहानी को सस्ता साहित्य मंडल ने प्रकाशित किया है जबकि प्रयोग चम्पारण ज्ञानपीठ प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। मौके पर अरविंद मोहन ने कहा कि चंपारण के किसानों को एक बार फिर नील की खेती शुरू करनी चाहिए, इस बार ये खेती खुद के मुनाफे के लिए होगी न कि अंग्रेजों के मुनाफे के लिए। वरिष्ठ पत्रकार और प्रभात खबर अखबार के संस्थापक संपादक एस एन विनोद ने चंपारण सत्याग्रह के इतिहास को याद किया। इस मौके पर ऑल इंडिया रेडियो के पूर्व डायरेक्टर जनरल और देश के जाने-माने कवि लक्ष्मी शंकर बाजपेई ने कहा कि अगर ये कार्यक्रम नहीं होता तो उन्हें सत्याग्रह भूमि पर आने का मौक़ा नहीं मिलता। गांव में आयोजित हुए इस कार्यक्रम में स्थानीय सांसद डॉ संजय जायसवाल भी शामिल हुए और उन्होंने कहा कि इस किस्म के आयोजन का गांवो में होना निश्चित तौर पर बहुत ही सराहनीय प्रयास है।

 

कार्यक्रम का आयोजन भोर ट्रस्ट नाम की एक संस्था ने किया था। इस मौके पर गांधी की चंपारण यात्रा से जुड़ी एक स्मारिका का विमोचन भी किया गया। भोर लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजक और वरिष्ठ पत्रकार अनुरंजन झा ने कहा कि चंपारण में गांधी का आंदोलन ये साबित करता है कि जुर्म के खिलाफ शांतिपूर्ण आंदोलन करके भी गुलामी से मुक्ति पाई जा सकती है। समारोह में पंचायत प्रतिनिधियों और गांधी से जुड़े सवालों का जवाब देने वाले गांव के करीब 50 स्कूली बच्चों को भी सम्मानित किया गया।

बिहार में रामनवमी पर देवी-देवताओं के पोस्टर फाडे! नवादा में कर्फ्यू जैसा माहौल

बिहार: बिहार के नवादा जिले में बुधवार को राम नवमी के अवसर पर कुछ लोगों द्वारा शहर में लगाए गए हिंदू देवी-देवताओं के पोस्टर फाड़ दिए। जिसके बाद विवाद होने से शहर में हालात काफी तनावपूर्ण हो गए हैं। शहर के कोने-कोने पर प्रशासन की कड़ी नजर है। शहर में कर्फ्यू जैसे हालात हैं, जिसे देखते हुए पुलिस बल को तैनात कर दिया गया। नवादा में राम नवमी के अवसर पर कुछ शरारती तत्वों ने जमकर मनमानी की। राम नवमी के जुलूस के दौरान गाड़ियों के शीशे तोड़ने और दुकानों को लूटने की कोशिश की गई।


जिसको देखते हुए पुलिस प्रशासन कड़क हुई और लोगों को गिरफ्तार भी किया। जिसके बाद से पुलिस ने हालत नियंत्रण में किये। नवादा में पहले भी राम नवमी के अवसर पर विवाद हुए हैं और प्रशासन हमेशा राम नवमी के अवसर पर काफी सतर्कता बरतती है।

सीतापुर में स्वच्छ भारत अभियान के नाम पर पर हो रहा मजाक

गौरव शर्मा/सीतापुर देश में प्रधानमंत्री मोदी और उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भले ही प्रदेश में सफाई व्यवस्था को लेकर संजीदा हो लेकिन शायद सीतापुर जनपद के स्वस्थ्य अधिकारी उनकी इस संजीदगी से कोई सरोकार नहीं रखते है , और शायद तभी जिला अस्पताल में गंदगी का ढेर लगा है , आवारा जानवर मरीजो के कमरों में चहल कदमी करते नजर आते है। लेकिन इन सब पर यहाँ का स्वास्थ्य महकमा आँखे बंद कर मौन क्यों बैठा है ? यह एक सोंचनीय विषय है।

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स्वास्थ्य विभाग एक ऐसा महत्वपूर्ण स्थान है , जहा पर सफाई व्यवस्था दुरुस्त होना अत्यंतया  लाजिमी माना जाता है। कारण स्पस्ट है की गंभीर बीमारियों से ग्रसित मरीज को साफ़ सुथरे माहौल में उचित इलाज उपलब्ध कराया जा सके। लेकिन उत्तर प्रदेश के जनपद सीतापुर के  जिला अस्पताल में ऐसा कुछ बिलकुल भी देखने को नहीं मिलेगा। अस्पताल में निरीक्षण के दौरान जब हमने सबसे संवेदनशील यूनिट बर्न विभाग का रुख किया। बर्न विभाग परिसर की दीवार के चारो और कूड़े का अम्बार लगा हुआ था , जिसकी बदबू से सांस लेना भी मुश्किल था। यूनिट के अन्दर का माहौल देख कर तो ऐसा लगा जैसे यहाँ मरीज सी ज्यादा आवारा कुत्तो ने जगह जमा रक्खी हो. ऐसे में ये अंदाजा लगाना आसान नहीं था की जिला अस्पताल के अधिकारी बीमारियों के इलाज में जुटे है या बीमारियों को दावत देने में।

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अस्पताल परिसार में व्याप्त गंदगी के बाबत जब जिला अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक ए.के.गौतम से बात की गयी तो उन्होंने बड़ी ही सरलता से कहा की अब जिला अस्पताल में एकत्र होने वाला कूड़ा आम कूड़े से अलग है इसलिए बदबू होना आम है । कूड़ा हटाया जाता है लेकिन दो से तीन दिनों में संवेदनशील यूनिट बर्न विभाग के पास खुले में कूड़े की भरमार होने से यहाँ के मरीज कितना सुरक्षित है , इस बात का जवाब भी बड़ी ही सरलता से कोई भी आम आदमी दे सकता है।

 

गौरतलब बात ये है की जब स्वास्थय विभाग से जुड़े जिम्मेदार अधिकारी सफाई व्यवस्था के प्रति इतने उदासीन है तो फिर एक आम नागरिक से हम सफाई जागरूकता के लिए कितनी उम्मीदे लगा सकते है।

राजगीर में तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन का उद्घाटन

संस्कृति मंत्रालय तथा डीम्ड यूनिवर्सिटी नव नालंदा महावीर द्वारा आयोजित तीन दिवसीय “अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन” का आज उद्घाटन हुआ। बिहार के राजगीर इंटरनेशनल बौद्धिस्ट कांफ्रेंस में बौद्ध धर्म गुरू दलाई लामा तथा संस्कृति तथा पर्यटन मंत्री महेश शर्मा ने इस सम्मेलन का उद्घाटन किया। इस अवसर पर बौद्ध भिक्षुओं द्वारा मंगला पथ का मंत्रोच्चारण भी किया गया।

अपने उद्घाटन संबोधन के दौरान दलाई लामा ने कहा कि सभी धार्मिक पंरपराओं की सच्चाई एक है जो कभी बदल नहीं सकती। इससे देश के साथ-साथ विश्व को भी प्यार और करुणा के माध्यम से शांति प्राप्त करने में मदद मिलेगी जो बौद्ध धर्म का प्रमुख सूत्र है। उन्होंने कहा कि हमें न केवल बुद्ध और उनकी शिक्षाओं के बारे में पढ़ना चाहिए बल्कि इसका अपने जीवन में प्रयोग और अनुभव भी लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंसा की तरह करुणा भी मानव का एक बुनियादी स्वभाव है। उन्होंने भावनाओं पर जोर देते हुए कहा कि हमारे अंदर जो नकारात्मक भावनाएं पैदा होती हैं उससे हम पीडित और बीमार हो जाते हैं। इसलिए हमें विपश्यना योग के माध्यम से मन को शुद्ध करना चाहिए।

डॉ. महेश शर्मा ने अपने भाषण में कहा कि नालंदा की पवित्र भूमि पर आने पर उन्हें अत्यधिक प्रसन्नता हुई है। उऩ्होंने कहा कि बुद्ध से संबंधित इस तरह के अधिकांश पवित्र स्थान उत्तर प्रदेश या बिहार में स्थित हैं। उन्होंने विश्व के सभी कोनों से आए हुए मेहमानों का स्वागत किया और उम्मीद जताई कि यह सम्मेलन सही मायने में भविष्य के लिए कुछ संदेश जरूर देगा।

2017 के पहले संसद सत्र में मिलेगा भोजपुरी को संवैधानिक भाषा का दर्जा

नयी दिल्ली। भोजपुरी को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल कर संवैधानिक भाषा बनाने का फैसला लिया गया है। संसद के अगले सत्र में सरकार लोगों को यह तोहफा दे देगी। भोजपुरी के साथ ही राजस्थानी और भोटी को भी संविधान की 8वीं सूची में शामिल किया जाएगा।राजस्थानी, भोजपुरी और भोटी देश के बाहर भी बोली जाती हैं। गौरतलब है कि कि 38 भाषाएं आठवीं अनुसूची में आना चाहती हैं।

 

लेकिन पीएम को बताया गया कि तीन भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें देश के बाहर मान्यता हासिल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ध्यान इस ओर तब गया, जब वह भूटान यात्रा पर गए थे। वहां भोटी भाषा बोली जा रही थी।मालूम हो कि भोजपुरी सूरीनाम, मॉरिशस, त्रिनिदाद और फिजी की मान्यता प्राप्त भाषा है, जबकि राजस्थानी भाषा को नेपाल में मान्यता मिली हुई है।


पीएम को बताया गया है कि यह भाषा आपके देश में भी बोली जाती है। इस पर उन्होंने और जानकारी चाही है कि ऐसी कौन सी भाषाएं हैं जो देश के बाहर भी बोली जाती हैं।

नोटबंदी के विरोध में लालू पडे अकेले नही बचा कोई "चारा"

आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव नोटबंदी के खिलाफ मोर्चेबंदी में अब भी लगे हैं...जबकि उनके साथ बिहार की सरकार चला रहे सीएम नीतीश कुमार अलग राह पर हैं...उनका स्टैंड नोटबंदी पर क्लीयर है...इस मसले पर केन्द्र का समर्थन करने के बाद उनके बड़े भाई नाराज हैं....लेकिन आरजेडी कह रही है कि 28 दिसम्बर के महाधरने में नीतीश उनके साथ हैं...शायद ये कहकर आरजेडी समर्थन को लेकर उनपर दबाव बना रही है... शराबबंदी पर माइलेज लेने के बाद नीतीश के लिए, आरजेडी की जिद पर झुकना थोड़ा मुश्किल है... कशमकश की स्थिति है नीतीश के लिए... ऐसे में नीतीश की परेशानी बढ़ाने के सिवा कुछ नहीं कर रहे लालू... लालू को लगता है कि जनता का उन्हें समर्थन मिलेगा...लेकिन अन्दरखाने में आरजेडी भी टूटी लगती है...कि इस मसले पर जनता का समर्थन उन्हें मिलने जा रहा है...पप्पू यादव की पार्टी जन अधिकार पार्टी ने इसकी झलक दिखा भी दी है...

 

ऐसे में आशंका है कि आरजेडी को मुंह की खानी पड़ेगी.. सरकार में हैं, इसलिए सड़क- रेल रोक नहीं सकते...अराजक स्थिति पैदा होते फिर देर नहीं लगेगी...इसलिए अपनी सरकार की जगहंसाई से भी बचना है...इसलिए महाधरना देंगे...रथ रवाना कर दिया गया है... हरी झंडी के साथ टेम्पो पर कुछ पोस्टर साटकर ...टेम्पो जहां जहां घूमेगी...वहां-वहां कुछ देर के लिए अटेंशन भले ही 'क्रियेट' कर ले...लेकिन 'क्रियेशन' हो ही जाएगा...उम्मीद इसकी कम ही है...

 

बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष मंगल पांडेय और गिरिराज सिंह कह चुके हैं कि लालू के पास अब कोई चारा नहीं है...राजनीति का...मुद्दा है नहीं...इसलिए वो नोटबंदी पर अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए प्रदर्शन पर उतरे हैं...

 

लालू का स्टैंड अपनी जगह ठीक हो सकता है...लेकिन स्टैंड पर वो खुद कितने खरे उतरते हैं वो 28 दिसम्बर को साफ हो जाएगा...बहरहाल, एटीएम और बैंकों पर जो अफरातफरी का माहौल था...वो अब नहीं दिखती...भ्रष्टाचार के मारे लोग अब शांत हैं...नोटबंदी का समर्थन कर रहे हैं...लेकिन शायद राजनीति का तकादा है कि मुद्दा है नहीं फिर भी मुद्दा बनाओ...मुद्दे में भले ही माद्दा न हो...मुंह जरूर चिढ़ाओ....

 

जिन्दाबाद और इनकलाब का नारा लगाने भर से न नोटबंदी खत्म हो जाएगी...न कोई पहाड़ टूट जाएगा...ये लालू भी जानते हैं... लेकिन बिहार में अकलियतों और गरीबों की राजनीति करने वाले लालू को मुद्दा लपकना भी आता है...लपेटना भी...ये उसकी बानगी दिखती है...

नित्यानंद के हाथ प्रदेश बीेजपी की नैया

पटना, बिहार प्रदेश बीजेपी से मंगल चार साल बाद विदा हो लिये।  2012 में जब मंगल ने गद्दी संभाली तो शुरुआती दिनों में सी पी ठाकुर समेत कुछ नेताओं ने नाराजगी जाहिर की थी।कई विवाददास्पद बयान दिये...लेकिन पार्टी ने उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देकर मामले को ठंडा किया।

छोटी-मोटी घटनाओं को छोड़ मंगल पांडेय का नेतृत्व निर्विवाद रहा।मंगल के जरिए पार्टी ने राज्य के सवर्ण जातियों के वोटबैंक और पार्टी में प्रभाव को जाहिर करने की कोशिश की थी लेकिन पार्टी को शायद लगता है कि मंगल को लेकर उसका दांव विधानसभा चुनाव में ठीक नहीं बैठा।

 

पार्टी में अन्दरुनी कलह भी सामने आई..जिसका खामियाजा मोदी लहर के बाद भी उठाना पड़ा....नीतीश ने पिछड़ों पर दांव खेला और धुर विरोधी आरजेडी से मिल गये...लालू से गलबहियां कर ली....बड़े भाई और छोटे भाई का दांव सही पड़ा और दलित-पिछड़ों के कार्ड ने कमाल कर दिया।

 

अब नित्यानंद राय को इसी कार्ड को तोड़ने की जिम्मेदारी दी गयी है। नित्यानंद राय ओबीसी से हैं और यादव भी...जिस क्षेत्र से आते हैं...वो लालू का गढ़ रहा है...ऐसे में जिम्मेदारी नित्यानंद राय पर बड़ी है...बीजेपी आलाकमान ने  जिन समीकरणों को मजबूत करने के इरादे से नित्यानंद राय को ये जिम्मेदारी दी है...क्या वो जिम्मेदारी पूरी हो पाएगी...और मंगल पांडेय को हटाने से जो मैसेज गया है...क्या उसकी भरपाई नित्यानंद कर पाएंगे...ये बड़ा सवाल है।

 

बिहार के उजियारपुर सांसद नित्यानंद राय लोकसभा चुनाव में आरजेडी के आलोक कुमार मोहता को 60 हजार वोटों से हराया था...वो हाजीपुर सीट से 4 बार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं। वैशाली के कर्णपुरा गांव के रहने वाले नित्यानंद राय ने आर एन कॉलेज से बीए की शिक्षा प्राप्त की है। नित्यानंद शुरू से ही आरएसएस से जुड़े रहे हैं और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। 1990 में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़े और सक्रिय राजनीति का हिस्सा बनें। यानी राजनीति की हर बारीकियों से वो परिचित हैं।

 

बहरहाल, बीजेपी आलाकमान ने चार वर्षों के बाद नेतृत्व परिवर्तन किया है। आगामी चुनाव को देखते हुए, पार्टी की अनदुरुनी एकता को बनाए रखने  के साथ साथ जातिगत समीकरण में सामन्जस्य बिठाना, नित्यानंद के सामने चुनौती होगी।

राजीव रंजन

 

 

 

बिहार के इस IAS ने खुद बना डाली कैंसर की दवा, अपने पिता और बेटे का कैंसर किया ठीक

पटना, बिहार कैडर के एक आईएएस अधिकारी एसएम राजू ने पहले अपने पापा की किडनी की बीमारी और फिर बेटे के कैंसर के इलाज के लिए खुद ही आयुर्वेदिक दवाएं बनाईं और दोनों का इलाज कामयाब रहा. आज उनकी बनाई 14 दवाओं को सरकारी लाइसेंस मिल चुका है।
 
 
एसएम राजू की दवाओं का सेवन कई बड़ी हस्तियां भी करके अपनी बीमारियों से मुक्ति पा चुके हैं। राजू ने कैंसर, डायबिटिज, एंटी एंजिग, किडनी, लिवर की बीमारी को लेकर आयुर्वेदिक दवाएं बनाई हैं। राजस्थान हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एसएन झा, फिल्म अभिनेता आदित्य पंचोली से लेकर कई मंत्री और बड़े अधिकारी उनकी दवाओं के इस्तेमाल से ठीक हो चुके हैं।
 
दरअसल राजू के पिता को किडनी की बीमारी थी और बाद में बेटे को कैंसर हो गया था। दोनों के इलाज में अंग्रेजी दवाइयां काम नहीं कर पा रही थीं और उनके साइड इफेक्ट्स अलग थे। बिहार कैडर के एक आईएएस अधिकारी एसएम राजू ने पहले अपने पापा की किडनी की बीमारी और फिर बेटे के कैंसर के इलाज के लिए खुद ही आयुर्वेदिक दवाएं बनाईं और दोनों का इलाज कामयाब रहा। आज उनकी बनाई 14 दवाओं को सरकारी लाइसेंस मिल चुका है।
 
 
एसएम राजू की दवाओं का सेवन कई बड़ी हस्तियां भी करके अपनी बीमारियों से मुक्ति पा चुके हैं। राजू ने कैंसर, डायबिटिज, एंटी एंजिग, किडनी, लिवर की बीमारी को लेकर आयुर्वेदिक दवाएं बनाई हैं। राजस्थान हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एसएन झा, फिल्म अभिनेता आदित्य पंचोली से लेकर कई मंत्री और बड़े अधिकारी उनकी दवाओं के इस्तेमाल से ठीक हो चुके हैं। 
 
1 नवंबर से दवा मार्केट में
 
दरअसल राजू के पिता को किडनी की बीमारी थी और बाद में बेटे को कैंसर हो गया था. दोनों के इलाज में अंग्रेजी दवाइयां काम नहीं कर पा रही थीं और उनके साइड इफेक्ट्स अलग थे।
 
इसके बाद एग्रीकल्चर ग्रैजुएट राजू ने ठान लिया कि वह खुद अपने पिता और बेटे की बीमारी के लिए आयुर्वेदिक दवा बनाकर उनका इलाज करेंगे. दृढ़निश्चय और मेहनत से राजू ने ऐसी दवा बना डाली और देखते ही देखते उन दवाओं से उनके पिता ठीक हो गए और बेटे की हालत में सुधार दिखने लगा।
 
14 दवाओं को मिला सरकार से लाइसेंस
 
बिहार सरकार के रेवेन्यू विभाग में अपर सचिव राजू शुरू से ही विज्ञान और आयुर्वेद में रुचि रखते थे. राजू अपने काम के बाद आयुर्वेदिक दवाओं पर रिसर्च करने लगे जिसका नतीजा यह हुआ कि भारत सरकार ने राजू की बनाई कुल 14 दवाओं को लाइसेंस दे दिया है. इनमें कैंसर, डायबिटिज, लिवर, एंटी एजिंग, बोन औंर किडनी की बीमारियों की दवाएं शामिल हैं।
 
राजू का कहना है कि आयुर्वेदिक दवाओं को बेंगलुरु की एक कंपनी बना रही है. दवा से होने वाली आय का 50 फीसदी हिस्सा गरीब बच्चों की शिक्षा पर खर्च होगा. ये दवाएं पूरी तरह से आयुर्वेदिक हैं जिनका कोई साइड इफेक्ट्स भी नहीं है. ये दवाएं ‘मिरेकल ड्रिंक्स’ के नाम से उपलब्ध हैं। 

पूर्व सूचनायुक्त और उप्र सरकार के सलाहकार फरजंद अहमद ने दुनिया को किया अलविदा

वो दर्द ज़माने के लिखता था।कागज़ पर आग कलम से बोता था।कालाहांडी की भूख की खबर हो,या फिर जहाना  बाद हत्याकांड में कोई  बड़ा खुलासा।बेबाक ,निर्भीकता,निष्पक्षता थी उनकी खास पहचान। हम बात कर रहे हैं कलम के उस सिपाही की जो अब हमारे बीच नहीं रहा।"राइट विद पैशन "उनका शगल था।जी,हाँ हम बात कर रहे है इंडिया टुडे के पूर्व संपादक,बिहार के पूर्व सूचनायुक्त और उप सरकार के सलाहकार फरजंद अहमद की।उनका अचानक यूँ दुनिया को अलविदा कहना पत्रकार जगत को अखर गया है।उनके निधन से पत्रकारिता का एक युग समाप्त हो गया है।02 अक्टूबर को जब हम शांति के अग्रदूत महामानव गांधी जी और सादगी की प्रतिमूर्ति लाल बहादुर शास्त्री को याद कर रहे थे।उसी सुबह को फरजंद  अहमद ने लखनऊ में दुनिया  ए फानी को अलविदा कह दिया।वो लंबे समय से बीमार थे।यूपी के यशस्वी मुख्य मंत्री माननीय अखिलेश यादव उनका न सिर्फ इलाज करवा रहे थे बल्कि उनकी सेहत को लेकर ब्यक्तिगत रूप से फिक्रमंद भी थे।ज्यूँ ही उनके निधन की खबर मिली श्रधांजलि  देने उनके आवास पहुंचे।  

मूलतः बिहार के रहने वाले फ़रजंदअहमद इंडिया टुडे का संपादक होने से पहले यूपी के ब्यूरोचीफ हुआ करते थे।उन्होंने अपने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत यू0एन0आई0 पटना से की थी।उसके बाद वो टेलीग्राफ से जुड़े। समाज में हाशिये के तबके के लोगों की समस्याओं को सरकारों तक पहुँचाना उनका धर्म था। वो बहुत ही सादगी पसंद और सरल स्वभाव के थे।कलम के सच्चे और ईमानदार सिपाही थे। नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार और अन्ना पूर्ण के प्रधान संपाक युबराज घिमिरे उनके समकालीन पत्रकारों में हैं। श्री घिमिरे से मेरी पहचान फ़रज़न्द अहमद ने ही करायी थी।श्री घिमिरे और फ़रजंद अहमद  टेलीग्राफ में एक साथ काम करते थे।मज़ेदार बात यह है कि दोनों एक दूसरे को अपना गुरु मानते थे।जब मैं काठमाण्डू में घिमिरे जी से मिलता तब वो पूछते थे क़ि मेरे गुरु फ़रज़न्द साहिब कैसे हैं।फ़रज़न्द अहमद के निधन की खबर से श्री घिमिरे आवाक रह गए ।सहसा उनको यकीन नहीं हुआ।श्री घिमिरे ने कहा कि भारतीय पत्रकारिता के इस महान स्तम्भ का जाना भारतीय पत्रकारिता के साथ साथ मेरी भी ब्यक्तिगत क्षति है।नेपाल का पत्रकारिता जगत भी उनके निधन से दुखी है।गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार मोहम्मद कामिल खान कहते हैं समाज में दबे कुचले और निचले पायदान के लोगों की आवाज़ थे फ़रज़न्द अहमद।वो सत्यवादी थे।समाज की समस्याओं को बड़ी ही निर्भीकता से उठाते थे।गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार डॉ कुमार हर्ष फरजंद अहमद को याद करते हुए कहते हैं उनका जाना पत्रकारिता में शोध और खोजबीन की पहले से ही विलुप्त हो रही परंपरा पर गहरा आघात है।करीब दस वर्षों तक तकरीबन हर हफ्ते होने वाली बातों ,उनके साथ किये गए तमाम पत्रकारीय अभियानों में बहुत कुछ सीखा ,उनके भीतर का रिपोर्टर दरअसल एक ज़बरदस्त शोधार्थी था।जिसे सतह पर दिखती चीज़ों से से ज़्यादा मज़ा सतह से नीचे देखने में आता था।लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार उत्कर्ष सिन्हा उन्हें अपना गुरु मानते हैं।श्री सिन्हा उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर ते हुए कहते हैं हर स्टोरी लिखते वक्त उनका ध्यान रहता था।आइंदा भी रखूँगा।आप नहीं होंगे गलतियां बताने को या शाबाशी देने के लिए ।मगर जो बुनियादी उसूल आपने बताये हैं वो हमेशा मेरे लिए मार्ग दर्शन करते रहेंगे।गोरखपुर न्यूज़ लाइन डॉट कॉम के संपादक मनोज सिंह कहते हैं फ़रजंद अहमद ने आदर्श पत्रकारिता की  एक मिसाल अपने कलम से कायम की है।वो हमेशा हम लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे।युवा लेखक मणीन्द्र मिस्र कहते हैं फ़रज़न्द अहमद का यूँ ही नश्वर जगत को अलविदा कहना पत्रकारिता जगत के लिए बड़ी क्षति है। फ़रज़न्द अहमद से मेरी पहली मुलाकात करीब दो दशक पूर्व हुई थी।उस वक्त मैं हिंदुस्तान अख़बार में बतौर संवाददाता काम करता था।भारत नेपाल सीमा पर स्थित बढ़नी के "नो मेंस लैंड "पर ।साथ में थे गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार कुमार हर्ष ।इंडिया टुडे के लिए नेपाल पर स्टोरी कर रहे थे।वह दौर नेपाल में माफियाओ और तस्करों का था।मैं ने पहली मुलाकात में उनसे कहा कि सर आप तो बड़े पत्रकार है उन्हों बहुत ही सादगी से जवाब दिया नहीं भाई "मैं तो आदमी सड़क का हूँ"।उसके बाद मैं हमेशा के लिए उनसे जुड़ गया।अक्सर फ़ोन पर बात चीत में यह तंबीह किया करते थे।मुझ से खुलकर बात किया करो।तकल्लुफ की कोई ज़रूरत नहीं है।हमेशा ही गाइड किया करते थे।अपने से जूनियर और नए लोगों को पढ़ना और लिखना सीखना उन्हें बहुत ही पसंद था।वो पत्रकारिता में उच्च मानदंडों के पछधर थे।उनका मानना था कि पत्रकार को सदा ही पूर्वाग्रह से मुक्त होना चाहिए तभी उसकी निष्पक्षता बनी रहेगी।आज जब फरजंद अहमद हमारे बीच नहीं है उनके बताये उसूल हम लोगों का मार्गदर्शन करते रहेंगे।           

अलविदा फ़रज़न्द सर।    खुशबू कैसे महके मेरे गीतों में ।।     मैं कागज़ पर आग कलम से बोता हूँ ।    लिखता हूँ मैं दर्द ज़माने के यारों।।      लिखता तो पीछे हूँ ,पहले रोता हूँ

-सगीर खाकसार

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रघुवंश ने भी किया नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री मानने से इंकार

बाहुबली शहाबुद्दीन के बाद आरजेडी के मुख्य नेता रघुवंश प्रसाद सिंह नें महागठबंधन पर करारा चोट किया हैं, रघुवंश प्रसाद ने भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को नेता मानने से इंकार कर दिया है। रघुवंश प्रसाद ने कहा कि गंठबंधन के कारण ही नीतीश कुमार मुख्यमंत्री है, मैं लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री पद पर देखना चाहता था।

पहले बाहुबली मोहम्मद शहाबुद्दीन ने नीतीश कुमार को महागंठबंधन का नेता स्वीकार्य करने से मना किया और अब आरजेडी के बड़े नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने अपना नेता मानने से इंकार कर दिया। लगता है नीतीश कुमार को नकारने का एक सिलसिला सा शुरु हो गया हैं। रघुवंश प्रसाद ने मीडिया से महागंठबंधन पर भंडास निकालते हुए कहा कि महागठबंधन बना तब लोगों ने नीतीश कुमार को अपना नेता माना लेकिन वह इसके लिए तैयार नहीं थे वह नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनते नहीं देखना चाहते थें। लेकिन गंठबंधन का फैसला था कि नीतीश कुमार ही महागठबंधन के नेता होगें। इसीलिए मुझे भी यह स्वीकार्य करना पड़ा। रघुवंश सिंह ने आगे कहा के लालू प्रसाद यादव ही उनके नेता हैं और हम चाहते ते कि लालू प्रसाद यादव जी ही बिहार के मुख्यमंत्री बनें। शराबबंदी को लेकर भी रघुवंश प्रसाद ने तंज कसा, कहा कि शराबबंदी की आंड़ लेकर लोगों को बदनाम किया जा रहा हैं। शराबबंदी के कडे कानून के कारण लोगों को परेशानियां उठानी पड़ रहीं हैं।

 

 

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